इस बार समय से खिली ‘जंगल की ज्वाला’ संग मुस्काया पहाड़…

Ecology

नवीन जोशी, नैनीताल। ‘…पारा भीड़ा बुरूंशी फूली रै, मैं ज कूंछू मेरी हीरू रिसै रै….’ देवभूमि उत्तराखण्ड के पहाड़ी जंगलों में पशु चारण करते ग्वाल बालों की जुबान पर यह गीत चढ़ने लगा है। कारण उनका प्यारा लाल, सुर्ख बुरांश का फूल खिलने लगा है। उत्तराखण्ड के राज्य वृक्ष पर लकदक खिला यह फूल सरोवरनगरी के निकट भवाली, रामगढ़ व मुक्तेश्वर के जंगलों में पिछले कुछ ही दिन से इस तरह मुस्कुराने लगा है, कि इसके खिलने से महके ऋतुराज बसन्त के साथ मुस्काते पहाड़ों की खूबसूरती में चार चाँद लगा दिए हैं। कोशिश की जाऐ तो फूलों के मौसम की यह खूबसूरती प्रदेश के पर्यटन में भी चार चाँद लगाते हुए काफी लाभकर हो सकती है। वनस्पति विज्ञानियों का कहना है कि इस बार इसके समय पूर्व खिलने की कुछ छिटपुट खबरें तो आईं, परंतु वास्तव में यह अब खिलने लगा है, जो कि अधिक जल्दी नहीं है।

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बुरांश का फूल जितना सुन्दर है, उतना ही अधिक लाभकारी भी। वनस्पति विज्ञान की भाषा में ‘रोडोडेण्ड्रोन’ और हिन्दी के सुकुमार छायावादी कवि सुमित्रानन्दन पन्त द्वारा ‘जंगल की ज्वाला’ कहे गये बुरांश का पहाड़ से गहरा संबंध है। इसीलिए इसे देवभूमि उत्तराखंड में राज्य वृक्ष का दर्जा मिला हुआ है। इधर जलवायु परिवर्तन का असर इस पेड़ पर जहां समय पूर्व खिलने के रूप में सर्वाधिक दिखाई दे रहा है। इस प्रकार जलवायु परिवर्तनों पर शोध करने के लिए भी इस वृक्ष की उपयोगिता बढ़ जाती है। दूसरी ओर पशुओं के लिए उत्तम चारा व जलौनी लकड़ी होने के कारण इसके जंगलों के आसपास के ग्रामीण भी इसे खासा नुकसान पहुंचा रहे हैं, जिसे रोकने की जरूरत है। फलस्वरूप इसके जंगल सिमटते जा रहे हैं।

28 दिन समय पूर्व खिला बुरांश: शोध
नैनीताल। बुरांश में राज्य की आर्थिकी, स्वास्थ्य और पर्यावरण सहित अनेक आयाम समाहित हैं। प्रदेश में 1,200 से 4,800 मीटर तक की ऊंचाई वाले करीब एक लाख हैक्टेयर से अधिक क्षेत्रफल में सामान्यतया लाल के साथ ही गुलाबी, बैंगनी और सफेद रंगों में मिलने वाला और चैत्र (मार्च-अप्रैल) में खिलने वाला बुरांश बीते कई वर्षों में पौष-माघ (जनवरी-फरवरी) में भी खिलने लगा था। इस आधार पर इस पर ‘ग्लोबल वार्मिंग’ का सर्वाधिक असर पड़ने को लेकर चिंता जताई जाने लगी है। डीएफओ डा. पराग मधुकर धकाते कहते हैं कि हर फूल को खिलने के लिए एक विशेष ‘फोटो पीरियड’ यानी एक खास रोशनी और तापमान की जरूरत पड़ती है। यदि किसी पुष्प वृक्ष को कृत्रिम रूप से भी यह जरूरी रोशनी व तापमान दिया जाए तो वह समय से पूर्व खिल सकता है। वहीं कुमाऊं विवि के वनस्पति विज्ञान विभाग के प्राध्यापक प्रो. ललित तिवाड़ी ने बताया कि उनके एक शोध छात्र ने बुरांश के खिलने के समय पर पांच वर्ष लंबा शोध किया था, जिसमें इसके करीब 28 दिन जल्दी खिलने की पुष्टि हुई है। उन्होंने कहा कि इस वर्ष यह समय पर ही खिला है।

राज्य की आर्थिकी से जुड़ा व जेव विविधता का परिचायक भी है बहुगुणी बुरांश

नैनीताल। बुरांश राज्य के मध्य एवं उच्च मिालयी क्षेत्रों में ग्रामीणों के लिए जलौनी लकड़ी व पालतू पशुओं को सर्दी से बचाने के लिए बिछौने व चारे के रूप में प्रयोग किया जाता है, वहीं मानव स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से इसके फूलों का रस शरीर में हीमोग्लोबिन की कमी को दूर करने वाला, लौह तत्व की वृद्धि करने वाला तथा हृदय रोगों एवं उच्च रक्तचाप में लाभदायक होता है। इस प्रकार इसके जूस का भी अच्छा-खासा कारोबार होता है। अकेले नैनीताल के फल प्रसंस्कण केंद्र में प्रति वर्ष करीब 1,500 लीटर जबकि प्रदेश में करीब 2 हजार लीटर तक जूस निकाला जाता है। इस सदापर्णी वृक्ष के रक्तिम सुर्ख फूल में शहद का भण्डार होता है। ऊंचाई बढ़ने के साथ इसके रंग में परिवर्तन होता जाता है और यह लाल रंग खोता हुआ गुलाबी, सफेद व बैगनी रंगों में भी पाया जाता है। एक ओर जहां यह चीड़ मिश्रित वनों में भी पाया जाता है, वहीं हिमालय के बुग्यालों के करीब होने वाली सीमित वृक्ष प्रजातियों में भी यह कम लंबाई के साथ मिल जाता है। इससे जूस, स्कवैश, जैम आदि उत्पाद बनाऐ जाते हैं, जो रक्तशोधक एवं हीमोग्लोबिन की पूर्तिकारक के रूप में अचूक औषधि माने जाते हैं।

बुरांश का एक अन्य तरह से भी बड़ा व्यवसायिक इस्तेमाल हो सकता है। पहाड़ पर जिस मौसम में यह खिलता है, वह प्रदेश के पर्यटन के लिहाज से ‘ऑफ पीक’ यानी सर्वाधिक बुरा समय कहा जाता है, क्योंकि इन दिनों बर्फवारी की आस सिमट जाती है, और मैदानों में खास गर्मी नहीं बढ़ी होती। ऐसे में बुरांश के खिलने से पहाड़ में खिले फूलों का मौसम जहाँ सैलानियों को बड़ी संख्या में आकर्षित कर प्रदेश को बड़ी राजस्व आय दे सकता है, वहीं सैलानियों को आकर्षित करने के लिए भी यह बड़ा माध्यम साबित हो सकता है।

सुमित्रानंदन पंत ने बुरांश पर ही लिखी एकमात्र कुमाउनी कविता, नेहरू भी रहे प्रशंषक
नैनीताल। राज्य वृक्ष बुरांश का छायावाद के सुकुमार कवि सुमित्रानंदन पंत ने अपनी मातृभाषा कुमाऊंनी में लिखी एकमात्र कविता में कुछ इस तरह वर्णन किया है: ‘सार जंगल में त्वि ज क्वे नहां रे क्वे नहां, फुलन छे के बुरूंश जंगल जस जलि जां। सल्ल छ, दयार छ, पईं छ अयांर छ, पै त्वि में दिलैकि आग, त्वि में छ ज्वानिक फाग।’ अर्थात, बुरांश तुझ सा सारे जंगल में कोई नहीं है। जब तू फूलता है, सारा जंगल मानो जल उठता है। जंगल में और भी कई तरह के वृक्ष हैं पर एकमात्र तुझमें ही दिल की आग और यौवन का फाग भी मौजूद है। देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू भी इसके प्रशंशकों में थे। उन्होंने अपने संस्मरणों में लिखा ‘पहाड़ पर बुरांश के रंजित लाल स्थल दूर ही से दिख रहे थे।’ महाकवि अज्ञेय ने भी अपनी कविताओं में इसका कई बार जिक्र किया। वहीं कवि श्रीकान्त वर्मा भी इसका जिक्र करने से स्वयं को नहीं रोक पाये. उन्होंने लिखा, ‘दुपहर भर उड़ती रही सड़क पर मुरम की धूल, शाम को उभरा मैं, तुमने मुझे पुकारा बुरूंश का फूल’। राज्य के कई अन्य कुमाउंनी-गढ़वाली कवियों ने भी इसे कभी प्रेमिका के गालों तो कभी उसके रूप सौन्दर्य के लिए खूब इस्तेमाल किया है।

आड़ू, बेड़ू जैसा नहीं घिंघारूघिंघारू

नवीन जोशी, नैनीताल। जी हां, आड़ू व बेड़ू के बाद पहाड़ पर घिंघारू (वानस्पतिक नाम पाइरा कैंथा क्रेनुलाटा-Pyracantha crenulata) की झाडियां भी छोटे-छोटे लाल रंग के फलों से लक-दक हो जाती हैं। इनके करीब-करीब एक साथ फलने की वजह से ही शायद एक पहाड़ी कहावत ‘आड़ू, बेड़ू घिंघारू’ में निकृष्ट व्यक्तियों की उपमा देने के लिए प्रयोग किया जाता है। लेकिन वास्तव में ऐसा है नहीं। हालांकि फल के रूप में आड़ू और बेड़ू भी कम गुणवान नहीं, लेकिन घिंघारू तो इनसे कहीं अधिक गुणी नजर आता है। पहाड़ों में अनेक स्थानों पर इसकी झाड़ियां बहुतायत में मिलती हैं, लेकिन सरोवरनगरी नैनीताल में नैनी झील किनारे इसकी केवल झाड़ी भी अगस्त-सितंबर माह में लाल रंग के फलों से लदकर खुद भी लाल नजर आती है, और सैलानियों को खूब आकर्षित करती हैं।

छोटी झाड़ी होने के बावजूद घिंघारू की लकड़ी की लाठियां व हॉकी सर्वश्रेष्ठ मानी जाती हैं। घरों में इसकी लकड़ी को पवित्र मानते हुए भूत भगाने के विश्वास के साथ भी रखा जाता है। दांत के दर्द में औषधि की तरह दातून के रूप में भी इसका प्रयोग होता है। बच्चे इसके फलों को बड़े चाव से खाते हैं, जबकि इधर रक्त वर्धक औषधि के रूप में इसका जूस भी तैयार किया जाने लगा है। विदेशों में घिंघारू के पौधों को ‘बोंजाई’ यानी छोटे आकार के वृक्ष की तरह में घरों के भीतर सजावटी पौधों के रूप में उगाया जाता है. इसकी पत्तियों को हर्बल चाय बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है.। सेब की तरह नजर आने वाले नारंगी लाल रंग के छोटे फल बच्चों के साथ ही पक्षियों के भी प्रिय भोजन हैं।किल्मोड़ा नवीन जोशी के लिए इमेज परिणामkilmoda (किल्मोड़ा): The famous fruit of Hills like Hisaaloo and Bedu 1

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