/अधिवक्ता के बाद अब वरिष्ठ अधिवक्ता बनना भी हुआ मुश्किल

अधिवक्ता के बाद अब वरिष्ठ अधिवक्ता बनना भी हुआ मुश्किल

वरिष्ठ अधिवक्ता का दर्जा हासिल करने को सुप्रीम कोर्ट के नए निर्देशों पर हाईकोर्ट के अधिवक्ताओं की बंटी राय
-कुछ ने बताया पारदर्शिता बढ़ाने वाला तो कुछ ने प्रक्रिया को कठिन करने वाला
नवीन जोशी, नैनीताल। देश में अधिवक्ता बनने की प्रक्रिया तो पहले ही कड़ी कर दी गयी थी, जिसके तहत अधिवक्ताओं के लिये लगातार प्रेक्टिस करना अनिवार्य कर दिया गया था। वहीं सर्वोच्च न्यायालय के एक जनहित याचिका पर दिए गए नये निर्देशों के बाद अब अधिवक्ताओं के लिए वरिष्ठ अधिवक्ता बनना, खासकर किसी तरह की पहुंच या जुगाड़ से बनना आसान नहीं रह जाएगा। वरिष्ठ अधिवक्ता पद का चयन सर्वोच्च न्यायालय अथवा संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली एक समिति करेगी, जिसमें दो अन्य न्यायाधीशों के साथ महाधिवक्ता एवं उच्च न्यायाधीश द्वारा उच्च न्यायालय बार से नामित एक सदस्य अधिवक्ता शामिल होंगे। देश  की सर्वोच्च न्यायालय के सर्वोच्च एवं उच्च न्यायालयो में अधिवक्ताओं को वरिष्ठ अधिवक्ता का दर्जा देने की व्यवस्था के बाबत 12 अक्टूबर 2017 को दिये गए निर्देशों पर उत्तराखंड उच्च न्यायालय के अधिवक्ताओं की राय बंटी हुई नजर आ रही है। इस संबंध में शुक्रवार को उत्तराखंड उच्च न्यायालय के अधिवक्ताओं की राय जानने का प्रयास किया गया तो यहां युवाओं सहित अधिकांश अधिवक्ताओं ने इसे अच्छा एवं वरिष्ठ अधिवक्ता पद हेतु चयन में पारदर्शिता बढ़ाने वाला कदम बताया, साथ ही चयन में बार को पहली बार चयन में भागेदारी मिलने का स्वागत किया, वहीं कुछ का मानना है कि इससे चयन की प्रक्रिया जटिल हो जाएगी।

हाईकोर्ट के अधिवक्ता सैयद खुर्शीद, विनोद तिवाड़ी, केएस बोहरा, पीएस सौन, त्रिभुवन फर्त्याल व भुवनेश जोशी।

उत्तराखंड उच्च न्यायालय बार एसोसिएशन के अध्यक्ष सैयद नदीम खुर्शीद ने कहा कि नयी व्यवस्था में उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सहित तीन न्यायाधीश और महाधिवक्ता बार में से एक अधिवक्ता को कमेटी में चयन कर रखेंगे। इन पांच लोगों की समिति ही आगे अधिवक्ताओं के आवेदनों की जांच और साक्षात्कार आदि की प्रक्रिया करेगी। किंतु इन पांचों के लिये अपनी व्यस्तताओं के चलते एक साथ बैठना मुश्किल होगा। उन्होंने इस समिति में महाधिवक्ता को भी मिलाकर बार की ओर से दो सदस्यों की भागेदारी को सुखद बताते हुए कहा कि वे बेंच के मुकाबले अधिवक्ताओं की अच्छी परख के साथ सही व्यक्ति का चयन करेंगे। इससे चयन में पारदर्शिता भी आएगी। वहीं त्रिभुवन फर्त्याल ने कहा कि नयी व्यवस्था से अधिक, खासकर गुणात्मक बदलाव की उम्मीद नहीं है। अलबत्ता अधिवक्ताओं की भागेदारी चयन में जरूर बढ़ेगी। बार के पूर्व अध्यक्ष केएस बोहरा ने कहा कि यह बेहतरी और पारदर्शिता की ओर पहला कदम है, पर यह ही अंतिम कदम नहीं हो सकता है। पूर्व सचिव विनोद तिवाड़ी ने इस कदम का स्वागत करते हुए कहा कि इससे योग्य अधिवक्ताओं का चयन हो सकेगा। कमेटी को भी चयन करने में आसानी होगी। वहीं बार के युवा अधिवक्ता भुवनेश जोशी ने कहा कि बार को पहली बार चयन की प्रक्रिया में प्रतिनिधित्व मिला है। इससे बेंच की चयन में अब तक होने वाली मनमानी पर भी अंकुश लगेगा। इसके साथ ही कई अधिवक्ताओं ने वरिष्ठ अधिवक्ता के पद को सम्मानजनक बताने के साथ ही पूर्व में उत्तराखंड उच्च न्यायालय में हुए चयनों पर सवाल भी उठाए। बताया कि वरिष्ठ अधिवक्ता को उच्च न्यायालय की ‘फुल कोर्ट रिफरेंस’ के जरिये अन्य अधिवक्ताओं से अलग ‘रिवर्स गाउन’ प्राप्त होता है। वे किसी भी मामले में बिना अपना वकालत नामा लगाए अपनी राय दे सकते हैं। 20 वर्ष की प्रेक्टिस के बाद ही वरिष्ठ अधिवक्ता बनने की मौजूदा शर्त के कारण कुल 17 वर्ष की उम्र वाले उत्तराखंड उच्च न्यायालय में वरिष्ठ अधिवक्ताओं के चयन पर स्थानीय अधिवक्ताओं को कई बार मन मसोस कर भी रहना पड़ता है।

पुरानी खबर : अधिवक्ताओं के लिए लगातार वकालत करना हुआ अनिवार्य

-हर पांच वर्ष में संबंधित बार से लगातार वकालत करने का प्रमाण पत्र ‘सर्टिफिकेट ऑफ प्रेक्टिस’ लेना होगा, तभी मिलेगा बार काउंसिल से वकालत करने का लाइसेंस
-छह माह के भीतर हासिल करना होगा वकालत करने का लाइसेंस
नवीन जोशी, नैनीताल। देश-प्रदेश के ऐसे अधिवक्ताओं के लिए बुरी खबर है जो पार्ट टाइम वकालत करते हैं। अब लगातार वकालत न करने वाले अधिवक्ता आगे वकालत नहीं कर पाएंगे। बार काउंसिल आफ इंडिया के ताजा राजपत्र से ऐसे अधिवक्ताओं में हड़कंप मचना तय है। गत 30 अक्टूबर को जारी ताजा राजपत्र-सर्टिफिकेट आफ प्रेक्टिस तथा नवीनीकरण नियम 2014 को उत्तराखंड बार काउंसिल ने भी बीती 22 नवंबर को सर्वसम्मति से स्वीकृति दे दी है, जिसके अनुसार 12 जून 2010 के बाद विधि स्नातक की डिग्री हासिल करने वाले या इसके बाद के पंजीकृत अधिवक्ताओं को अभी छह माह के भीतर और आगे हर पांच वर्ष में बार काउंसिल से ‘सर्टिफिकेट ऑफ प्रेक्टिस” हासिल करना होगा। गौरतलब है कि ‘सर्टिफिकेट ऑफ प्रेक्टिस” हासिल करने के लिए उन्हें संबंधित बार एसोसिएशन से प्राप्त इस बात का प्रमाण पत्र प्रस्तुत करना होगा, जिसमें उनके लगातार प्रेक्टिस यानी वकालत करने की पुष्टि की गई हो। साफ है कि लगातार वकालत न करने वाले अधिवक्ताओं का लाइसेंस आगे नवीनीकृत नहीं हो पाएगा, और वह किसी मामले में अपने नाम का वकालतनामा नहीं लगा पाएंगे।

उल्लेखनीय है कि वर्ष 2010 के बाद के पंजीकृत अधिवक्ताओं के लिए पहले ही ‘सर्टिफिकेट ऑफ प्रेक्टिस” लेना अनिवार्य हैं। यानी सभी नए-पुराने अधिवक्ताओं के लिए ‘सर्टिफिकेट ऑफ प्रेक्टिस” लेना अनिवार्य हो गया है। यह भी गौरतलब है कि उन्हीं अधिवक्ताओं को ‘सर्टिफिकेट ऑफ प्रेक्टिस” मिलेगा, जिनकी बार एसोसिएशन की राज्य की बार काउंसिल से संबद्धता होगी। साथ ही राज्य की बार काउंसिल से पंजीकृत सभी बार एसोसिएशनों के अधिवक्ताओं को ‘सर्टिफिकेट ऑफ प्रेक्टिस” लेना अनिवार्य है। फिलवक्त सभी अधिवक्ताओं को गजट जारी होने की तिथि 30 अक्टूबर के छह माह के भीतर यानी अधिकतम 30 अप्रैल से पूर्व ‘सर्टिफिकेट ऑफ प्रेक्टिस” हासिल करना जरूरी है। कहने की जरूरत नहीं कि जिन अधिवक्ताओं के पास भले विधि स्नातक यानी एलएलबी की डिग्री हो, बिना ‘सर्टिफिकेट ऑफ प्रेक्टिस” किए वकालत करने की अनुमति नहीं होगी। ‘सर्टिफिकेट ऑफ प्रेक्टिस” हासिल करने के लिए अधिवक्ताओं को उत्तराखंड बार काउंसिल के सचिव के नाम 400 एवं बार काउंसिल आफ इंडिया के सचिव के नाम 100 रुपए के बैंक ड्राफ्ट एवं अपनी बार एसोसिएशन के प्रमाण पत्र के साथ उत्तराखंड बार काउंसिल के सचिव के पास आवेदन करना होगा।
गौरतलब है कि पूर्व में भी सभी अधिवक्ताओं के लिए अधिवक्ता अधिनियम-1961 की धारा 62 के तहत वकालत करने का प्रमाण पत्र लेना अनिवार्य है, लेकिन अब तक यह प्रमाण पत्र पूरे अधिवक्ता जीवन में एक बार ही लेने का नियम है। यानी एक बार यह प्रमाण पत्र लेकर अधिवक्ता चाहे वकालत करें या नहीं उनका लाइसेंस जारी रहता था, लेकिन अब हर पांच वर्ष में दुबारा प्रमाण पत्र लेने की अनिवार्यता हो गई है। हाईकोर्ट बार काउंसिल के सचिव विजय सिंह ने बताया कि इस बाबत राज्य के सभी बार संघों को निर्देश दिए जा रहे हैं। उनसे 30 अक्टूबर को जारी भारत का राजपत्र भी पढ़ने को कहा जा रहा है।

हाईकोर्ट के लिए तीन और सुप्रीम कोर्ट के लिए पांच वर्ष की वकालत होगी अनिवार्य

नैनीताल। ताजा राजपत्र के अनुसार नए अधिवक्ता सीधे हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में वकालत नहीं कर पाएंगे। राजपत्र की अनुच्छेद सात के अनुसार ‘सर्टिफिकेट ऑफ प्रेक्टिस” प्राप्त अधिवक्ता शुरू में केवल सेशन या जिला न्यायाधीश के समकक्ष तथा उनके क्षेत्राधिकार के निचले न्यायालयों में ही वकालत कर पाएंगे। हाईकोर्ट तथा उसके अधिकार के न्यायालयों में वकालत करने के लिए निचले न्यायालयों में कम से कम दो वर्ष की प्रेक्टिस करने तथा सुप्रीम कोर्ट में वकालत करने के लिए उच्च न्यायालय व उसके क्षेत्राधिकार के न्यायालयों में कम से कम तीन वर्ष की प्रेक्टिस करनी अनिवार्य होगी।