बार काउंसिल चुनाव के परिणाम घोषित : रहेगा अनुभव व युवा जोश का समन्वय

नीले- रंग के प्रत्याशी जीते, लाल रंग के मुकाबले से बाहर

-शुक्रवार सुबह तड़के साढ़े चार बजे तक चली मतगणना के बाद घोषित हुए परिणाम
-नयी 20 सदस्यीय कार्यकारिणी के लिए निर्वाचित 13 सदस्य ही प्राप्त कर पाए निर्धारित 337 मतों का कोटा

नैनीताल। उत्तराखंड बार काउंसिल के 20 सदस्य पदों के लिए हुए चुनावों की मतगणना के परिणाम शुक्रवार सुबह तड़के साढ़े चार बजे तक चली मतगणना के बाद घोषित हो गये। दिन में मुख्य चुनाव अधिकारी पूर्व कार्यकारी न्यायाधीश बीडी कांडपाल ने चुनाव परिणामों की घोषणा की। घोषित परिणामों के अनुसार बार काउंसिल की 20 सदस्यीय नयी कार्यकारिणी में 5 पहली बार चुने गये तथा दो पूर्व में भी निर्वाचित सदस्यों को छोड़कर शेष 13 मौजूदा कार्यकारिणी के सदस्य ही हैं। वहीं करीब आधा दर्जन सदस्य उम्र में भी युवा हैं। इस प्रकार उम्मीद की जा रही है कि नई कार्यकारिणी युवा जोश एवं अनुभव के साथ आगे बढ़ेगी। वहीं कार्यकारिणी में देहरादून व हरिद्वार जिलों का बोलबाला साफ तौर पर नजर आ रहा है, जबकि कुमाऊं मंडल के छह जिलों से सात सदस्य ही चुने गये हैं, अलबत्ता पिछली बार के मुकाबले यह संख्या एक अधिक बताई गयी है। चुनाव परिणामों में यह भी उल्लेखनीय रहा कि कुल 90 प्रत्याशियों और निर्वाचित 20 सदस्यों में से 13 सदस्य ही निर्धारित 337 मतों का कोटा प्राप्त कर पाए, और सात सदस्य कोटा प्राप्त न कर पाने के बावजूद शीर्ष 20 में रहने के कारण निर्वाचित घोषित किये गये।
शुक्रवार को घोषित परिणामों के अनुसार सबसे पहले ऊधमसिंह नगर के डीके शर्मा, उनके बाद बार काउंसिल ऑफ इंडिया के मैनेजिंग ट्रस्टी हल्द्वानी के विजय भट्ट, तीसरे नंबर पर देहरादून के सुरेंद्र पुंडीर, चौथे नंबर पर हरिद्वार के कुलदीप कुमार सिंह, पांचवे नंबर पर दून के चंद्रशेखर तिवारी, छठे नंबर पर पौड़ी गढ़वाल के एएस भंडारी, सातवें नंबर पर दून के आर गुप्ता, आठवें नंबर पर पूर्व बार अध्यक्ष काशीपुर के हरी सिंह नेगी, नौवें नंबर पर पिथौरागढ़ के युवा एनएस कन्याल, 10वें नंबर पर नैनीताल के डा. महेंद्र सिंह पाल, 11वें नंबर पर रुड़की के मुन्फैद अली खान, 12वें पर रुड़की के सुखपाल सिंह एवं 13वें स्थान पर रहे दून के वाईएस तोमर ने 337 मतों का कोटा प्राप्त कर स्पष्ट जीत दर्ज की। वहीं दून के एमएम लांबा 327, टिहरी गढ़वाल के आर सोलंकी 316, देहरादून के ए पंडित 311, दून के ही आरएस बिष्ट 306, हरिद्वार के आरके चौहान 306, हल्द्वानी के एमएस कन्याल 301 और अल्मोड़ा के प्रभात कुमार चौधरी 283 मत प्राप्त करने के बाद भी निर्वाचित घोषित किये गये। रात्रि में ही जैसे-जैसे चुनाव परिणाम आते गए, मुकाबले से बाहर हो रहे और जीत रहे प्रत्याशी लौटते रहे। मिठाइयों और एक-दूसरे को बधाई देने का सिलसिला भी देर तक चला।

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इन दिनों ईवीएम से हुए चुनावों पर सवाल उठाने का देश भर में चलन नज़र आ रहा है, परन्तु उत्तराखंड बार काउंसिल के आज 28 मार्च को 20 सदस्य पदों के लिए मतपत्रों से हुए चुनावों पर भी एक नहीं अनेकों आरोप लगने से मतपत्रों के जरिये होने वाली चुनाव प्रक्रिया पर पूर्व में उठने वाले सवाल एक बार फिर हरे हो गए लगते हैं। ‘एडवोकेट फोरम फॉर जस्टिस’ की ओर से फोरम के संयोजक व हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष एमसी पंत व सैय्यद नदीम मून, पूर्व सचिव डीएस मेहता, योगेश पचौलिया तथा नलिन सोन सहित 50 से अधिक अधिवक्ताओं ने चुनाव प्रक्रिया पर प्रश्न चिह्न लगाते हुए बार काउंसिल ऑफ उत्तराखंड के पीठासीन अधिकारी, मुख्य चुनाव अधिकारी, बार काउंसिल ऑफ इंडिया के सचिव व केंद्रीय बार काउंसिल ऑफ ट्रिब्यूनल को शिकायत पत्र भेजकर चुनाव के समय मतदाताओ के लिए काउंटर टेबल न होने, मतपत्र पर पीठासीन अधिकारी के हस्ताक्षर न होने, मतपत्र डालने के लिए बैलेट बॉक्स के न होने व इसकी जगह प्लास्टिक की बोरी में मतपत्र डालनो एवं वोटिंग के दिन अतिरिक्त मतदाता सूची निकालकर कई अधिववताओ के नाम इस लिस्ट में जोड़कर प्रभावशाली उम्मीदवारों को लाभ पहंुचाने के आरोप लगाए। साथ ही पीठासीन अधिकारी व निर्वाचन अधिकारी द्वारा शिकायती पत्र को लेने से मना करने को लेकर उन पर नकरात्मक रवैय्या अपनाने के आरोप भी लगाए। इसके अतिरिक्त अपनी पूर्व में उठाई गई चुनाव प्रक्रिया में सीसी टीवी कैमरे न लगाने को लेकर भी सवाल उठाए, और इस सब कुछ को सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का उल्लंघन बताया, और पूरी चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्ष जाँच कराने की मांग की।
अलबत्ता, दूसरी ओर उत्तराखंड बार काउंसिल के 20 सदस्य पदों के लिए चुनाव में उठे 90 प्रत्याशियों में से चुनाव के लिए बुधवार को प्रदेश भर में मतदान व चुनाव प्रक्रिया को बार काउंसिल की ओर से पूरी तरह शांतिपूर्वक संपन्न होना बताया गया। अलबत्ता, एक प्रत्याशी शिव चरण सिंह रावत के नाम में कुछ गलती की बात काउंसिल ने स्वीकारी। काउंसिल की ओर से बताया गया कि प्रत्याशी के नाम में शिवचरण साथ आ गया है। इस पर प्रत्याशी की ओर से मतदान पत्र प्रकाशित होने के लिए जाने के बाद आपत्ति आई थी, जिस कारण सुधार नहीं किया जा सका। इसके अलावा मतदान पत्रों को रखने के लिए बक्शों की व्यवस्था न होने और मतपत्रों को कपड़े की थैलियों के एकत्र किये जाने के प्रश्न पर बार काउंसिल की ओर से बताया गया कि यूपी के दौर से ही यही व्यवस्था है। बताया गया कि 15 सितंबर 2017 तक अपने प्रपत्रों को सत्यापन के लिए बार काउंसिल को उपलब्ध कराने वाले अधिवक्ताओं को ही मताधिकार तथा चुनाव में खड़े होने की अनुमति दी गयी।
इधर प्राप्त जानकारी के अनुसार उच्च न्यायालय परिसर में नैनीताल मुख्यालय के 804 पंजीकृत अधिवक्ताओं में से 652 ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। इसी तरह पिथौरागढ़ में 94 फीसद मतदान होने की जानकारी दी गयी है। वहीं देहरादून में 2645 मतदाताओं में से 2278 ने मतदान किया। हल्द्वानी में शाम चार बजे तक 350 अधिवक्तााओं द्वारा मतदान करने और इसके बाद भी लंबी लाइन लगी होने की जानकारी दी गयी है। उच्च न्यायालय में चुनाव प्रक्रिया में अनुराग श्रीवास्तव, सुरेंद्र कुमार शर्मा, महेश उपाध्याय, श्रीकांत, विनोद जोशी, ललित मोहन जोशी, हिमानी जोशी व जितेंद्र कुमार आदि लोग जुटे रहे।

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-सात अप्रैल से शुरू होने वाली मतगणना प्रक्रिया सीसीटीवी कैमरों की नजर व पूरी सशस्त्र सुरक्षा व्यवस्था के बीच बाहर से आने वाले गणनाकारों के द्वारा की जाएगी
-मतगणना की बेहद जटिल प्रक्रिया में 15-20 दिन भी लग सकते हैं
नैनीताल। उत्तराखंड बार काउंसिल के 20 सदस्य पदों के लिए बुधवार को हुए चुनाव हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष एमसी पंत की अगुवाई वाले ‘एडवोकेट फोरम फॉर जस्टिस’ की ओर से लगाए गए आरोपों को बार काउंसिल ने पूरी तरह से निराधार करार दिया है। उत्तराखंड बार काउंसिल चुनाव के लिए बार काउंसिल ऑफ इंडिया से मुख्य चुनाव अधिकारी नियुक्त उत्तराखंड उच्च न्यायालय के पूर्व कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश भी रहे न्यायमूर्ति बीसी कांडपाल ने कहा कि यूपी के दौर से हो रहे इन चुनावों में कभी भी मतपत्रों के लिए बॉक्सों और सीसीटीवी आदि का प्रयोग नहीं किया गया है। चुनाव में हमेशा की तरह ही मतदाताओ को मतपत्रों के साथ लिफाफे दिये गए, जिसमें मतपत्रों को डालकर चिपकाकर मारकीन के बने थैलों में डालना था। वहीं चुनाव के दौरान नयी अतिरिक्त मतदाता सूची जारी करने के सवालों को भी उन्होंने पूरी तरह निराधार बताया। कहा कि 15 सितंबर 2017 तक अपने प्रपत्रों को सत्यापन के लिए बार काउंसिल को उपलब्ध व 24 जनवरी 2018 तक एआईबी से घोषित होने वाले अधिवक्ताओं को ही मताधिकार तथा चुनाव में खड़े होने की अनुमति दी गयी। बताया कि 32 में से 17 मतदान केंद्रों से मतपत्र मुख्यालय पहुंच गए हैं। इन्हें सशस्त्र सुरक्षा के साथ स्ट्रांग रूम में सीसीटीवी की नजर पर रखा गया है। आगे 7 अप्रैल से शुरू होने वाली मतगणना बाहर से आने वाले गणनाकारों के द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों पर सीसीटीवी की निगरानी में पूरी सुरक्षा व्यवस्था के बीच कराई जाएगी। मतगणना केंद्र में केवल प्रत्याशी व उनके एजेंटों को ही गेट पास के साथ आने की अनुमति होगी। बताया कि मतगणना की प्रक्रिया बेहद जटिल होती है, इसमें एक मत पत्र को 20 बार भी देखना पड़ता है, इसलिए इसमें 15-20 दिन भी लग सकते हैं। इस मौके पर बार काउंसिल के सदस्य बीसी पांडे व हिमानी जोशी भी मौजूद रहे।

बार काउंसिल चुनाव में दिया गया त्रिपुरा वाला ‘चलो पल्टाई’ का नारा

-उच्च न्यायालय से लेकर सर्वाेच्च न्यायालय तक संसद की तरह सीसीटीवी की निगरानी में सुनवाई, और सुनवाई की लाइव रिकार्डिंग किये जाने की मांग भी उठाई
नैनीताल। उत्तराखंड बार काउंसिल के बुधवार को होने वाले चुनावों में राजनीति हावी होती नजर आ रही है। चुनाव में त्रिपुरा के विस चुनावों की तर्ज पर प्रत्याशी अधिवक्ताओं के एक वर्ग के द्वारा ‘चलो पल्टाई’ का नारा दिया गया है। मंगलवार को चुनाव में सदस्य पद के प्रत्याशी हाईकोर्ट बार के पूर्व अध्यक्ष एमसी पंत ने पत्रकार वार्ता आयोजित कर कहा कि अधिवक्ताओं पर नियंत्रणकारी संस्था बार काउंसिल का नेतृत्व अधिवक्ताओं की गरिमा व सम्मान की रक्षा कर सकने योग्य वास्तविक अधिवक्ताओं के हाथों में होना चाहिए। कहा कि पिछले वर्ष 4 वर्ष से चुनावों में हो रहे विलंब को देखते हुए ‘चलो पल्टाई’ के आह्वान से इसका जवाब दें। बताया कि ‘जस्टिस फॉर एडवोकेट्स एंड डेमोक्रेसी’ नाम से एक संगठन बनाया गया है, इसकी पहली बैठक आगामी 25 अप्रैल को नैनीताल में होगी। उन्होंने उच्च न्यायालय से लेकर सर्वाेच्च न्यायालय तक संसद की तरह सीसीटीवी की निगरानी में सुनवाई, और सुनवाई की लाइव रिकार्डिंग किये जाने की मांग भी उठाई। साथ ही ज्यूरी सिस्टव को भी समय की मांग बताया। उन्होंने अधिवक्ताओं का सत्यापन न होने के कारण चुनाव में देरी करने और चुनाव में संस्थागत आरक्षण न होने की ओर भी इशारा किया। पत्रकार वार्ता में हाईकोर्ट बार के पूर्व अध्यक्ष सैयद नदीम मून, भूपेंद्र बिष्ट सहित कई अन्य सदस्य मौजूद रहे।

हाईकोर्ट बार चुनाव-2018 : ललित बेलवाल बने अध्यक्ष, नरेंद्र बाली महासचिव

राष्ट्रीय सहारा, देहरादून संस्करण, 16 मार्च 2018

-अध्यक्ष-सचिव दोनों पदों पर पहली बार लड़े प्रत्याशी जीते, निवर्तमान अध्यक्ष व सचिव को झेलनी पड़ी हार
नैनीताल। हाईकोर्ट बार एशोसिएशन के बृहस्पतिवार को हुए चुनावों में पहली बार चुनाव लड़े अध्यक्ष व सचिव पद के प्रत्याशी ललित बेलवाल व नरेंद्र बाली चुनाव जीत गये, जबकि निवर्तमान अध्यक्ष सैयद नदीम मून व सचिव संदीप तिवाड़ी को हार झेलनी पड़ी। चुनाव में कुल 553 मतदाताओं में से 495 ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। इनमें से अध्यक्ष निर्वाचित हुए ललित बेलवाल को सर्वाधिक 191 जबकि पूर्व अध्यक्ष एमसी पंत को 164 एवं निवर्तमान अध्यक्ष सैयद नदीम मून को 135 मत ही मिले। वहीं सचिव पद पर निर्वाचित हुए नरेंद्र बाली को 265 व निवर्तमान सचिव संदीप तिवाड़ी को 215 वोट मिले। अलबत्ता, दोनों महत्वपूर्ण पदों के लिए आखिर तक कांटे का संघर्ष देखा गया, तथा हार-जीत का अंतर भी कम ही रहा।

हाईकोर्ट बार में विजयी रहे प्रत्याशी।

उल्लेखनीय है कि चुनाव में विभिन्न पदों के लिए कुल 27 उम्मीदवार चुनाव मैदान में थे। वहीं वरिष्ठ उपाध्यक्ष पद पर चंद्रशेखर जोशी, महिला उपाध्यक्ष पद पर गौरा देवी देव, उप सचिव प्रशाशन पद पर वीरेंद्र रावत तथा कनिष्ठ उपाध्यक्ष पद पर दर्शन सिंह बिष्ट ने जीत दर्ज की। जबकि उपसचिव प्रेस पद के लिए राजेंद्र सिंह नेगी, कोषाध्यक्ष पद के लिए रमेश चन्द्र जोशी व पुस्तकालय सचिव पद के लिए भुवनेश जोशी, वरिष्ठ कार्यकारिणी महिला हेतु गीता परिहार तथा कनिष्ठ कार्यकारिणी के पांच पदों हेतु एमएस भंडारी, अनिल अन्थ्वाल, शक्ति सिंह, राकेश नेगी व सीतल सेलवाल का निर्विरोध निर्वाचन पहले ही तय था। वरिष्ठ उपाध्यक्ष पद पर चंद्रशेखर जोशी को 245 व विपुल पैन्यूली को 236, कनिष्ठ उपाध्यक्ष पद पर दर्शन सिंह बिष्ट को 253 व सैयद कासिफ जाफरी को 199, महिला कनिष्ठ उपाध्यक्ष पद पर गौरा देवी देव को 308 व अंजलि नौलियाल को 179 तथा उप सचिव प्रशासन पद पर वीरेंद्र रावत को 339 व किशन कुमार वर्मा को 147 मत मिले। चुनाव की प्रक्रिया में चुनाव अधिकारी एमएस त्यागी, अंजलि भार्गव, आलोक मेहरा, रवींद्र बिष्ट, वीपी बहुगुणा, राज कुमार वर्मा, विशाल मेहरा, नवीन तिवारी, पीएस बिष्ट, पंकज कपिल, जगदीश बिष्ट, लता नेगी व जयवर्धन कांडपाल आदि अधिवक्ताओं ने सहयोग किया।

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वरिष्ठ अधिवक्ता का दर्जा हासिल करने को सुप्रीम कोर्ट के नए निर्देशों पर हाईकोर्ट के अधिवक्ताओं की बंटी राय
-कुछ ने बताया पारदर्शिता बढ़ाने वाला तो कुछ ने प्रक्रिया को कठिन करने वाला

राष्ट्रीय सहारा, देहरादून संस्करण 14 अक्टूबर 2017

नवीन जोशी, नैनीताल। देश में अधिवक्ता बनने की प्रक्रिया तो पहले ही कड़ी कर दी गयी थी, जिसके तहत अधिवक्ताओं के लिये लगातार प्रेक्टिस करना अनिवार्य कर दिया गया था। वहीं सर्वोच्च न्यायालय के एक जनहित याचिका पर दिए गए नये निर्देशों के बाद अब अधिवक्ताओं के लिए वरिष्ठ अधिवक्ता बनना, खासकर किसी तरह की पहुंच या जुगाड़ से बनना आसान नहीं रह जाएगा। वरिष्ठ अधिवक्ता पद का चयन सर्वोच्च न्यायालय अथवा संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली एक समिति करेगी, जिसमें दो अन्य न्यायाधीशों के साथ महाधिवक्ता एवं उच्च न्यायाधीश द्वारा उच्च न्यायालय बार से नामित एक सदस्य अधिवक्ता शामिल होंगे। देश  की सर्वोच्च न्यायालय के सर्वोच्च एवं उच्च न्यायालयो में अधिवक्ताओं को वरिष्ठ अधिवक्ता का दर्जा देने की व्यवस्था के बाबत 12 अक्टूबर 2017 को दिये गए निर्देशों पर उत्तराखंड उच्च न्यायालय के अधिवक्ताओं की राय बंटी हुई नजर आ रही है। इस संबंध में शुक्रवार को उत्तराखंड उच्च न्यायालय के अधिवक्ताओं की राय जानने का प्रयास किया गया तो यहां युवाओं सहित अधिकांश अधिवक्ताओं ने इसे अच्छा एवं वरिष्ठ अधिवक्ता पद हेतु चयन में पारदर्शिता बढ़ाने वाला कदम बताया, साथ ही चयन में बार को पहली बार चयन में भागेदारी मिलने का स्वागत किया, वहीं कुछ का मानना है कि इससे चयन की प्रक्रिया जटिल हो जाएगी।

हाईकोर्ट के अधिवक्ता सैयद खुर्शीद, विनोद तिवाड़ी, केएस बोहरा, पीएस सौन, त्रिभुवन फर्त्याल व भुवनेश जोशी।

उत्तराखंड उच्च न्यायालय बार एसोसिएशन के अध्यक्ष सैयद नदीम खुर्शीद ने कहा कि नयी व्यवस्था में उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सहित तीन न्यायाधीश और महाधिवक्ता बार में से एक अधिवक्ता को कमेटी में चयन कर रखेंगे। इन पांच लोगों की समिति ही आगे अधिवक्ताओं के आवेदनों की जांच और साक्षात्कार आदि की प्रक्रिया करेगी। किंतु इन पांचों के लिये अपनी व्यस्तताओं के चलते एक साथ बैठना मुश्किल होगा। उन्होंने इस समिति में महाधिवक्ता को भी मिलाकर बार की ओर से दो सदस्यों की भागेदारी को सुखद बताते हुए कहा कि वे बेंच के मुकाबले अधिवक्ताओं की अच्छी परख के साथ सही व्यक्ति का चयन करेंगे। इससे चयन में पारदर्शिता भी आएगी। वहीं त्रिभुवन फर्त्याल ने कहा कि नयी व्यवस्था से अधिक, खासकर गुणात्मक बदलाव की उम्मीद नहीं है। अलबत्ता अधिवक्ताओं की भागेदारी चयन में जरूर बढ़ेगी। बार के पूर्व अध्यक्ष केएस बोहरा ने कहा कि यह बेहतरी और पारदर्शिता की ओर पहला कदम है, पर यह ही अंतिम कदम नहीं हो सकता है। पूर्व सचिव विनोद तिवाड़ी ने इस कदम का स्वागत करते हुए कहा कि इससे योग्य अधिवक्ताओं का चयन हो सकेगा। कमेटी को भी चयन करने में आसानी होगी। वहीं बार के युवा अधिवक्ता भुवनेश जोशी ने कहा कि बार को पहली बार चयन की प्रक्रिया में प्रतिनिधित्व मिला है। इससे बेंच की चयन में अब तक होने वाली मनमानी पर भी अंकुश लगेगा। इसके साथ ही कई अधिवक्ताओं ने वरिष्ठ अधिवक्ता के पद को सम्मानजनक बताने के साथ ही पूर्व में उत्तराखंड उच्च न्यायालय में हुए चयनों पर सवाल भी उठाए। बताया कि वरिष्ठ अधिवक्ता को उच्च न्यायालय की ‘फुल कोर्ट रिफरेंस’ के जरिये अन्य अधिवक्ताओं से अलग ‘रिवर्स गाउन’ प्राप्त होता है। वे किसी भी मामले में बिना अपना वकालत नामा लगाए अपनी राय दे सकते हैं। 20 वर्ष की प्रेक्टिस के बाद ही वरिष्ठ अधिवक्ता बनने की मौजूदा शर्त के कारण कुल 17 वर्ष की उम्र वाले उत्तराखंड उच्च न्यायालय में वरिष्ठ अधिवक्ताओं के चयन पर स्थानीय अधिवक्ताओं को कई बार मन मसोस कर भी रहना पड़ता है।

पुरानी खबर : अधिवक्ताओं के लिए लगातार वकालत करना हुआ अनिवार्य

-हर पांच वर्ष में संबंधित बार से लगातार वकालत करने का प्रमाण पत्र ‘सर्टिफिकेट ऑफ प्रेक्टिस’ लेना होगा, तभी मिलेगा बार काउंसिल से वकालत करने का लाइसेंस
-छह माह के भीतर हासिल करना होगा वकालत करने का लाइसेंस
नवीन जोशी, नैनीताल। देश-प्रदेश के ऐसे अधिवक्ताओं के लिए बुरी खबर है जो पार्ट टाइम वकालत करते हैं। अब लगातार वकालत न करने वाले अधिवक्ता आगे वकालत नहीं कर पाएंगे। बार काउंसिल आफ इंडिया के ताजा राजपत्र से ऐसे अधिवक्ताओं में हड़कंप मचना तय है। गत 30 अक्टूबर को जारी ताजा राजपत्र-सर्टिफिकेट आफ प्रेक्टिस तथा नवीनीकरण नियम 2014 को उत्तराखंड बार काउंसिल ने भी बीती 22 नवंबर को सर्वसम्मति से स्वीकृति दे दी है, जिसके अनुसार 12 जून 2010 के बाद विधि स्नातक की डिग्री हासिल करने वाले या इसके बाद के पंजीकृत अधिवक्ताओं को अभी छह माह के भीतर और आगे हर पांच वर्ष में बार काउंसिल से ‘सर्टिफिकेट ऑफ प्रेक्टिस” हासिल करना होगा। गौरतलब है कि ‘सर्टिफिकेट ऑफ प्रेक्टिस” हासिल करने के लिए उन्हें संबंधित बार एसोसिएशन से प्राप्त इस बात का प्रमाण पत्र प्रस्तुत करना होगा, जिसमें उनके लगातार प्रेक्टिस यानी वकालत करने की पुष्टि की गई हो। साफ है कि लगातार वकालत न करने वाले अधिवक्ताओं का लाइसेंस आगे नवीनीकृत नहीं हो पाएगा, और वह किसी मामले में अपने नाम का वकालतनामा नहीं लगा पाएंगे।

उल्लेखनीय है कि वर्ष 2010 के बाद के पंजीकृत अधिवक्ताओं के लिए पहले ही ‘सर्टिफिकेट ऑफ प्रेक्टिस” लेना अनिवार्य हैं। यानी सभी नए-पुराने अधिवक्ताओं के लिए ‘सर्टिफिकेट ऑफ प्रेक्टिस” लेना अनिवार्य हो गया है। यह भी गौरतलब है कि उन्हीं अधिवक्ताओं को ‘सर्टिफिकेट ऑफ प्रेक्टिस” मिलेगा, जिनकी बार एसोसिएशन की राज्य की बार काउंसिल से संबद्धता होगी। साथ ही राज्य की बार काउंसिल से पंजीकृत सभी बार एसोसिएशनों के अधिवक्ताओं को ‘सर्टिफिकेट ऑफ प्रेक्टिस” लेना अनिवार्य है। फिलवक्त सभी अधिवक्ताओं को गजट जारी होने की तिथि 30 अक्टूबर के छह माह के भीतर यानी अधिकतम 30 अप्रैल से पूर्व ‘सर्टिफिकेट ऑफ प्रेक्टिस” हासिल करना जरूरी है। कहने की जरूरत नहीं कि जिन अधिवक्ताओं के पास भले विधि स्नातक यानी एलएलबी की डिग्री हो, बिना ‘सर्टिफिकेट ऑफ प्रेक्टिस” किए वकालत करने की अनुमति नहीं होगी। ‘सर्टिफिकेट ऑफ प्रेक्टिस” हासिल करने के लिए अधिवक्ताओं को उत्तराखंड बार काउंसिल के सचिव के नाम 400 एवं बार काउंसिल आफ इंडिया के सचिव के नाम 100 रुपए के बैंक ड्राफ्ट एवं अपनी बार एसोसिएशन के प्रमाण पत्र के साथ उत्तराखंड बार काउंसिल के सचिव के पास आवेदन करना होगा।
गौरतलब है कि पूर्व में भी सभी अधिवक्ताओं के लिए अधिवक्ता अधिनियम-1961 की धारा 62 के तहत वकालत करने का प्रमाण पत्र लेना अनिवार्य है, लेकिन अब तक यह प्रमाण पत्र पूरे अधिवक्ता जीवन में एक बार ही लेने का नियम है। यानी एक बार यह प्रमाण पत्र लेकर अधिवक्ता चाहे वकालत करें या नहीं उनका लाइसेंस जारी रहता था, लेकिन अब हर पांच वर्ष में दुबारा प्रमाण पत्र लेने की अनिवार्यता हो गई है। हाईकोर्ट बार काउंसिल के सचिव विजय सिंह ने बताया कि इस बाबत राज्य के सभी बार संघों को निर्देश दिए जा रहे हैं। उनसे 30 अक्टूबर को जारी भारत का राजपत्र भी पढ़ने को कहा जा रहा है।

हाईकोर्ट के लिए तीन और सुप्रीम कोर्ट के लिए पांच वर्ष की वकालत होगी अनिवार्य

नैनीताल। ताजा राजपत्र के अनुसार नए अधिवक्ता सीधे हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में वकालत नहीं कर पाएंगे। राजपत्र की अनुच्छेद सात के अनुसार ‘सर्टिफिकेट ऑफ प्रेक्टिस” प्राप्त अधिवक्ता शुरू में केवल सेशन या जिला न्यायाधीश के समकक्ष तथा उनके क्षेत्राधिकार के निचले न्यायालयों में ही वकालत कर पाएंगे। हाईकोर्ट तथा उसके अधिकार के न्यायालयों में वकालत करने के लिए निचले न्यायालयों में कम से कम दो वर्ष की प्रेक्टिस करने तथा सुप्रीम कोर्ट में वकालत करने के लिए उच्च न्यायालय व उसके क्षेत्राधिकार के न्यायालयों में कम से कम तीन वर्ष की प्रेक्टिस करनी अनिवार्य होगी।