चांद-सितारों की तलाश करते ‘एरीज’ पर फिर उभरा भ्रष्टाचार का ‘ग्रहण’

  • पिछले विवादित निदेशक प्रो. रामसागर के कार्यकाल पर कैग ने लगाए लाखों रूपयों के वित्तीय अनियमितता के आरोप
  • नैनीताल निवासी देवेन्द्र जोशी द्वारा सूचना के अधिकार अधिनियम के अंतर्गत मांगी गयी रिपोर्ट में हुआ खुलासा 

Aries, Nainital

नवीन जोशी, नैनीताल। चांद-सितारों व आकाशगंगाओं के अध्ययन के कार्य में जुटे नैनीताल स्थित आर्यभट्ट प्रेक्षण एवं शोध संस्थान यानी एरीज और खासकर इसके पिछले विवादित निदेशक प्रो. रामसागर के कार्यकाल पर भ्रष्टाचार के आरोप रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं। भारत सरकार के लेखा परीक्षा वैज्ञानिक विभाग यानी कैग के प्रधान निदेशक द्वारा वर्ष 2012 से 2016 के बीच विभिन्न मामलों का निरीक्षण करने का बाद तैयार रिपोर्ट में नैनीताल स्थित एरीज परिसर में 80 सेमी की दूरबीन स्थापित करने, देवस्थल में स्थापित 3.6 मीटर की टेलीस्कॉप के लिए स्पेक्ट्रोग्राफ उपकरण का निर्माण करने तथा गैरकानूनी तरीकों से पदों का सृजन करने व केन्द्रीय वित्त मंत्रालय की सहमति के बिना वेतन वृद्धि करने जैसे कई बड़ी गड़बड़ियां होने और सरकारी कोष को करोड़ों रुपए का नुकसान करने की बात कही गयी हैं।

भारत सरकार के विद्यान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के तहत उत्तराखंड में संचालित एरीज के बाबत कैग की करीब डेढ़ दर्जन पन्नों वाली इस रिपोर्ट के अनुसार नैनीताल स्थित एरीज परिसर में 80 सेमी की दूरबीन को स्थापित करने में कई तय प्रावधानों का उल्लंघन किया गया। इस प्रोजेक्ट को पूरा करने में संबंधित कंपनी ने 259 दिनों की देरी की। इसके बावजूद एरीज ने कंपनी को 54.13 लाख में से 53.90 लाख रूपये का भुगतान बेरोकटोक कर दिया। प्रोजेक्ट में देरी के लिए न तो कंपनी का भुगतान रोका और न ही बैंक गारंटी कैश करायी। इस प्रकार एरीज की लापरवाही से सरकारी कोष को 53.90 लाख रूपये का नुकसान उठाना पड़ा, और इतनी धनराशि खर्च करने के बावजूद तकनीकी गड़बड़ियों के चलते टेलीस्कोप लगाने का उद्देश्य भी पूरा नहीं हो पाया। इसी एरीज के देवस्थल परिसर में स्थापित एशिया की अपनी तरह की सबसे बड़ी 3.6 मीटर की आप्टिकल टेलीस्कोप के लिए स्पेक्ट्रोग्राफ नामक यंत्र की जरूरत थी, जिसे एरीज ने अपने वर्कशाप में बनाने का निर्णय लिया। इसके लिए वर्कशॉप में सीएनसी वर्टिकल मशीनरी सेंटर की स्थापना करने के लिए निविदा के माध्यम से बैंगलुरू की भारत फ्रिट्ज वेलनेर लिमिटेड नामक कंपनी को 60 लाख रूपये में जिम्मेदारी सौंपी गयी। बाद में धनराशि को 60 से बढ़ाकर पहले 77.95 लाख और दुबारा बढ़ाकर 78.35 लाख रूपये कर दिया गया। बावजूद कंपनी ने न केवल काम में देरी की बल्कि जो मशीनरी उपलब्ध करायी वह भी काम नहीं कर पायी। यानी स्पेक्ट्रोग्राफ उपकरण बनाने का काम भी शुरू नहीं हो पाया। लेकिन इस कंपनी को भी दो चरणों में कुल 74.04 लाख रूपये का यानी करीब पूरा भुगतान कर दिया गया।

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इसके बाद एरीज ने अपनी नाकामी को छुपाने के लिए कुशल मैकेनिकल इंजीनियर नहीं होने का बहाना बनाकर नवम्बर 2014 में गाजियाबाद के पवन उद्योग नामक आउटसोर्स कंपनी को 37.74 लाख रूपये में स्पेक्ट्रोग्राफ खरीदने का आर्डर दे दिया। इस कंपनी ने भी निर्धारित समयावधि के बाद उपकरण उपलब्ध कराया, और उसे 35.90 लाख रूपये का भुगतान कर दिया गया। इस प्रकार रिपोर्ट में कहा गया है कि एरीज की लापरवाही के कारण सरकारी कोष को लाखों रूपये का नुकसान उठाना पड़ा है। इसी प्रकार रिपोर्ट में के अनुसार एरीज ने भारत सरकार के वित्त तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय की अनुमति के बिना ही 26 पदों का पदों का सृजन कर दिया, और केन्द्र सरकार के नियमों व प्राविधानों का खुल्लम-खुल्ला उल्लंघन कर वैज्ञानिकों व इंजीनियरों के 25 पदों व रजिस्ट्रार के एक पद को भी अपग्रेड कर दिया। इस बाबत रिपोर्ट में साफ लिखा गया है कि एरीज ने मौलिक नियमों का उल्लंघन किया और 43.73 लाख रूपये का अनावश्यक वित्तीय बोझ बढ़ाया। रिपोर्ट में कहा गया कि एरीज के निदेशक का वर्ष 2004 व 2006 में वेतनमान नियमविरुद्ध दो बार 16400-450-20000 से बढ़ाकर 22400-600-26000 कर दिया गया। साथ ही ग्रेड बी के 11 वैज्ञानिकों को ग्रेड सी व ग्रेड सी के तीन वैज्ञानिकों को ग्रेड डी में यानी कुल 14 वैज्ञानिकों को समय पूर्व पदोन्नति दी गयी। इससे 65.42 लाख रूपये का अनावश्यक बोझ पड़ा। इसी तरह 2009 से 2016 के मध्य 2082.10 लाख रूपये की लागत से विभिन्न प्रकार के कार्य करवाये लेकिन केन्द्र सरकार के नियमों के तहत 104.11 लाख रूपये का लेबर सेस व वर्क कांटेक्ट टैक्स (डब्ल्यूसीटी) की वसूली नहीं की। इसमें ‘द बिल्डिंग एंड अदर कंस्ट्रक्शन वर्क्स वेलफेयर एक्ट 1996’ का उल्लंघन करते हुए 20.82 लाख रूपये का लेबर सेस व 83.29 लाख रूपये का डब्ल्यूसीटी शामिल है। इस बाबत पूछे जाने पर एरीज के रजिस्ट्रार ने कहा कि आरोप प्रारंभिक व पुरानी लंबी अवधि के हैं, लिहाजा भ्रष्टाचार के आरोपों की अभी पुष्टि नहीं हुई हैं। इनमें से कई पर कैग को जवाबी रिपोर्ट भेज दी गयी है।

एरीज में रिकार्ड 16 वर्ष लंबी सल्तनत रही है विवादित निदेशक प्रो. रामसागर की

Pr. Ram Sagar

1996 से 2012 तक उत्तर प्रदेश राजकीय वेधशाला के उत्तराखंड वेधशाला और एरीज बनने के बाद तक रहा निदेशक के रूप में सर्वाधिक लंबा कार्यकाल
नवीन जोशी, नैनीताल। सूर्य एवं चांद सितारों के प्रेक्षण, वायुमंडलीय एवं मौसमी शोधों के साथ देश की सबसे बड़ी ३.६ मीटर व्यास की दूरबीन स्थापित करने और दुनिया की सबसे बड़ी ३० मीटर व्यास की दूरबीन में सहभागिता के लिए पहचाने जाने वाला एरीज यानी आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान इस बार अपने पूर्व निदेशक प्रो. रामसागर २००८ के एक मामले में सीबीआई द्वारा की गई जांच के बाद जेल जाने को लेकर सुर्खियों में रहे हैं, आखिर उन्हें देहरादून स्थित सीबीआई अदालत में आत्मसमर्पण करना पड़ा।

उल्लेखनीय है कि १९५५ में यूपी राजकीय वेधशाला के रूप में स्थापित वर्तमान एरीज के करीब छह दशक लंबे इतिहास में प्रो. राम सागर के नाम सर्वाधित १६ वर्ष निदेशक रहने का रिकार्ड दर्ज है। इस बीच कभी अपने लोगों को ही नियुक्तियां देने तो कभी एरीज-मनोरा पीक और कभी देवस्थल में अनाधिकृत तौर पर पेड़ काटने जैसे आरोप भी उन पर लगते रहे, लेकिन उनकी जमी-जमाई सल्तनत में कभी कोई विरोध का स्वर अधिक मुखर नहीं हो पाया। किंतु इधर उन पर बुरे वक्त ने ऐसा खेल दिखाया कि एक अभियंता की नियुक्ति के मामले ने ऐसा तूल पकड़ा कि उनके खिलाफ सीबीआई जांच हो गई, और लाख प्रयासों के बाद असफल रहने के बाद आखिर उन्हें आत्मसमर्पण करने को मजबूर ही होना पड़ा। इधर एरीज में उनके जेल जाने पर एक भी अधिकारी, वैज्ञानिक कर्मचारी एक भी शब्द बोलने से बचते दिखे। कुछ का कहना था, मामले में कानून अपना कार्य कर रहा है, उसे अपना कार्य करने देना चाहिए।

बनारस के एक कमरे से देश की सबसे बड़ी दूरबीन तक का सुनहरा इतिहास रहा है एरीज का

नैनीताल। आजादी के बाद खगोल विज्ञान प्रेमी यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री संपूर्णानंद ने सर्वप्रथम १९५१ में राजकीय वेधशाला बनाने का निर्णय लिया था। २० अप्रैल १९५४ में यह बरारस गवर्नमेंट संस्कृत कॉलेज के एक कक्ष में स्थापित की गई। डीएसबी कॉलेज नैनीताल के डा. एएन सिंह को इसका निदेशक बनाया गया, लेकिन जुलाई ५४ में ही उनका हृदयाघात से निधन हो जाने के बाद नवंबर १९५४ में डा. एमके वेणुबप्पू इसके निदेशक बनाए गए, जिन्होंने पहाड़ पर ही खगोल विज्ञान की वेधशाला होने की संभावना को देखते हुए इसे पहले नैनीताल के देवी लॉज में तथा बाद में वर्तमान १९५१ मीटर ऊंचाई वाली मनोरा पीक चोटी में स्थापित करवाया। आगे डा. केडी सिंभ्वल १९६० से १९७८, डा. एमसी पांडे ७८ से बीच में कुछ अवधि छोड़कर १९९५ तक इसके निदेशक रहे, तथा जुलाई १९९६ में प्रो. रामसागर इसके निदेशक बने। आगे राज्य बनने के बाद यूपी राजकीय वेधशाला उत्तराखंड सरकार को हस्तांतरित हुई तथा २२ मार्च २००४ में भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रोद्योगिकी मंत्रालय ने इसे अपने हाथ में लेकर एरीज के रूप में केंद्रीय संस्थान की मान्यता दे दी। वर्तमान में यहां सीसीडी कैमरा, स्पेक्टोफोटोमीटर व फिल्टर्स जैसी आधुनिकतम सुविधाओं युक्त १५ सेमी, ३८ सेमी, ५२ सेमी, ५६ सेमी व १.०४ मीटर एवं देवस्थल में १.३ मीटर की दूरबीनें उपलब्ध हैं, जिन पर खगोल विज्ञान एवं खगोल भौतिकी, वायुमंडलीय विज्ञान एवं सूर्य तथा सौर प्रणाली पर २४ वैज्ञानिक गहन शोध करते रहते हैं। २८ अक्टूबर २००३ को यहां के वरिष्ठ सौर वैज्ञानिक व वर्तमान कार्यवाहक निदेशक डा. वहाबउद्दीन ने विश्व में पहली बार १५ सेमी की दूरबीन से ४बी/एक्स१७.२क्लास की ऐतिहासिक बड़ी सौर भभूका का प्रेक्षण करने में सफलता प्राप्त की थी। ग्रह नक्षत्रों के मामले में अंधविश्वासों से घिरे आमजन तक विज्ञान की पहुंच बढ़ाने एवं खासकर छात्राों को ब्रह्मांड की जानकरी देने की लिऐ एरीज ने अपने ‘पब्लिक आउटरीच” कार्यक्रम के तहत पूर्णतया कम्प्यूटरीकृत दूरबीन (प्लेनिटोरियम) स्थापित की है। देवस्थल में देश व एशिया की अपनी तरह की सबसे बड़ी ३.६ मीटर व्यास की की आप्टिकल अगले कुछ माह में स्थापित होने जा रही है, जिसके लिए १९८० के दौर से प्रयास चल रहे हैं।

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