/प्रधानमंत्री मोदी जी को वोट देने वाले एक मतदाता का खुला ख़त

प्रधानमंत्री मोदी जी को वोट देने वाले एक मतदाता का खुला ख़त

प्रधानमंत्री जी,
मैं आपसे अपनी कोई भी बात कहूँ या सवाल करूँ, उससे पहले स्पष्ट करना चाहता हूँ कि संभवतः इस देश के सबसे आखिरी नागरिकों में शुमार होने के कारण मैं आपसे कुछ भी कहने या पूछने का अधिकारी हूँ ही नहीं। मैं हाथ जोड़कर यह भी साफ कर देना चाहता हूँ कि मेरी मंशा सिर्फ अपनी फिक्र को आप तक पहुँचाने की है। क्योंकि मेरे वचन प्रतिकूल होते ही आपकी सरकार, पार्टी और समर्थन में खड़े लोग राष्ट्र के प्रति मेरी आस्था पर सवाल खड़े करने में बिल्कुल देर नहीं करेंगे। यह भी बता दूँ कि मैं किसी अफजल गैंग, सेक्युलर जमात या तुष्टिकरण मंडली का न कभी सदस्य रहा हूँ न ही समर्थक। बल्कि पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनाव में आपके संबोधन-वचन से प्रभावित होकर मैंने आपको ही अपना वोट दिया था। जी हाँ ! मैंने भाजपा को नहीं, आपको अपना वोट दिया था। यह सोचकर कि दशकों से तमाम परेशानियों और साजिशों के बावजूद किसी प्रकार घिसड़ रहे देश को यदि आपका साहसिक मार्गदर्शन मिला तो स्थितियां निश्चित ही सुधर जाएँगी। हालांकि सच कहूँ तो पहले की अपेक्षा आज स्थितियां और अधिक बिगड़ी हुई मालूम हो रही हैं। संभव है कि मैं गलत हूँ पर मेरी आशंकाओं और अवसाद को तृप्ति नहीं मिल पाने के कारण ही आपसे शंकाओं का निवारण चाहता हूँ।
विपत्ति तब और भयावह हो जाती है, जब उसके आसन्न होने का कारण स्पष्ट न हो। क्योंकि, सही-सही कारण पता चले बिना विपत्ति से निदान प्राप्त करना असंभव है। विपत्ति की छोटी सी चिंगारी पर लगातार बह रही आशंकाओं की हवा अवसाद को दावानल बना रही है। यह मेरी निजी राय नहीं है बल्कि लगातार मंदी की चपेट में आता बाजार इसकी गवाही दे रहा है। मुझे बताइए कि क्या यह मंदी किसी साजिश का परिणाम है? यह षड्यंत्र कौन रच रहा है? सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि क्या उसकी नजर में देश का बहुसंख्यक व्यापारी वर्ग बेईमान है या इतने बड़े देश की अर्थव्यवस्था को मंदी के दलदल में धकेलने की ताकत मुट्ठी भर बेईमान कारोबारियों ने जुटा रखी है।
चूंकि मैं एक गैर राजनीतिक व्यक्ति हूँ तो सीधे-सीधे अपनी आशंका के कारणों पर प्रकाश डालता हूँ। ऐसे भी आपके पास ऐसी फिजूल बातों के लिए वक्त नहीं है और होना भी नहीं चाहिए। आप मेरी बातों से ज्यादा चिंतित न हों क्योंकि सोशल मीडिया से लेकर प्रिंट तक लगभग 90 फीसद भारतीय इतने लंबे लेख को पढ़ने की जहमत नहीं उठाएंगे। इस लेख में संतृप्त मसाला है न तो आधुनिक रैप। इसमें गोमूत्र का समर्थन-विरोध है न अफजल-कसाब का।
प्रधानमंत्री जी! सोशल मीडिया पर आपके विरोधी कभी टेंट हाउस पर टैक्स का विरोध रट रहे हैं तो कभी रेस्टोरेंट और होटल पर। कोई बिस्कुट पर टैक्स की दरों का रोना रोता है तो कहीं कफन के कपड़े पर टैक्स के लिए सीना पीटा जा रहा है। हालांकि मैं जानता हूँ कि यह समस्त विलाप फर्जी हैं। टेंट हाउस, टैक्सी कैब जैसी सेवाएं 2004 में तत्कालीन वित्तमंत्री पी. चिदंबरम द्वारा सेवाकर लगाए जाने के समय से ही कर योग्य हैं। पहले सेवाकर का दायरा चार लाख के कारोबार पर था, जिसे आपने 10 और 20 लाख तक करके व्यापारियों को राहत ही दी है।
मेरा दर्द कुछ और है, जिसे आपके अन्धविरोधी (जिन्हें मैं आपका एजेंट मानता हूँ) कभी उजागर नहीं करेंगे। मुझे उपभोक्ता वस्तुओं के विक्रय पर 20 लाख रुपए के कारोबार के कारण व्यापारी को GST के दायरे में लाए जाने की वजह समझ नहीं आ रही है। सभी जानते हैं कि जनरल स्टोर के कारोबार में अधिकतम 10-12 फीसद का लाभ शामिल होता है। औसतन यह लाभ 9-10 प्रतिशत से अधिक कभी नहीं होता। इसका अर्थ हुआ कि साल में 25 लाख रुपए का माल बेचने वाले व्यापारी की सालाना सकल आय लगभग ₹ 2.5 लाख होती है। इसमें दुकान का किराया, बिजली, माल भाड़ा आदि खर्च घटाने के बाद शुद्ध लाभ अधिकतम ₹ 1.7 लाख होता है। मतलब मासिक आय ₹ 13 हजार से भी कम बैठती है। उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में GST का दायरा ₹ 10 लाख है। अतः कुल ₹ 6500 प्रतिमाह कमाने वाले को भी रिटर्न भरना होगा। आप ही बताइए कि यह कितना तार्किक और न्यायसम्मत है? मैं मानता हूँ कि ऊपर के स्तर पर चोरी रोकने के लिए आपने नीचे से टैक्स की व्यवस्था दी है। मगर, क्या आप जानते हैं कि एक अशिक्षित, गरीब और पिछड़े समाज के व्यक्ति के लिए बिलिंग और रिटर्न कितना सरल या कठिन शब्द है? क्या आपको मालूम है कि टैक्स वकील और सीए आज जीएसटी रिटर्न भरने के लिए प्रति तिमाही ₹ 5000 मांग रहे हैं। मतलब मासिक ₹ 6500 कमाने वाला व्यक्ति ₹ 1667 सिर्फ इसलिए खर्चे, क्योंकि सरकार बड़े चोरों को पकड़ने के लिए प्रतिबद्ध है।
नहीं! आपने ऐसा कतई नहीं सोचा होगा। आप इतने मामूली से काम के लिए छोटे व्यापारियों को कभी परेशान नहीं कर सकते।
वजह कुछ और ही होगी। क्योंकि आपने जीएसटी की नई व्यवस्था में एक और विकल्प दिया है, एक प्रतिशत पर सकल सेटलमेंट का विकल्प। प्रथमतः तो यह बहुत सहज लगता है। मुझे भी लगा। मगर, जब मुझे मालूम चला कि एफएमसीजी क्षेत्र की सभी कंपनियां बिना जीएसटी रजिस्ट्रेशन के दैनिक उपभोग से संबंधित माल के विक्रेताओं को उत्पाद नहीं देने के लिए विवश हैं, तो मेरा माथा ठनका। मुझे ₹ 75 लाख पर एक फीसद समायोजन की याद आई। सामान्य समझ वाला व्यक्ति भी यह जनता है कि लाख-दो लाख रुपए सकल पूंजी वाला व्यापारी इसके बारे में सोचेगा भी नहीं। यह पूंजी से मजबूत व्यक्ति का साधन है। या उस व्यक्ति का, जिसका माल उच्च टैक्स स्लैब (18, 28) में हो। व्यवहार में होगा यह कि सबल वर्ग अपने परिवार के 4-6 सदस्यों के नाम पर एक फीसद समायोजन में रजिस्ट्रेशन कराएगा। दूसरी तरफ एजेंसी से माल मिलना बंद होने पर छोटे-मंझोले किराना व्यापारी इन एक फीसद समायोजन वाले कारोबारियों से माल खरीदने के लिए मजबूर हो जाएंगे क्योंकि इन्हें एजेंसी/डिस्ट्रीब्यूटर से माल मिलेगा ही नहीं। वहीं रिटेलर खोने से परेशान थोक विक्रेता भी एक प्रतिशत समायोजन वाले को खुशी-खुशी माल बेच देगा। मतलब यह हुआ कि थोक और फुटकर विक्रेता के बीच एक बिचौलिया आ गया। यह बिचौलिया नकद छूट के साथ ही कंपनी से आने वाले सभी प्रकार के विक्रय वृद्धि संबंधी स्कीम तो गटकेगा ही, मार्जिन से भी कर के रूप में एक-दो प्रतिशत लाभ भी पचा लेगा। नतीजतन, फुटकर विक्रेता के लिए कीमतें इतनी कसी हुई होंगी कि वह अपने ग्राहक को छूट का लाभ देने में पूर्णतः असमर्थ हो जाएगा। मगर, इससे आपका क्या लेना-देना है? मैने भी शुरुआत में यही सोचा था।
फिर मुझे लगा कि आपकी सरकार तो बाजार से बिचौलिए हटाकर कीमतें दुरुस्त करने के वादे पर आई थी। आपकी सूक्ष्म दृष्टि को भी मैं खूब पहचानता हूँ। मुझे याद है, देश के सोशल मीडिया वीरों को विकलांग और दिव्यांग की बहस में उलझाकर आपने कैसे देश भर के बैंकों में सीढ़ी के साथ रैम्प बनवाए थे। जबकि उन रैम्प का इस्तेमाल नोटबंदी के वक़्त होना था, जिसकी किसी को भनक तक नहीं थी। कहीं ऐसा ही कोई खेल इस नई कर प्रणाली में भी तो नहीं छिपा है?
मैं यह नहीं कह रहा कि आपने या आपकी सरकार ने बिग बाजार सरीखे मल्टी ब्रांड स्टोर से सुपारी लेकर देश भर की गलियों-मोहल्लों में जारी छोटे-छोटे रिटेल स्टोर को बंद कराने की योजना बनाई है। लेकिन मैं उस वक्त भयभीत हो गया, जब मुझे मालूम हुआ कि मुकेश अम्बानी जी रिलायंस जियो के माध्यम से देश का सबसे बड़ा रिटेल चैनल खोलने की तैयारी कर रहे हैं। पहले चरण में ही 11000 आउटलेट खोले जाने हैं, जो इस वर्ष दिसंबर तक संचालित भी होने लगेंगे। ठीक उसी समय जीएसटी अपने पूरे शबाब पर आएगा और छोटे-छोटे दुकानदार बिचौलिए से महंगा माल खरीदने को मजबूर हो चुके होंगे। ऐसे में रिलायंस जियो का सस्ता और ब्रांडेड स्टोर कुछ अलग ही चमक बिखेर रहा होगा।
मुझे देशभर में रिलायंस जियो का रिटेल स्टोर खुलने से कोई परेशानी नहीं है। प्रतियोगिता बढ़ेगी तो ग्राहक का लाभ स्वाभाविक है। इससे अर्थव्यवस्था भी मजबूत होती है। मगर, खेल के नियम सभी खिलाड़ियों के लिए एक समान होने चाहिए। देश को चलाने में यदि प्रशासन और न्यायालय ही सक्षम होते तो नगर पालिका और प्रधानी से लेकर केंद्र तक में सरकार की क्या आवश्यकता थी? मुझे लगता है कि सरकार की उपयोगिता समाज में उपस्थित व्यवहारिक समस्याओं का निदान ढूंढने से ही है। कमजोर को संबल देना और मजबूत से अधिकतम कर प्राप्ति भी इसी का उदाहरण है। लेकिन यहाँ तो खेल के नियम ही पलटे जा रहे हैं। कहीं यह सब किसी सुनियोजित अनिष्ट की दस्तक तो नहीं है? कहीं अच्छे दिन की आस लगाए बैठे देशभर के छोटे-छोटे दुकानदार कल को किसी मल्टीब्रांड स्टोर के नौकर बनने के लिए मजबूर तो नहीं हो जाएंगे? फिलहाल तो आप मुझे बस इतना ही बता दीजिए कि ₹ 10 लाख का सालाना कारोबार करने वाले अनपढ़-अधकचरा जागरूकताविहीन, गरीब और पिछड़े व्यापारी को शामिल करने का क्या औचित्य है? क्या उत्पाद के आखिरी दस फीसद मूल्य पर 5, 12 या 18 फीसद टैक्स की वसूली सीधा थोक विक्रेता से नहीं की जा सकती थी? 90 प्रतिशत रकम पर टैक्स चुकाकर माल खरीदने वाला खुदरा व्यापारी महज एक फीसद की चोरी करके किस प्रकार का और कितनी मात्रा में कालाधन उत्सर्जित कर सकेगा???
#अनिल ‘क़ामिल’