ग्लोबलवार्मिंग का प्रभाव ! दो माह पूर्व ही “काफल पाको पूसा…!!!” 🤔

नैनीताल। कुमाऊं के सुप्रसिद्ध लोकगीत ‘बेड़ू पाको बारों मासा, ओ नरैंण काफल पाको चैता’ में वर्णित व चैत यानी चैत्र माह के आखिर में पकना शुरू करने वाला और वास्तव में मई-जून की गर्मियों में शीतलता प्रदान करने वाला काफल (वानस्पतिक नाम मैरिका एस्कुलेंटा-Myrica esculenta) इस वर्ष संभवतया अपने इतिहास में पहली बार, कड़ाके की शर्दियों के पौष माह में ही पक गया है।

शायद इसलिये कि मैदानों में छाए भीषण कोहरे व ठंड से इतर पहाड़ों पर दिन में चटख धूप खिली हुई है, और रात्रि में खुले आसमान से जबरदस्त मात्रा में बर्फ की तरह सूखा पाला टपक रहा है। मुनस्यारी को छोड़कर काफल के मुख्य उत्पादक स्थल कुमाऊं में कहीं भी बर्फवारी दूर, ठीक से शीतकालीन वर्षा भी नहीं हुई है। इस कारण खेतों में रबी के अंतर्गत गेहूं व अन्य के बीज अंकुरित ही नहीं हो पाए या अंकुरित होकर सूखने लगे हैं। ऐसे में कुमाऊं मंडल के आयुक्त चंद्रशेखर भट्ट ने सभी जिलों के जिलाधिकारियों को सूखे का आंकलन करने के आदेश जारी कर दिए हैं।

पर्यावरण प्रेमी चंदन नयाल ने बताया कि जनपद के धारी ब्लॉक में टांडी पोखराड़ स्थित मझेड़ा वन पंचायत में 10 दिन पहले ही काफल पकने शुरू हो गए थे, और अब ठीक से पक गए हैं। उधर पहाड़पानी में भी काफल पके हुए नजर आ रहे हैं। इसे ‘ग्लोबलवार्मिंग’ का प्रभाव माना जा रहा है।

भैया, यह का फल है ? जी यह ‘काफल’ ही है .

नवीन जोशी, नैनीताल। दिल्ली की गर्मी से बचकर नैनीताल आऐ सैलानी दिवाकर शर्मा सरोवरनगरी पहुंचे। बस से उतरते ही झील के किनारे बिकते एक नऐ से फल को देख बच्चे उसे लेने की जिद करने लगे। शर्मा जी ने पूछ लिया, भय्या यह का फल है ? टोकरी में फल लेकर बेच रहे विक्रेता प्रकाश ने जवाब दिया `काफल´ है। शर्मा जी की समझ में कुछ न आया, पुन: फल का नाम पूछा लेकिन फिर वही जवाब। आखिर शर्मा जी के एक स्थानीय मित्र ने स्थिति स्पष्ट की, भाई साहब, इस फल का नाम ही काफल है। दाम पूछे तो जवाब मिला, 150 रुपऐ किलो। आखिर कागज की शंकु के अकार की पुड़िया दस रुपऐ में ली, लेकिन स्वाद लाजबाब था, सो एक से काम न चला। सब के लिए अलग अलग ली। अधिक लेने की इच्छा भी जताई, तो दुकानदार बोला, बाबूजी यह पहाड़ का फल है। बस, चखने भर को ही उपलब्ध है।

पहाड़ में `काफल पाको मैंल न चाखो´`उतुकै पोथी पुरै पुरै´ जैसी कई कहानियां व प्रशिद्ध  कुमाउनी गीत ‘बेडू पाको बारों मासा’ भी (अगली पंक्ति ‘ओ नरैन काफल पाको चैता’) `काफल´ के इर्द गिर्द ही घूमते हैं। कहा जाता है कि आज भी पहाड़ के जंगलों में दो अलग अलग पक्षी गर्मियों के इस मौसम में इस तरह की ध्वनियां निकालते हैं। एक कहानी के अनुसार यह पक्षी पूर्व जन्म में मां-बेटी थे, बेटी को मां ने काफलों के पहरे में लगाया था। धूप के कारण काफल सूख कर कम दिखने लगे, जिस पर मां ने बेटी पर काफलों को खाने का आरोप लगाया। चूंकि वह काफल का स्वाद भी नहीं ले पाई थी, इसलिऐ इस दु:ख में उसकी मृत्यु हो गई और वह अगले जन्म में पक्षी बन कर `काफल पाको मैंल न चाखो´ यानी काफल पक गऐ किन्तु मैं नहीं चख पायी की टोर लगाती रहती है। उधर, शाम को काफल पुन: नम होकर पूर्व की ही मात्रा में दिखने लगे। पुत्री की मौत के लिए स्वयं को दोषी मानते हुऐ मां की भी मृत्यु हो गई और वह अगले जन्म में `उतुकै पोथी पुरै-पुरै´ यानी पुत्री काफल पूरे ही हैं की टोर लगाने वाली चिड़िया बन गई। आज भी पहाड़ी जंगलों में गर्मियों के मौसम में ऐसी टोर लगाने वाले दो पक्षियों की उदास सी आवाजें खूब सुनाई पड़ती हैं। गर्मियों में होने वाले इस फल का यह नाम कैसे पड़ा, इसके पीछे भी सैलानी शर्मा जी व दुकानदार प्रकाश के बीच जैसा वार्तालाप ही आधार बताया जाता है। कहा जाता है कि किसी जमाने में एक अंग्रेज द्वारा इसका नाम इसी तरह `का फल है ?’ पूछने पर ही इसका यह नाम पड़ा। पकने पर लाल एवं फिर काले से रंग वाली ‘जंगली बेरी’ सरीखे फल की प्रवृत्ति शीतलता प्रदान करने वाली है। कब्ज दूर करने या पेट साफ़ करने में तो यह अचूक माना ही जाता है, इसे हृदय सम्बंधी रोगों में भी लाभदायक बताया जाता है। बीते वर्षों में काफल  ‘काफल पाको चैता’ के अनुसार चैत्र यानी मार्च-अप्रैल की बजाय दो माह पूर्व माघ यानी जनवरी-फरवरी माह में ही बाजार में आकर वनस्पति विज्ञानियों का भी चौंका रहा था, किन्तु इस वर्ष यह ठीक समय पर बाजार में आया था। गत दिनों 200 रुपऐ किग्रा तक बिकने के बाद इन दिनों यह कुछ सस्ता 150 रुपऐ तक में बिक रहा है। लेकिन बाजार में इसकी आमद बेहद सीमित है, और दाम इससे कम होने के भी कोई संभावनायें नहीं हैं। केवल गिने-चुने कुछ स्थानीय लोग ही इसे बेच रहे हैं। इसलिए यदि आप भी इस रसीले फल का स्वाद लेना चाहें तो आपको जल्द पहाड़ आना होगा।

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