एशिया की सबसे बड़ी दूरबीन ढाई माह से खराब !

-30 मार्च 2016 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बेल्जियम में वहां के प्रधानमंत्री माइकेल के साथ किया था रिमोट से शुभारंभ
-17.5 मिलियन यूरो यानी करीब 100 करोड़ रुपए से हुआ है निर्माण 
नवीन जोशी, नैनीताल। 30 मार्च 2016 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा बेल्जियम में वहां के प्रधानमंत्री चार्ल्स मिशेल के साथ बेल्जियम के सहयोग से बनी जिस एशिया की सबसे बड़ी 3.6 मीटर व्यास की आसमान में देखने के लिए घूमने योग्य ‘देवस्थल ऑप्टिकल टेलीस्कोप’ (डॉट) का रिमोट से शुभारंभ किया था, वह राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय महत्व की दूरबीन पिछले करीब ढाई माह से खराब पड़ी है। एरीज के निदेशक डा. अनिल कुमार पांडे ने इसके ‘खराब होने’ शब्द से परहेज करते हुए स्वीकारा है कि इसमें किसी भी उपकरण के लगने के शुरुआती दिनों में होने वाली शुरुआती खराबी है, जिसे दूर करने के लिए मरम्मत के कार्य चल रहे हैं। कहा कि यह एक तरह से ‘फाइन ट्यूनिंग’ का कार्य है। उम्मीद जताई कि शीघ्र ही इसकी कमी को दुरुस्त कर लिया जाएगा। बताया कि वे इस बारे में एएमओएस के अधिकारियों से संपर्क में हैं।

भरोसेमंद सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार डॉट पिछले वर्ष 23 नवंबर 2017 से खराब है। इसकी किसी मोटर में खराबी है। दूरबीन के इंस्टालेशन की प्रक्रिया 28-29 अक्टूबर 2014 से वेल्जियम एवं एरीज के वैज्ञानिकों की टीम के द्वारा कई चरणों में की गयी,ओर तभी से बेल्जियम की कंपनी ‘एएमओएस’ द्वारा इसकी वारंटी देने पर सवाल उठाए गए थे, और अब इसे वारंटी के तहत निःशुल्क सुधारने से भी यह कहकर मना कर दिया गया कि एरीज, भारत की ओर से इसे लगाने (इंस्टालेशन) में विलंब हुआ। हालांकि निदेशक डा. पांडे का कहना है बेल्जियम की कंपनी की ओर से वारंटी का मुद्दा इसे लगाने के दौरान उठा था, लेकिन तभी दोनों देशों के विशेषज्ञों की समिति बनाकर वारंटी के मुद्दे को सुलझा लिया गया था।

डॉट के जरिये भारत ने हासिल की हैं कई उपलब्धियां

नैनीताल। डॉट के निर्माण की प्रक्रिया हालांकि वर्ष 1998 से चल रही थी, और वर्ष 2007 में शुरू हुई टेंडरिंग की प्रक्रिया के दौरान की तत्कालीन लागत 17.5 मिलियन यूरो यानी करीब 100 करोड़ रुपए से शुरू हुई थी, और इसमें से भी दो मिलियन यूरो यानी करीब 10 करोड़ रुपए इसके लिए लेंस का निर्माण करने वाले बेल्जियम द्वारा दिए गए थे। खास बात यह रही कि 2016 में 2007 की तय लागत में ही इसका पूरा निर्माण कर लिया गया। इसकी करीब 30 मीटर ऊंची 10 मंजिला इमारत का निर्माण केवल करीब सात करोड़ रुपए में किया गया है, जिसमें शाम ढलने के बाद भीतर और बाहर का तापमान समान रहने जैसी विशेषता भी है। इसके अलावा डॉट के जरिए भारत ने देश में पहली बार 3.7 व्यास के बड़े लेंसों पर एल्युमिनियम कोटिंग (परत चढ़ाने) की क्षमता विकसित की। एरीज के सहयोग से यह क्षमता एचएचपी बंगलुरू द्वारा विकसित की गई। इस क्षमता का प्रयोग भारत आगे विश्व की सबसे बड़ी 30 मीटर व्यास की टीएमटी में भी कर रहा है, तथा आगे अपनी प्रस्तावित 10 मीटर व्यास की व अन्य बड़ी दूरबीनों में भी कर सकेगा। इसके अलावा दूरबीन के निर्माण में लेंस के निर्माण को छोड़कर तथा कोटिंग व स्थापन सहित 50 फीसद कार्य अपने देश में ही किए गए, जो अपने आप में देश के लिए एक बड़ी सफलता व गर्व की बात है। इन उपलब्धियों के साथ समुद्र सतह से करीब 2,500 मीटर की ऊंचाई पर एवं आसपास चार-पांच किमी के हवाई दायरे में कोई प्रकाश प्रदूषण न होने की वजह से भी डॉट न केवल देश, वरन दुनिया के खगोल वैज्ञानिकों के लिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। देवस्थल से प्राप्त ब्रह्मांड के चित्र यहां के दिन में नीले और रात्रि में गाढ़े अंधेरे (आसपास रोशनी न होने) के कारण इतने साफ और सटीक प्राप्त हुए हैं कि देवस्थल सीधे ही दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खगोल वैज्ञानिक केंद्रों में शामिल हो गया है। इस कारण बेल्जियम सहित दुनिया के अन्य देश तथा भारत के टीआईएफआर, आयुका व आईआईए बंगलुरु आदि बड़े संस्थान भी यहां अपने उपकरण लगाए हैं।

सम्बंधित पूर्व आलेख : देवस्थल में एशिया की सबसे बड़ी दूरबीन ‘डॉट’ स्थापित, आइएलएमटी की तैयारी

Rashtriya Sahara 24 April 15

Rashtriya Sahara 24 April 15

-सफलता से लिए गए शनि व बृहस्पति के प्रारंभिक प्रेक्षण 

नवीन जोशी, नैनीताल। जी हां, देश ही नहीं एशिया की अपनी तरह की सबसे बड़ी 3.6 मीटर व्यास की दूरबीन-डॉट यानी देवस्थल ऑप्टिकल टेलीस्कोप जनपद के देवस्थल नाम के स्थान पर स्थापित हो गई है। इस दूरबीन से प्रायोगिक तौर पर शनि एवं बृहस्पति ग्रहों के चित्र सफलता पूर्वक ले लिए गए हैं। इसे तेजी से अंतरिक्ष, ब्रह्मांड व विज्ञान जगत में लगातार आगे बढ़ रहे देश के लिए बड़ा कदम माना जा सकता है। दूरबीन का औपचारिक तौर पर शुभारंभ इस वर्ष अक्टूबर माह में होने की उम्मीद है।

देवस्थल में स्थापित 3.6 मीटर व्यास की दूरबीन।

देवस्थल में स्थापित 3.6 मीटर व्यास की दूरबीन।

उल्लेखनीय है कि देवस्थल के प्रदूषण मुक्त साफ-स्वच्छ वायुमंडल में डॉट यानी देवस्थल ऑप्टिकल टेलीस्कोप के निर्माण की प्रक्रिया वर्ष 1998 से चल रही है। इधर 28-29 अक्टूबर 2014 से इस दूरबीन को स्थापित करने की प्रक्रिया वेल्जियम एवं एरीज के वैज्ञानिकों की टीम के द्वारा कई चरणों में चल रही थी, जो कि अब पूर्ण हो गई है। एरीज के कार्यकारी निदेशक डा. वहाब उद्दीन ने बताया कि दूरबीन के इलेक्ट्रिक, इलेक्ट्रोनिक्स, मैकेनिकल, ऑप्टिकल व सिविल के समस्त कार्य पूर्ण हो गए हैं। इसके बाद एरीज की पूरी टीम इसके परीक्षणों एवं क्षमता को मांपने में लग गए हैं।

कई मायनों में अनूठी है ‘डॉट’

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देवस्थल में स्थापित दूरबीन से लिया गया शनि ग्रह का चित्र।

नैनीताल। उल्लेखनीय है कि भारत की अब तक सबसे बड़ी 2.3 मीटर व्यास की दूरबीन माउंट कगलूर (कर्नाटक) में है, जबकि एशिया की सबसे बड़ी चार मीटर व्यास की दूरबीन-लेमोस्ट चाइना वर्ष 2012 में चीन में स्थापित की गई है। लेकिन चीन व भारत की दूरबीन में फर्क यह है कि चीन की मोजेक यानी अनेक छोटे टुकड़ों को जोड़कर बनी दूरबीन स्टेटिक है। यानी यह बिना हिले-डुले केवल एक स्थान पर ही प्रेक्षण कर सकती है। जबकि भारत की दूरबीन में 3.6 मीटर व्यास का एशिया का सही मायनों में सबसे बड़े व्यास का इकलौता लेंस लगा हुआ है, और यह पूरे 360 डिग्री के कोण पर घूमते हुए पूरे ब्रह्मांड के दर्शन करा सकती हैं।

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देवस्थल में स्थापित दूरबीन से लिया गया शनि ग्रह का चित्र।

इस हेतु दूरबीन में कक्ष के भीतर ही गुंबद में 10 टन के भार को उठाने की क्षमता युक्त चार ऐसी क्रेनें भी लगी हुई हैं, जो न्यूनतम तीन मिमी प्रति सेकेंड जैसी धीमी गति से लेंस को बिना झटका दिए घुमाती है। इस तरह भारतीय दूरबीन अपनी तरह की सबसे बड़ी ‘जनरल पर्पज” दूरबीन है। इस स्टेलर दूरबीन का शीशा केवल 16.5 सेमी ही मोटा है । इस प्रकार यह मोटाई और व्यास के अनुपात (व्यास व मोटाई में 10 का अनुपात) में दुनिया में अद्वितीय बताई जा रही है। इस दूरबीन की महत्ता इसलिए भी है कि पूर्व में आस्ट्रेलिया से करीब 12 घंटे समय की दूरी पर पश्चिम में स्पेन के पास स्थित केनरी आइलेंड के करीब बीचों-बीच यह स्थापित हुई है, लिहाजा इससे 12 घंटे के समय अंतराल के बीच ब्रह्मांड में होने वाली सुपर नोवा, गामा किरणों के रिबर्स्ट आदि हर तरह की गतिविधियों पर नजर रखी जा सकती है, साथ ही ब्रह्मांड में संभव पृथ्वी जैसे अनय ग्रहों की पहचान, पृथ्वी पर टकरा सकने वाले एस्ट्राइड, सुदूर अंतरिक्ष में जगमगाने वाले सितारों व अपनी ‘मिल्की-वे” के साथ ही आस-पास की अनेक कम प्रकाश वाली धुंधली आकाशगंगाओं व तारों के वर्णक्रम को भी देखा एवं उनका सूक्ष्म अध्ययन भी किया जा सकेगा। साथ ही पृथ्वी को एक्स-रेज से नुकसान पहुंचा सकने वाले गामा बस्र्ट आदि पर नजर रखी जा सकती है। समुद्र सतह से करीब 2,500 मीटर की ऊंचाई पर एवं आसपास चार-पांच किमी के हवाई दायरे में कोई प्रकाश प्रदूषण न होने की वजह से भी डॉट न केवल देश, वरन दुनिया के खगोल वैज्ञानिकों के लिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। देवस्थल से प्राप्त ब्रह्मांड के चित्र यहां के दिन में नीले और रात्रि में गाढ़े अंधेरे (आसपास रोशनी न होने के कारण) के कारण इतने साफ और सटीक हैं कि देवस्थल सीधे ही दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खगोल वैज्ञानिक केंद्रों में शामिल हो गया है। इस कारण बेल्जियम सहित दुनिया के अन्य देश तथा भारत के टीआईएफआर, आयुका व आईआईए बंगलुरु आदि बड़े संस्थान भी यहां अपने उपकरण लगा रहे हैं।

इसके जरिए भारत ने बढ़ाई हैं अपनी कई क्षमताएं

नैनीताल। डॉट के जरिए भारत ने देश में पहली बार 3.7 व्यास के बड़े लेंसों पर एल्युमिनियम कोटिंग (परत चढ़ाने) की क्षमता विकसित की है। एरीज के सहयोग से यह क्षमता एचएचपी बंगलुरू द्वारा विकसित की गई है। इस क्षमता का प्रयोग भारत आगे विश्व की सबसे बड़ी 30 मीटर व्यास की टीएमटी में भी कर रहा है, तथा आगे अपनी प्रस्तावित 10 मीटर व्यास की व अन्य बड़ी दूरबीनों में भी कर सकेगा। प्रोजेक्ट मैनेजर डा. बृजेश कुमार ने बताया कि दूरबीन के निर्माण में लेंस के निर्माण को छोड़कर तथा कोटिंग व स्थापन सहित 50 फीसद कार्य अपने देश में किए गए हैं, जो अपने आप में देश के लिए एक बड़ी सफलता व गर्व की बात है।

वर्ष 2007 की ही कीमत पर हुआ है निर्माण

नैनीताल। डॉट के प्रोजेक्ट मैनेजर डा. बृजेश कुमार ने बताया कि इस दूरबीन के लिए टेंडरिंग की प्रक्रिया वर्ष 2007 में शुरू हुई थी। तब इसकी लागत 17.5 मिलियन यूरो यानी करीब 100 करोड़ रुपए तय हुई थी। इसमें से भी दो यूरो यानी करीब 10 करोड़ रुपए इसके लिए लेंस का निर्माण करने वाले बेल्जियम द्वारा दिए गए थे। बताया कि 2007 की तय लागत में ही दूरबीन का पूरा निर्माण कर लिया गया है। इसकी करीब 30 मीटर ऊंची 10 मंजिला इमारत का निर्माण केवल करीब सात करोड़ रुपए में किया गया है, जिसमें शाम ढलने के बाद भीतर और बाहर का तापमान समान रहने जैसी विशेषता भी है।

बनारस के एक कमरे से देश की सबसे बड़ी दूरबीन तक का सुनहरा इतिहास रहा है एरीज का

नैनीताल। आजादी के बाद खगोल विज्ञान प्रेमी यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री संपूर्णानंद ने सर्वप्रथम १९५१ में राजकीय वेधशाला बनाने का निर्णय लिया था। २० अप्रैल १९५४ में यह बरारस गवर्नमेंट संस्कृत कॉलेज के एक कक्ष में स्थापित की गई। डीएसबी कॉलेज नैनीताल के डा. एएन सिंह को इसका निदेशक बनाया गया, लेकिन जुलाई ५४ में ही उनका हृदयाघात से निधन हो जाने के बाद नवंबर १९५४ में डा. एमके वेणुबप्पू इसके निदेशक बनाए गए, जिन्होंने पहाड़ पर ही खगोल विज्ञान की वेधशाला होने की संभावना को देखते हुए इसे पहले नैनीताल के देवी लॉज में तथा बाद में वर्तमान १९५१ मीटर ऊंचाई वाली मनोरा पीक चोटी में स्थापित करवाया। आगे डा. केडी सिंभ्वल १९६० से १९७८, डा. एमसी पांडे ७८ से बीच में कुछ अवधि छोड़कर १९९५ तक इसके निदेशक रहे, तथा जुलाई १९९६ में प्रो. रामसागर इसके निदेशक बने। आगे राज्य बनने के बाद यूपी राजकीय वेधशाला उत्तराखंड सरकार को हस्तांतरित हुई तथा २२ मार्च २००४ में भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रोद्योगिकी मंत्रालय ने इसे अपने हाथ में लेकर एरीज के रूप में केंद्रीय संस्थान की मान्यता दे दी। वर्तमान में यहां सीसीडी कैमरा, स्पेक्टोफोटोमीटर व फिल्टर्स जैसी आधुनिकतम सुविधाओं युक्त १५ सेमी, ३८ सेमी, ५२ सेमी, ५६ सेमी व १.०४ मीटर एवं देवस्थल में १.३ मीटर की दूरबीनें उपलब्ध हैं, जिन पर खगोल विज्ञान एवं खगोल भौतिकी, वायुमंडलीय विज्ञान एवं सूर्य तथा सौर प्रणाली पर २४ वैज्ञानिक गहन शोध करते रहते हैं। २८ अक्टूबर २००३ को यहां के वरिष्ठ सौर वैज्ञानिक व वर्तमान कार्यवाहक निदेशक डा. वहाबउद्दीन ने विश्व में पहली बार १५ सेमी की दूरबीन से ४बी/एक्स१७.२क्लास की ऐतिहासिक बड़ी सौर भभूका का प्रेक्षण करने में सफलता प्राप्त की थी। ग्रह नक्षत्रों के मामले में अंधविश्वासों से घिरे आमजन तक विज्ञान की पहुंच बढ़ाने एवं खासकर छात्राों को ब्रह्मांड की जानकरी देने की लिऐ एरीज ने अपने ‘पब्लिक आउटरीच” कार्यक्रम के तहत पूर्णतया कम्प्यूटरीकृत दूरबीन (प्लेनिटोरियम) स्थापित की है। देवस्थल में देश व एशिया की अपनी तरह की सबसे बड़ी ३.६ मीटर व्यास की की आप्टिकल स्थापित की गयी है, जिसके लिए १९८० के दौर से प्रयास चल रहे हैं।

एरीज-देवस्थल के सिर एक और ताज: विश्व की अनूठी चार मीटर व्यास की आईएलएमटी दूरबीन होगी स्थापित

4 मीटर आइएलएमटी

4 मीटर आइएलएमटी

-भारत-बेल्जियम की संयुक्त परियोजना में अगले वर्ष इस दूरबीन के शुरू हो जाने का वैज्ञानिकों को है भरोसा
-आकाश के सर्वोच्च शिखर-जेनिथ की आधे अंश की पट्टी का स्थैतिक रहकर करेगी यह दूरबीन अध्ययन
-विश्व में अभी ऐसी दूरबीन कहीं भी नहीं, बैंकुवर में स्थापित दूरबीन हो चुकी है कालातीत
-परंपरागत लेंस की दूरबीन से 50 गुना होगी सस्ती
नवीन जोशी, नैनीताल। स्थानीय आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान यानी एरीज के तहत ‘बेल्गो-इंडियन नेटवर्क फॉर एस्ट्रनॉमी एंड एस्ट्रोफिजिक्स यानी बिना’ के द्वारा नैनीताल जनपद के देवस्थल नाम के स्थान पर विश्व की अनूठी 4 मीटर व्यास की दूरबीन स्थापित होने जा रही है। मंगलवार को इस दूरबीन के स्थापित होने का खुलासा हुआ, किंतु इसके निर्माण के लिये देवस्थल में गुंबद आदि का निर्माण हो चुका है, तथा अप्रैल 2017 में इस गुंबद में दूरबीन की स्थापना हो जाने की भारत व बेल्जियम के प्रोजेक्ट इंजीनियरों ने पूरी उम्मीद जाहिर की है। उल्लेखनीय है देवस्थल में इसी वर्ष भारत ही नहीं एशिया की सबसे बड़ी 3.6 मीटर व्यास की दूरबीन डॉट यानी देवस्थल ऑप्टिलक टेलीस्कोप का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बेल्जियम से किया था, जबकि आगे स्थापित होने जा रही दूरबीन इससे भी बड़े 4 मीटर व्यास की होगी।
देवस्थल में स्थापित होने जा रही 4 मीटर व्यास की दूरबीन के प्रोजेक्ट इंजीनियर, एरीज के वैज्ञानिक डा. एके पांडे व बेल्जियम के प्रोजेक्ट इंजीनियर लिट्जे यूनिवर्सिटी बेल्जियम के स्टार इंस्टिट्यूट के जीन सरडेज ने बताया कि प्रस्तावित दूरबीन इंटरनेशनल लिक्विड मिरर टेलीस्कोप-आईएलएमटी यानी तरल लेंस से निर्मित होगी। देवस्थल में मौजूद डॉट जहां बेल्जियम में ही बने 3.6 मीटर व्यास के एक शीशे से बनी है, वहीं प्रस्तावित दूरबीन चार मीटर व्यास के धातु के कटोरेनुमा ढांचे पर पारे को चढ़ाकर बने हुए लेंस से निर्मित होगी। बावजूद इसकी चमक और परावर्तन यानी शीशे की तरह दूसरी वस्तुओं-तारों आदि को देखने की क्षमता परंपरागत लेंस जैसी ही होगी। इस प्रकार इसकी कीमत डॉट के मुकाबले 50 गुना तक कम होगी। अलबत्ता, यह डॉट की तरह पूरे आसमान में घूम कर प्रेक्षण व अध्ययन नहीं कर सकती, किंतु इससे जेनिथ कहे जाने वाले आकाश के सर्वोच्च शिखर की धरती से आधे डिग्री के कोण की पट्टी का बहुत बेहतरी से अध्ययन किया जा सकेगा। अलबत्ता इसका जीवनकाल पांच वर्ष ही होगा। वैज्ञानिकों ने बताया कि इस तकनीकी की एक 6 मीटर व्यास की दूरबीन बैंकुवर कनाडा में स्थापित की गई थी, जोकि अब कालातीत हो चुकी है। यानी देवस्थल में स्थापित होने जा रही दूरबीन अपनी तरह की विश्व की अनूठी व बड़ी दूरबीन होगी। वैज्ञानिकों ने बताया कि वैज्ञानिकों ने 20 वर्ष के अध्ययन के बाद देवस्थल का चयन डॉट एवं इस आईएलएमटी दूरबीन की स्थापना के लिये किया है।

दो वर्ष बिना मुखिया के निभाईं बड़ी जिम्मेदारियां

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राष्ट्रीय सहारा, 25 अप्रेल, 2015

-मई 2013 में आरोपों के बाद छीन लिए थे तत्कालीन निदेशक प्रो. रामसागर से अधिकार
-तभी से कार्यकारी व्यवस्था में चल रहा है देश का महत्वपूर्ण वैज्ञानिक शोध संस्थान
-एशिया की सबसे बड़ी 3.6 मीटर व्यास की दूरबीन के अलावा एसटी रडार लगाने जैसे बड़े प्रोजेक्टों की भी है जिम्मेदारी
नवीन जोशी, नैनीताल। आजादी के बाद खगोल विज्ञान प्रेमी यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री संपूर्णानंद द्वारा देखे गए स्वप्न के फलस्वरूप अस्तित्व में आए देश के शीर्ष वैज्ञानिक शोध संस्थानों में शुमार एरीज यानी आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान के दो वर्ष से ‘अच्छे दिन” नहीं आ पा रहे हैं। संस्थान पर एशिया की सबसे बड़ी 3.6 मीटर व्यास की दूरबीन के साथ ही प्रदेश को दैवीय आपदाओं से बचाने के लिए मौसम की सटीक भविष्यवाणी करने के लिए जरूरी एसटी रडार स्थापित करने जैसे बड़े प्रोजेक्टों की जिम्मेदारी है, लेकिन मई 2013 में तत्कालीन निदेशक प्रो. रामसागर पर आरोप लगने के कारण छीन ली गई जिम्मेदारियों के बाद से मुखिया यानी स्थाई निदेशक नहीं है। समझा जा सकता है कि निदेशक न होने की वजह से संस्थान के दैनंदिन क्रियाकलापों के साथ ही बड़े प्रोजेक्टों हेतु लिए जाने वाले निर्णयों में अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
उल्लेखनीय है कि यूपी के तत्कालीन सीएम संपूर्णानंद ने सर्वप्रथम 1951 में राजकीय वेधशाला बनाने का निर्णय लिया था। 20 अप्रैल 1954 में यह नैनीताल के नाम पर बनारस गवर्नमेंट संस्कृत कॉलेज के एक कक्ष में स्थापित की गई, तथा डीएसबी कॉलेज नैनीताल के डा. एएन सिंह को इसका निदेशक बनाया गया। जुलाई 54 में ही उनका हृदयाघात से निधन हो जाने के बाद नवंबर 1954 में डा. एमके वेणुबप्पू इसके निदेशक बनाए गए, जिन्होंने इसकी नैनीताल के पहाड़ों पर स्थापना की पूर्व योजना के अनुरूप इसे पहले नैनीताल के देवी लॉज में तथा बाद में वर्तमान 1951 मीटर ऊंचाई वाली मनोरा पीक चोटी में स्थापित करवाया। आगे डा. केडी सिंभ्वल 1960 से 1978, डा. एमसी पांडे 78 से बीच में कुछ अवधि छोड़कर 1994 तक इसके निदेशक रहे, तथा जुलाई 1996 में प्रो. रामसागर इसके निदेशक बने। मई 2013 में आरोप लगने एवं मामला सीबीआई तक जाने जैसी स्थितियों में उनसे पहले शक्तियां छीनी गर्इं, तथा बाद में पद से हटा दिया गया, और तभी से पहले कुछ समय डा. एके पांडे और बाद में जून 2013 से वरिष्ठ सौर वैज्ञानिक डा. वहाब उद्दीन इसकी बतौर कार्यकारी निदेशक जिम्मेदारियां संभाल रहे हैं। इधर जहां वरिष्ठ भूवैज्ञानिक प्रो. केएस वल्दिया ने जहां देश के अनेक वैज्ञानिक संस्थानों में निदेशकों-महानिदेशकों की नियुक्ति न होने पर सवाल उठाए थे, वहीं एरीज के गवर्निंग काउंसिल के अध्यक्ष डा. एसके जोशी ने भी माना कि पूर्णकालिक निदेशक न होने की वजह से 3.6 मीटर व्यास की दूरबीन की स्थापना में विलंब हुआ है।

देवभूमि को आपदा से बचाएगा नैनीताल, एसटी और डोपलर रडार लगेंगे

  • जिला प्रशासन ने डॉप्लर रडार लगाने को स्नोव्यू में तलाशी जमीन
  • एरीज भी अपने यहां लगाने को तैयार
  • एरीज में पहले ही एसटी रडार स्थापित

नवीन जोशी नैनीताल। यहां एरीज में हवाओं की निगहबानी करने वाली एसटी रडार स्थापित हो चुकी है और इसके जल्द कार्य शुरू करने की उम्मीद की जा रही है, वहीं वर्ष 2004 से लंबित डॉप्लर रडार लगाने के लिए जिला प्रशासन ने नगर के स्नोव्यू में लोनिवि की छह हजार वर्ग फीट भूमि इस हेतु चिह्नित कर ली है, जबकि एरीज के अधिकारियों ने अपने यहां इसे लगाने पर भी हामी भरी है। मौसम की सटीक जानकारी के लिए एसटी और डॉप्लर रडार की भूमिका महत्वपूर्ण है। एसटी रडार जहां वायुमंडल की करीब 20 से 25 मीटर की ऊंचाई की दिशा में हवाओं की गति पर और डॉप्लर रडार 360 डिग्री के कोण पर घूमते हुए 200 किमी की परिधि में वायुमंडल में मौजूद आर्द्रता-नमी पर नजर रखती है। इन दोनों प्रकार की रडारों के समन्वय से मौसम विभाग आने वाले मौसम की सटीक भविष्यवाणी कर पाता है।
वर्ष 2004-05 से मसूरी और नैनीताल में करीब 10 करोड़ रुपए लागत के डॉप्लर रडार लगाने की योजना बनी थी, लेकिन बाद में मामला ठंडे बस्ते में चला गया। इस बार की भीषण आपदा से सबक लेते हुए डीएम अरविंद सिंह ह्यांकी ने प्रयास किए हैं। एक ओर स्थानीय आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान (एरीज) से डॉप्लर रडार लगाने के बाबत वार्ता की। एरीज के स्थानीय अधिकारियों ने इसे अपने परिसर में लगाने पर उच्च प्रबंधन से आसानी से स्वीकृति मिल जाने की बात कही है। इसके साथ ही स्नोव्यू क्षेत्र में लोनिवि की छह हजार वर्ग फीट भूमि की पहचान कर शासन को जानकारी दे दी गई है, ताकि एरीज और स्नोव्यू के दोनों स्थानों का परीक्षण कर लिया जाए। डीएम ने कहा कि परीक्षण में जो भी स्थान उपयुक्त पाया जाएगा, उसका तत्काल प्रस्ताव बनाकर शासन को भेज दिया जाएगा। इधर राज्य के मौसम विभाग के निदेशक आनंद शर्मा ने मौसम की निगरानी के लिए डॉप्लर रडार को सबसे प्रभावी बताया। बताया कि 2004-05 से इसका प्रस्ताव लंबित था। राज्य सरकार स्थान उपलब्ध कराए तो केंद्रीय मौसम विभाग डॉप्लर रडार स्थापित करेगा।

 
एसटी रडार से 24 घंटे पहले तक हो सकेगी सटीक भविष्यवाणी
नैनीताल। एरीज में देश की सबसे बड़ी 206 मेगा हर्ट्ज क्षमता का एसटी रडार शीघ्र कार्य शुरू कर देगा। इससे पहाड़ी राज्यों में बादल फटने, तूफान आने सहित वायुयानों के बाबत करीब 24 घंटे पूर्व तक सटीक भविष्यवाणी हो सकेगी। एरीज के वायुमंडल वैज्ञानिक व एसटी रडार विोषज्ञ डा. नरेंद्र सिंह ने बताया कि यह रडार अगस्त अंत तक कार्य करना प्रारंभ कर देंगे। यह रडार वायुमंडल में चलने वाली हवाओं के 150 किमी प्रति घंटा की गति तक जाने की संभावना का दो दिन पहले ही अंदाजा लगाने की क्षमता रखती है। साथ ही यह धरती की सतह से 25 किमी ऊपर वायुमंडल की वज्रपात, बिजली की गर्जना, वायुयानों के चलने वाली हवाओं के रुख का अनुमान भी 24 घंटे पूर्व लगा सकता है।
 
धाकुड़ी, बदियाकोट व मदकोट में स्थापित हुए वायरलेस स्टेशन
नैनीताल। पुलिस ने कुमाऊं मंडल में आपदा के दौरान दूरस्थ क्षेत्रों से सूचनाओं के आदान-प्रदान के मद्देनजर तीन अस्थायी वायरलेस स्टेशनों की स्थापना की है। अपर राज्य रेडियो अधिकारी जीएस पांडे ने बताया कि बागेश्वर जिले के दूरस्थ पिंडारी ट्रेकिंग रूट पर धाकुड़ी एवं बदियाकोट में तथा पिथौरागढ़ जिले के मदकोट में वायरलेस स्टेशन स्थापित किये गए हैं। इन स्टेशनों पर वायरलेस ऑपरेटरों की तैनाती भी की गई है। कोई भी व्यक्ति यहां आकर आपदा से संबंधित सूचनाओं का आदान-प्रदान कर सकता है। कैलास मानसरोवर यात्रा मार्ग पर पहले ही पुलिस की ऐसी व्यवस्था गुंजी तक मौजूद है। इसके अलावा तीन सेटेलाइट फोन भी दूरस्थ क्षेत्रों में उपलब्ध कराए गए हैं।

शीघ्र काम करना शुरू कर देगी एसटी रडार

नैनीताल। स्थानीय एरीज में देश की सबसे बड़ी 206 मेगा हर्ट्ज क्षमता की एसटी रडार शीघ्र कार्य करने जा रही है। इस रडार से पहाड़ी राज्यों में बादल फटने, तूफान आने सहित वायुयानों के बाबत करीब २४ घंटे पहले तक सटीक भविष्यवाणी हो सकेगी। एरीज के वायुमंडल वैज्ञानिक व एसटी रडार विशेषज्ञ डा. नरेंद्र सिंह ने बताया कि इस रडार के हार्डवेयर से संबंधित सभी 588 एंटीना व इतने ही टीआर मॉड्यूल स्थापित करने संबंधित कार्य पूर्ण हो चुके हैं, और अब डिजिटल सिग्नल प्रोसेसर से संबंधित सॉफ्टवेयर के कार्य पूना की कंपनी के द्वारा किए जा रहे हैं। पूर्व में बंगलुरू की कंपनी से यही कार्य हटाना पड़ा था। डा१ सिंह ने उम्मीद जताई कि इस वर्ष के अंत तक एसटी रडार कार्य करना प्रारंभ कर देगी। यह रडार वायुमंडल में चलने वाली हवाओं के 60 मील यानी 150 किमी प्रति घंटा की गति तक जाने की संभावना का दो दिन पहले ही अंदाजा लगाने की क्षमता रखती है। साथ ही यह धरती के वायुमंडल की करीब 20 से २५ मीटर की ऊंचाई की दिशा में हवाओं की गति पर नजर रखकर बज्रपात, बिजली की गर्जना, वायुयानों के चलने वाली हवाओं के रुख का अनुमान भी 24 घंटों पूर्व लगा सकती है।

नैनीताल में बनेगा दुनिया की स्वप्न-‘टीएमटी’ का आधार

 
अमेरिका के हवाई द्वीप में स्थापित होनी है दुनिया की सबसे बड़ी 30 मीटर व्यास की दूरबीन
इसका आधार-‘मिरर सेगमेंट सपोर्टिंग एसेंबली’ बनेगी एरीज में
भारत एक हजार करोड़ रुपए की अतिमत्वाकांक्षी परियोजना में एक फीसद का है भागीदार
एरीज में ‘टीएमटी’ की बनने वाली ‘मिरर सेगमेंट सपोर्टिंग एसेंबली’
नवीन जोशी, नैनीताल। वर्ष 2001 व 2003 में पहली बार दुनिया भर के खगोल विज्ञानियों द्वारा देखा गया 30 मीटर व्यास की आप्टिकल दूरबीन ‘थर्टी मीटर टेलीस्कोप यानी टीएमटी’ का ख्वाब अब ताबीर होने की राह पर चल पड़ा है। नैनीताल स्थित एरीज का सौभाग्य ही कहेंगे कि दुनिया की इस स्वप्न सरीखी दूरबीन का आधार यानी सेगमेंट सर्पोटिंग एसेंबली नाम के करीब 60 हिस्से यहाँ बनाए जाएंगे। आधार के इन हिस्सों पर ही इस विशालकाय 56 मीटर ऊंची व करीब 10 टन भार की दूरबीन का वजन इसे पूरे आकाश में देखने योग्य घुमाने के साथ उसे सहने का गुरुत्तर दायित्व होगा। इन महत्वपूर्ण हिस्सों के निर्माण की तैयारी के क्रम में निर्माता कंपनियों के चयन की प्रक्रिया शुरू हो गई है। 
गौरतलब है कि ‘टीएमटी’ की महांयोजना करीब 1.3 बिलियन डॉलर यानी करीब 7,500 करोड़ रुपयों की है। भारत सहित छह देश-कैलटेक (California Institute of Technology), अमेरिका, कनाडा, चीन व जापान इस महांयेाजना में मिलकर कार्य कर रहे हैं। अल्ट्रावायलेट (0.3 से 0.4 मीटर तरंगदैर्ध्य पराबैगनी किरणों) से लेकर मिड इंफ्रारेड (2.5 मीटर से एक माइक्रोन तरंगदैर्ध्य तक की अवरक्त) किरणों (टीवी के रिमोट में प्रयुक्त की जाने वाली अदृय) युक्त इस दूरबीन को प्रशांत महासागर में हवाई द्वीप के मोनाकिया द्वीप समूह में ज्वालामुखी से निर्मित 13,8 फिट (4,2 मीटर) ऊंचे पर्वत पर वर्ष 2021 में स्थापित किऐ जाने की योजना है। उम्मीद है कि इसे वहाँ स्थापित किए जाने का कार्य 2014 से शुरू हो जाएगा। यह दूरबीन हमारे सौरमंडल व नजदीकी आकाशगंगाओं के साथ ही पड़ोसी आकाशगंगाओं में तारों व ग्रहों के विस्तृत अध्ययन में अगले 50 -100  वर्षों तक सक्षम होगी। भारत को इस परियोजना में अपने ज्ञान-विज्ञान, तकनीकी व उपकरणों के निर्माण में एक फीसद भागेदारी के साथ सहयोग देना है। देश के इंटर यूनिवर्सिटी सेंटर फार एस्ट्रोनॉमी एंड एस्ट्रो फिजिक्स (आईसीयूएए) पुणे को इसके सॉफ्टवेयर संबंधी, इंडियन इंस्टिूट ऑफ एस्ट्रो फिजिक्स (आईआईए) बंगलुरु को मिरर कंट्रोल सिस्टम और एरीज को मत्वपूर्ण ६०० मिरर सेगमेंट सर्पोंटिंग सिस्टम बनाने की जिम्मेदारी मिली है। यह महत्वपूर्ण हिस्से यांत्रिक के साथ ही इलेक्ट्रानिक सपोर्ट सिस्टम से भी युक्त होंगे। पीआरएल अमदाबाद व भाभा परमाणु संस्थान-बार्क मुम्बई को भी कुछ छोटी जिम्मेदारियां मिली हैं। एरीज को मिली जिम्मेदारी को सर्वाधिक मत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि उसे देश की सबसे बड़ी 3.6 मीटर व्यास की दूरबीन को निकटवर्ती देवस्थल में स्थापित करने हेतु तैयार करने का अनुभव है। एरीज के निदेशक प्रो. रामसागर इस जिम्मेदारी से खासे उत्साहित हैं। उन्होंने बताया कि मिरर सेगमेंट सपोर्टिंग सिस्टम को किसी निर्माता कंपनी से बनाया जाएगा, जिसके चयन की प्रक्रिया शुरू हो गई है। एरीज इसके निर्माण में 3.6 मीटर दूरबीन की तरह ही डिजाइन, सुपरविजन और इंजीनियरिंग में सयोग करेगा।
अवरक्त किरणों को देखना है चुनौती
देश-दुनिया में बड़ी से बड़ी व्यास की दूरबीन बनाने की कोशिशों का मूल कारण अवरक्त यानी इन्फ्रारेड किरणों को न देख पाने की समस्या है। दुनिया में अब तक मौजूद दूरबीनें 35 से 70 तरंग दैर्ध्य की किरणों तथा ऐसी किरणें उत्सर्जित करने वाले तारों व आकाशगंगाओं को ही देख पाती हैं। जबकि इससे अधिक तरंग दैर्ध्य की अवरक्त यानी इंफ्रारेड किरणों को देखने के लिए इनके अनुरूप पकरणों की जरूरत होती है। ऐसी बड़ी दूरबीनें ऐसी प्रकाश व्यवस्था से भी जुडी होंगी जो बड़ी तरंग दैर्ध्य की अवरक्त किरणों के माध्यम से बिना वायुमंडल और ब्रह्मांड में विचलित हुए सुदूर अंतरिक्ष के निर्दिस्थ स्थान पर पहुँचकर वहाँ का हांल बता पाऐंगी। प्रोजक्ट वैज्ञानिक आईयूसीएए के डा.एएन रामप्रकाश ने बताया कि 30 मीटर की दूरबीन 3.6 मीटर की दूरबीन के मुकाबले 81 गुने मद्धिम रोशनी वाले तारों को भी देख पाएगी।
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‘मीथेन सेंसर’ खोलेगा मंगल में जीवन की संभावनाओं का राज
-मंगल यान में भेजा गया मीथेन का पता लगाने वाला उपकरण
नवीन जोशी, नैनीताल। आज धरती पुत्र कहे जाने वाले लाल गृह मंगल पर भारत की मंगल यान की सफलता वहां जीवन की संभावनाओं के राज खोलने की महत्वपूर्ण कड़ी साबित हो सकती है। भारत द्वारा मंगल यान में भेजा गया ‘मीथेन प्रोब’ नाम का सेंसर उपकरण इस संबंध में सबसे महत्वपूर्ण साबित हो सकता है, क्योंकि यही उपकरण बताएगा कि मंगल ग्रह पर मीथेन है अथवा नहीं, और मीथेन गैस का मंगल ग्रह पर मिलना अथवा न मिलना ही तय करेगा कि वहां जीवन संभव है अथवा नहीं।
स्थानीय आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान यानी एरीज के वायुमंडल वैज्ञानिक डा. नरेंद्र सिंह ने बताया कि भारतीय वैज्ञानिकों की सबसे बड़ी नजर मंगल यान में मौजूद ‘मीथेन प्रोब’ नाम के यंत्र पर ही लगी हुई है। यह यंत्र मंगल यान के मंगल ग्रह की कक्षा में परिभ्रमण करने के दौरान उसकी सतह पर मौजूद मीथेन गैस की उपस्थिति का पता लगाएगा। एरीज के कार्यकारी निदेशक डा. वहाब उद्दीन ने भी उम्मीद जताई कि मंगलयान के जरिए मंगल ग्रह पर मीथेन की उपस्थिति से वहां जीवन की संभावनाओं पर पड़ा परदा उठ पाएगा।मीथेन से ही हुई पृथ्वी में जीवन की उत्पत्तिनैनीताल। एरीज के वायुमंडल वैज्ञानिक डा. नरेंद्र सिंह ने बताया कि पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति का सबसे पहला चरण मीथेन गैस की उपस्थिति से ही प्रारंभ हुआ माना जाता है। पृथ्वी में जीवन की उत्पत्ति में सर्वप्रथम मीथेन गैस उत्पन्न हुई। इसके बाद अमीनो अम्ल आए तथा आगे हाइड्रोकार्बनों व पानी के साथ सर्वप्रथम अमीबा, पैरामीशियम जैसे अतिसूक्ष्म जीवों की उत्पत्ति हुई, और धीरे-धीरे सरीसृपों, स्तनधारियों से होते हुए लंबी विकास यात्रा के बाद मानव जीवन पृथ्वी पर संभव हुआ है। इस प्रकार यदि मंगल पर मीथेन गैस के कोई सबूत मिलते हैं, तभी प्रारंभिक तौर पर कहा जा सकेगा कि वहां जीवन संभव है अथवा नहीं।मीथेन की जरा सी मात्रा बढ़ने से होती है ग्लोबलवार्मिंगनैनीताल। पृथ्वी के वायुमंडल में जहां 78 फीसद नाइट्रोजन व 21 फीसद ऑक्सीजन मौजूद है, वहीं मीथेन की मात्रा मात्र करीब 17 से 20 पीपीएम (पार्ट पर मिलियन) होती है। यह मात्रा थोड़ी भी बढ़ती है तो इसे धरती पर ग्लोबलवार्मिंग का बड़ा कारण माना जाता है। इसी कारण जहां धरती पर धान की खेती, वनस्पतियों के सड़ने व औद्योगिक उत्सर्जन जैसे कारणों से जरा भी बढ़ रही मीथेन गैस को नियंत्रित करने पर बड़े पैमाने पर प्रयास व चर्चाएं हो रही हैं, लेकिन आश्चर्य की ही बात है कि यही मीथेन पृथ्वी पर मानव जीवन के लिए कितनी जरूरी भी है।आगे मानव युक्त यानों के लिए राह खुलने की उम्मीदनैनीताल। बुधवार को मंगल यान के मंगल ग्रह की कक्षा में प्रवेश करने को लेकर एरीज के वैज्ञानिक खासे उत्साहित तथा उम्मीदमंद हैं कि इससे आगे भारत मंगल ग्रह पर पहला मानवयुक्त यान भी भेजने में भी सफल होगा। एरीज के कार्यकारी निदेशक डा. वहाब उद्दीन ने यह उम्मीद जताई। वहीं सूचना वैज्ञानिक सतीश कुमार ने कहा कि मंगल पृथ्वी के सबसे निकट का ग्रह है, इसलिए भारत और विश्व की नजर वहंा एल्युमिनियम, सिलीकॉन आदि धातुओं की उपस्थिति पर भी लगी हुई हैं। वहीं रवींद्र कुमार यादव ने कहा कि आज के वैश्विक पूंजीवादी दौर में यह भारत के लिए विश्व को अपनी अंतरिक्ष में परिवहन सुविधा दिखाने के रूप में बड़ी छलांग दिखाने मौका भी है। खास बात यह भी है कि भारत का मंगल मिशन नासा के ऐसे मिशन के मुकाबले छह गुना तक सस्ता है, इस तरह दुनिया भारत की सेवाएं लेने को मजबूर होगी।

एरीज से हवा की ‘फितरत’ पर नजर

एरीज में वायुमंडल में 30-32 किमी तक के प्रदूषण का मापन शुरू हीलियम गैस से भरे गुब्बारों में लगाए गए उपकरणों से एकत्रित किए जाते हैं आंकड़े

नवीन जोशी नैनीताल। नैनीताल के आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान ‘एरीज’ से हवा में आने वाले प्रदूषण पर नजर रखी जा रही है। आने वाले दिनों में राज्य के लिए यंह ‘कार्बन क्रेडिट’ मांगने का आधार साबित हो सकता है। एरीज में इसरो, अमेरिका के ऊर्जा विभाग व आईआईएससी बेंगलुरु के सहयोग से परियोजना चल रही है। इसके तहत हर सप्ताह वायुमंडल में हीलियम गैस से भरे गुब्बारों को वायुमंडल में छोड़ा जाता है। ये गुब्बारे धरती की सतह से 30 से 32 किमी. की ऊंचाई तक जाते हैं। अपने साथ लेकर गए दो उपकरणों ‘ओजोन सौंडे’ व ‘वेदर सौंडे’ की मदद से हवाओं की दिशा, दबाव, तापमान व ओजोन की मात्रा जैसे आंकड़े एकत्र करते हैं। इतनी ऊंचाई तय करने में गुब्बारों को करीब एक से डेढ़ घंटे लगते हैं, इस दौरान यह लगातार आंकड़े देते रहते हैं। इस परियोजना के वैज्ञानिक डा. मनीष नजा का कहना है कि नैनीताल के वायुमंडल में चूंकि अपना प्रदूषण नहीं है। यहां के वायुमंडल से प्राप्त प्रदूषण व ओजोन गैस के आंकड़े पूरी तरह से बाहर से आने वाली हवाओं के माध्यम से लाए होते हैं। इसलिए वायुमंडल में आने वाली हवाओं की दिशा का अध्ययन किया जा रहा है। आने वाले तीन माह में इस बाबत ठोस तरीके से कहा जा सकेगा कि देश-दुनिया के किस क्षेत्र के प्रदूषण का यहां के वायुमंडल पर प्रभाव पड़ रहा है। अब तक के अध्ययनों से यह देखा गया है कि पहाड़ पर अप्रैल-मई में लगने वाली जंगलों की आग के कारण पांच किमी से ऊपर के वायुमंडल में ओजोन की अत्यधिक मात्रा रिकार्ड की गई है। शेष समय मात्रा सामान्य है। 

मैदानी क्षेत्रों पर भी नजर : 
एरीज में एक अन्य परियोजना ‘गंगा वैली ऐरोसोल एक्सपेरीमेंट’ के तहत हर दिन चार छोटे गुब्बारे भी हवा में छोड़े जा रहे हैं। इनके माध्यम से गंगा के मैदानी क्षेत्रों में औद्योगीकरण के परिणामस्वरूप हो रही ग्लोबल वार्मिग व ग्लोबल कूलिंग तथा सौर विकिरण पर पड़ रहे प्रभाव का आकलन किया जा रहा है। मौसम वैज्ञानिक डा. मनीष नजा के अनुसार भविष्य में पंतनगर और लखनऊ से भी इस प्रकार के आंकड़े लिए जाएंगे। उपग्रह से प्राप्त चित्रों में इन क्षेत्रों में काफी मात्रा में औद्योगिक प्रदूषण देखा गया है, जिसका अब विस्तृत अध्ययन किया जा रहा है। 
उपकरण लौटाने पर इनाम : 
बैलून के जरिए वायुमंडल में छोड़े जाने वाले उपकरण करीब चार घंटे में धरती पर कहीं भी आ गिरते हैं। हालांकि जीपीएस सिस्टम से जुड़े इन उपकरणों के गिरने के बावजूद पूरी जानकारी एरीज में होती है। इसके बावजूद यहां के अधिकारियों ने इनकी सूचना देने व लौटाने पर पांच सौ व एक हजार रुपये के इनाम घोषित किए हैं। इन उपकरणों पर इनाम की जानकारी और लौटाने का पता भी लिखा होता है। इसलिए यदि आपको कहीं ऐसे पता व सूचना लिखे वैज्ञानिक उपकरण मिल जाएं तो इन्हें एरीज को लौटाकर इनाम ले सकते हैं।

 

अपनी बनाई दूरबीनों से देख सकेंगे चांद-सितारे

  • नेहरू तारामंडल इलाहाबाद में चल रही है 12 दिवसीय कार्यशाला 
  • कार्यशाला में दूरबीनों के लेंसों पर एल्युमिनियम की परत चढ़ाने का कार्य एरीज में
नैनीताल। केंद्र सरकार की जनता को खगोल विज्ञान से जोड़ने के उद्देश्य से चल रही एक योजना के तहत मूलत: नेहरू तारामंडल इलाहाबाद में बीती पांच से 16 जनवरी तक के लिए एक 12 दिवसीय कार्यशाला चल रही है, जिसमें देशभर के 40 चयनित लोगों को खुद के लिए पांच इंच व्यास की 25 दूरबीनें बनाने का मौका दिया जा रहा है। एक मीटर फोकस दूरी वाली इन ‘न्यूटोनियम डोप्सोनियन’ प्रकार की दूरबीनों से सूर्य, चंद्रमा के अलावा मंगल, बुध, बृहस्पति व उसके चार उपग्रह, शुक्र एवं उसके छह उपग्रहों, शनि तथा उसके उपग्रह टाइटन व अरुण (यूरेनस) आदि ग्रहों और उनके उपग्रहों को देखा जा सकेगा। कार्यशाला के तहत सभी दूरबीनों के लेंसों पर उनकी परावर्तन क्षमता बढ़ाने के लिए एल्युमिनियम की परत चढ़ाने (एल्युमिनियम कोटिंग) का कार्य एरीज में हो रहा है। 
सोमवार (12.01.2015) को एरीज में कार्यशाला से जुड़े एवं खुद की भी दूरबीन तैयार कर रहे एरीज के विज्ञान केंद्र तथा पब्लिक आउटरीच केंद्र के समन्वयक डा. आरके यादव की अगुआई में आयूका पुणो, नेहरू प्लेनिटोरियम इलाहाबाद व एरीज के लोगों व विशेषज्ञों ने लेंसों पर एल्युमिनियम की परत चढ़ाने का कार्य प्रारंभ किया। यादव ने बताया कि इससे पूर्व प्रतिभागियों ने इलाहाबाद में पांच इंच व्यास के 19 मिमी मोटे लेंसों को सिलिकॉन कार्बाइड से घिसकर उनके केंद्र पर एक मिमी की गहराई युक्त अवतल लेंस के रूप में तैयार किया है। दूरबीनें 18वीं सदी में महान वैज्ञानिक आइजेक न्यूटन द्वारा प्रयोग की गई तकनीक पर बनाई जा रही हैं, इसलिए उन्हीं के नाम पर दूरबीन का नाम रखा गया है। आगे लेंसों को वापस इलाहाबाद ले जाकर वहां इन्हें एक खोखली नली में एक और 12 मिमी मोटे लेंस के साथ समायोजित कर दूरबीन का स्वरूप दिया जाएगा। कार्यशाला में केंद्र सरकार के विज्ञान एवं प्रोद्योगिकी मंत्रालय का विज्ञान प्रसार संस्थान नोएडा पांच लाख रुपये खर्च कर रहा है। डा. विमान मेंधी, तुषार पुरोहित, उमंग गुप्ता, बीसी पंत, अशोक सिंह, प्रेम कुमार, हरीश आर्या, राजदीप सिंह व बाबू राम आदि इस कार्य में जुटे हुए थे। लेंस से कभी न देखें सूर्य को नैनीताल। आयूका पुणो से आये लेंस निर्माण विशेषज्ञ तुषार पुरोहित ने कहा कि सूर्य को किसी भी प्रकार की, यहां तक कि छोटी बच्चों की दूरबीनों से भी नहीं देखना चाहिए। इससे आंखों की रोशनी जा सकती है। सामान्य कैमरों से सूर्य की फोटो भी नहीं खींचनी चाहिए। यदि बहुत जरूरी हो तो लेंसों पर सूर्य से बचाव की फिल्म लगाकर ही सूर्य को देखा जा सकता है। 

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