नैनीताल में आज से शुरू होगा तीन दिवसीय नैनीताल बर्ड फेस्टिवल

  • पहुचेंगे देश भर के बर्ड वॉचर एवं खासकर 30 महिला बर्ड फोटोग्राफर
  • आगे अक्टूबर-नवंबर माह में फ्लैट्स मैदान में मुख्यमंत्री की उपस्थिति के बीच इसी तरह का अंतराष्ट्रीय महोत्सव कराने की भी योजना
पहले नैनीताल बर्ड फेस्टिवल के पोस्टर का अनावरण करते डीएफओ एवं सहयोगी स्ट्रैब पिक्सल क्लब के सदस्य।

नैनीताल। मुख्यालय स्थित हिमालयन बॉटनिकल गार्डन में शुक्रवार 27 अप्रैल से तीन दिवसीय पहला ‘नैनीताल बर्ड फेस्टिवल’ का आयोजन शुरू होने जा रहा है। आयोजक नैनीताल वन प्रभाग के प्रभागीय वनाधिकारी डा. धर्म सिंह मीणा ने बृहस्पतिवार को पत्रकार वार्ता में बताया कि इस महोत्सव के दौरान खासकर देश भर से पहुंच रही 30 महिला छायाकारों के चिड़ियों के चित्रों की ‘पिंक’ प्रदर्शनी, कार्यशाला, समूह चर्चा, चित्रकला प्रतियोगिता एवं प्रकृति पर प्रश्नोत्तरी सहित कई तरह के कार्यक्रम होंगे। इस दौरान उपस्थित प्रतिभागियों को प्रकृति के बारे में शिक्षित करने, बर्ड वाचिंग एवं आखिर में पुरस्कार वितरण खासकर स्कूलों को ‘चल वैजयंती ट्रॉफी’ दिये जाने के कार्यक्रम भी होंगे। आगे यह महोत्सव हर वर्ष आयोजित करने और इधर अक्टूबर-नवंबर माह में फ्लैट्स मैदान में मुख्यमंत्री की उपस्थिति के बीच इसी तरह का अंतराष्ट्रीय महोत्सव कराया जाएगा। साथ ही हर विद्यालय में बच्चों के ‘नेचर क्लब’ स्थापित करने और सातताल, किलबरी जैसे परिंदों की अधिक उपस्थिति वाले जंगलों में प्रवेश के लिए शुल्क लिये जाने की भी योजना है।
नैनीताल चिड़ियाघर में आयोजित पत्रकार वार्ता में डीएफओ मीणा ने कहा कि परिंदे किसी भी क्षेत्र, जंगल की समृद्ध जैव विविधता के सबसे बड़े सूचक हैं। इनके महोत्सव का उद्देश्य न केवल चिड़ियों, वरन प्रकृति के समग्र तौर पर संरक्षण का है। पूरी तरह हर वर्ग की सहभागिता करने और सबको लाभांन्वित करने के प्रयासों के साथ आयोजित हो रहे इस महोत्सव में बच्चों की भी मोबाइल से खींचे गए फोटो, चित्रकारी व प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिताएं आयोजित होंगी, और विजेताओं को मोबाइल फोन, डिजिटल कैमरे व टैबलेट पुरस्कार में दिये जाएंगे, साथ ही उनमें प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता विकसित की जाएगी। बताया कि इस महोत्सव के लिए देश भर से करीब 150 पेशेवरों ने पंजीकरण करा दिया है। इसके अलावा प्रकृति व पर्यावरण के जानकारों के बीच समूह चर्चा एवं 28 व 29 को ‘बर्ड रेस’ का आयोजन भी किया जाएगा, जिसमें प्रतिभागियों को अधिक से अधिक परिंदों को रिकार्ड करना होगा। पत्रकार वार्ता में सहयोगी की भूमिका निभा रहे स्ट्रैब पिक्सल क्लब के संस्थापक पारस बोरा, शेरवुड कॉलेज के अजय शर्मा, ममता चंद आदि भी मौजूद रहे।

 विश्व भर के पक्षियों का जैसे तीर्थ है नैनीताल

  • देश की 1266 व उत्तराखंड की 710 में से 600 पक्षी प्रजातियों मिलती हैं यहां
  • देश में आने वाली 400 प्रवासी प्रजातियों में से 200 से अधिक भी आती हैं यहां
  • स्थाई रूप से 200 प्रजातियों का प्राकृतिक आवास भी है नैनीताल
  • आखिरी बार ‘माउनटेन क्वेल’ को भी नैनीताल में ही देखा गया था

नवीन जोशी, नैनीताल। सरोवरनगरी नैनीताल की विश्व प्रसिद्ध पहचान पर्वतीय पर्यटन नगरी के रूप में ही की जाती है, इसकी स्थापना ही एक विदेशी सैलानी पीटर बैरन ने 18 नवम्बर 1841 में की थी, और तभी से यह नगर देश-विदेश के सैलानियों का स्वर्ग है। लेकिन इससे इतर इस नगर की एक और पहचान विश्व भर में है, जिसे बहुधा कम ही लोग शायद जानते हों। इस पहचान के लिए नगर को न तो कहीं बताने की जरूरत है, और नहीं महंगे विज्ञापन करने की। दरअसल यह पहचान मानव नहीं वरन पक्षियों के बीच है। पक्षी विशेषज्ञों के अनुसार दुनियां में 10,000 पक्षी प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें से भारत में तीन नई मिलाकर कुल 1266 पक्षी प्रजातियों में कुमाऊँ व उत्तराखंड में 710 पक्षी प्रजातियां पाई जाती हैं। और इनमें से 70-80 फीसद यानी करीब 600 तक नैनीताल में पाई जाती हैं। इनके अलावा भी प्रवासी पक्षियों या पर्यटन की भाषा में पक्षी सैलानियों की बात करें तो देश में कुल आने वाली 400 प्रवासी पक्षी प्रजातियों में से 200 से अधिक यहां आती हैं, जबकि 200 से अधिक पक्षी प्रजातियों का यहां प्राकृतिक आवास भी है। यही आकर्षण है कि देश दुनियां के पक्षी प्रेमी प्रति वर्ष बड़ी संख्या में केवल पक्षियों के दीदार को यहाँ पहुंचाते हैं. इस प्रकार नैनीताल को विश्व भर के पक्षियों का तीर्थ कहा जा सकता है।
नैनीताल के मंगोली, बजून, पंगोट, सातताल व नैनीझील एवं कूड़ा खड्ड पक्षियों के जैसे तीर्थ ही हैं। अगर देश-विदेश में नैनीताल का इस रूप में प्रचार किया जाऐ तो यहां अनंत संभावनायें हैं। गर्मियों में लगभग 20 प्रकार की बतखें, तीन प्रकार की क्रेन सहित सैकड़ों प्रजातियों के पक्षी साइबेरिया के कुनावात प्रान्त स्थित ओका नदी में प्रजनन करते हैं। यहां सितम्बर माह में सर्दी बढ़ने पर और बच्चों के उड़ने लायक हो जाने पर यह कजाकिस्तान-साइबेरिया की सीमा में कुछ दिन रुकते हैं और फिर उजबेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, अफगानिस्तान व पाकिस्तान होते हुए भारत आते हैं। इनमें से लगभग 600 पक्षी प्रजातियां लगभग एक से डेड़ माह की उड़ान के बाद भारत पहुंचती हैं, जिनमें से 200 से अधिक उत्तराखण्ड के पहाड़ों और खास तौर पर अक्टूबर से नवंबर अन्त तक नैनीताल पहुँच जाते हैं। इनके उपग्रह एवं ट्रांसमीटर की मदद से भी रूट परीक्षण किए गऐ हैं। इस प्रकार दुनियां की कुल 10.5 हजार पक्षी प्रजातियों में से देश में जो 1266 प्रजातियां हैं उनमें से 600 से अधिक प्रजातियां नैनीताल में पाई जाती हैं। डीएफओ डीएस मीणा ने बताया कि इधर नैनीताल में पूर्वी हिमालय के भूटान में पायी जाने वाली हरी रंग की खूबसूरत हेलमेट बर्ड नाम से विख्यात लांग टेल ब्रॉड बिल के करीब आधा दर्जन जोड़े भी सातताल क्षेत्र में करीब 3 महीने प्रवास करती रिकार्ड की गयी है। वहीं नैनीताल चिड़ियाघर में भी 49 पक्षी प्रजातियां रिकार्ड की गयी हैं।

नैनीताल जिले में पाए जाने वाली अन्य पक्षी

नैनीताल जिले में पाए जाने वाले पक्षियों में रेड बिल्ड ब्लू मैगपाई, रेड बिल्ड मैगपाई, किंगफिशर, नीले-गले और भूरे रंग के शिर वाले बारबेट, लिनेटेड बारबेट, क्रिमसन फ्रंटेड बारबेट, कॉपरस्मिथ बारबेट, प्लम हेडेड पाराकीट यानी कठफोड़वा, स्लेटी हेडेड पाराकीट, चेस्टनट बेलीड थ्रस, टिटमाउस, बाबलर्स, जंगल आवलेट, फिश ईगल, हिमालय कठफोड़वा, पाइड कठफोड़वा, ब्राउन कैप्ड वुडपीकर, ग्रे कैप्ड पिग्मी वुडपीकर, ब्राउन फ्रंटेड वुडपीकर, स्ट्राइप ब्रेस्टेड वुडपीकर, येलो क्राउन्ड वुडपीकर, रूफोस बेलीड वुडपीकर, क्रिमसन ब्रेस्टेड यानी लाल छाती वाला कठफोड़वा, हिमालयी कठफोड़वा, लेसर येलोनेप वुडपीकर, ग्रेटर येलोनेप वुडपीकर, स्ट्रेक थ्रोटेड वुडपीकर, ग्रे हेेडेड यानी भूरे शिर वाला कठफोड़वा, स्केली बेलीड वुडपीकर, कॉमन फ्लेमबैक वुडपीकर, लेडी गोल्ड सनबर्ड, क्रिमसन सनबर्ड, हिमालयन किंगफिशर, ब्राउन हेडेट स्टार्क बिल्ड किंगफिशर, स्टार्क बिल्ड किंगफिशर, पाइड किंगफिशर, कॉमन किंगफिशर, ब्लू इयर्ड किंगफिशर, ग्रीन-टेल्ड सनबर्ड, बैगनी सनबर्ड, मिसेज गॉल्ड सनबर्ड, काले गले वाली ब्लेक थ्रोटेड सनबर्ड, ब्लेक ब्रेस्टेड यानी काले छाती वाली सनबर्ड, फायर टेल्ड सनबर्ड, रसेट यानी लाल गौरैया, फिंच, माउंटेन हॉक ईगल, काले ईगल, सफेद पूंछ वाली नीडल टेल, काली बुलबुल, येलो थ्रोटेड यानी पीले गले वाली वार्बलर, लेमन रम्प्ड वार्बलर, एशी यानी राख जैसे गले वाली वार्बलर, आम गिद्ध, लॉफिंगथ्रश, इंडियन ट्री पाइज, ब्लू ह्विसलिंग थ्रस यानी चिड़िया, लैम्रेगियर, हिमालयन ग्रिफॉन, यूरेशियन ग्रिफॉन, क्रेस्टेड सेरपेंट ईगल, फ्लाई कैचर्स यानी तितलियां पकड़ने वाले, चीड़ फीजेंट्स, कलीज फीजेंट्स, कोकलास फीजेंट्स, डॉलर बर्ड, लीफ बर्ड्स, फ्लावर पीकर, थिक बिल्ड फ्लावरपीकर, प्लेन लीफ फ्लावरपीकर, फायर ब्रेस्टेड फ्लावरपीकर, ब्लेक हेडेड जे, यूरेशियन जे, स्केली ब्रेस्टेड रेन बाबलर, ब्लेक चिन्ड बाबलर, रुफोस बाबलर, ब्लेक कैप्ड सिबिया, ब्लू ह्विसलिंग थ्रस, ह्वाइट रम्प्ड नीडलटेल, ब्लेक हेडेड जे, ब्लेक लोर्ड, ब्लेक थ्रोटेड टिट्स यानी छोटी चिड़िया,रूफोस ब्रेस्टेड एसेंटर, ग्रे विंग्ड ब्लेक बर्ड यानी भूरे पंखों वाली काली चिड़िया, कॉमर बुजॉर्ड, पिंक ब्रावड रोजफिंच, कॉमर वुड पिजन, चेस्टनट टेल्ड मिन्ला।

‘माउंटेन क्वेल’

‘माउंटेन क्वेल’ यानि “काला तीतर” को केवल भारत में तथा आखिरी बार 1876 में नैनीताल की “शेर-का-डांडा” पहाडी में देखने के दावे किये जाते हैं। इस पक्षी को उस समय मेजर कास्वेथन नाम के अंग्रेज द्वारा मारे जाने की बात कही जाती है। इससे पूर्व 1865 में कैनथ मैकनन ने मसूरी के बुद्धराजा व बेकनाग के बीच में इसके एक जोड़े का शिकार किया था, जबकि 1867 में मसूरी के जेवपानी में कैप्टन हटन ने अपने घर के पास इसके आधा दर्जन जोड़े देखने का दावा किया था। आम तौर पर पहाड़ी बटेर कहे जाने माउंटेन क्वेल की गर्दन चकोर की सफेद रंग की गर्दन से इतर काली होती है। आम तौर पर जोड़े में दिखने वाले और घास के मैदानों में रहने वाले इस पक्षी का प्रिय भोजन घास के बीज बताए जाते हैं। कांग्रेस के संस्थापक व प्रसिद्ध पक्षी विशेषज्ञ एओ ह्यूम द्वारा 1885 में लिखे एक दस्तावेज के अनुसार विश्व में इसकी केवल 10 खालें ही उपलब्ध थीं, जिनमें से पांच खालें स्वयं ह्यूम के संग्रहलय में, दो खालें लार्ड डर्बिन के संग्रहालय में तथा एक-एक ब्रिटिश म्यूजियम व कर्नल टाइटलर के संग्रहालय में सुरक्षित रखी गई थीं। नैनीताल में मारी गई आखिरी माउंटेन क्वेल की खाल के बारे में कोई जानकारी नहीं है।

नैनीताल जू में जर्मनी, इटली, उजबेकिस्तान से आएंगे हिम तेंदुए

-साथ ही दार्जिलिंग से एक नर मारखोर व रेड पांडा भी लाने की चल रही है कोशिश

-नस्ल सुधार के लिए ‘ब्लड एक्सचेंज’ यानी ‘रक्त बदलाव’ की प्रक्रिया के तहत पक्षियों व रेड पांडा की अदला-बदली करने की भी चल रही कोशिश
नैनीताल। सरोवरनगरी स्थित गोविंद बल्लभ पंत उच्च स्थलीय प्राणि उद्यान में शीघ्र जर्मनी, इटली अथवा उज्बेकिस्तान से हिम तेंदुए का एक जोड़ा तथा दार्जिलिंग स्थित चिड़ियाघर से एक नर मारखोर लाने और एक रेड पांडा की ‘ब्लड एक्सचेंज’ यानी ‘रक्त बदलाव’ की प्रक्रिया के तहत अदला-बदली करने की कोशिश चल रही है। यह जानकारी देते हुए चिड़ियाघर के निदेशक डीएफओ धर्म सिंह मीणा ने बताया कि इस हेतु राष्ट्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण से पत्राचार चल रहा है। उल्लेखनीय है कि पूर्व में नैनीताल जू में हिम तेंदुआ था, जिसकी मृत्यु हो गयी थी। इसी तरह दार्जिलिंग से लाये गए पाकिस्तान के राष्ट्रीय पशु मारखोर के जोड़े में से नर की जल्दी ही मृत्यु हो जाने के बाद से इसकी मादा अकेली पड़ी हुई है। वहीं हालिया वर्षों में यहां दार्जिलिंग से ही लाये गए रेड पांडा ने सफलता पूर्वक अपने बच्चों को भी जन्म दिया है।
विदित हो कि बृहस्पतिवार को यहां कानपुर चिड़ियाघर से लेडी एम्हर्स्ट, गोल्डन एम्हर्स्ट, रेड जंगल फाउल व सिल्वर फीजेंट के चार नर व पांच मादा पक्षी ‘ब्लड एक्सचेंज’ की प्रक्रिया के तहत लाये गये हैं, और इन्हीं प्रजातियों के यहां पहले से मौजूद इतने ही पक्षियों को इसी कोशिश के तहत कानपुर भेजा जा रहा है।

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