/भारत के खिलाफ ‘बृहत्तर नेपाल’ के नाम पर मुहिम चलाने से बाज नहीं आ रहे नेपाली चरमपंथी

भारत के खिलाफ ‘बृहत्तर नेपाल’ के नाम पर मुहिम चलाने से बाज नहीं आ रहे नेपाली चरमपंथी

दलिए भागबन्डामा रमाउनु आफन्त आफन्तलाई दुस्मन देख्नु नेपाली नागरिकको कमजोरी हो ! यो अबस्थाको सिर्जना गर्ने नेताहरुनै हुन् ! येस्बाट फाइदा लिने भारतनै हो! सन् १९४७ मा ब्रिटिशले सुगौली सन्धिबाट हडपेको नेपालीको भुमि छोडेकै हो! तत्कालिन नेपाली सासक्ले गुमेको भुमि फिर्ता नलिए पनि त्यो भुमि नेपालकै हो! नेपाली जनता तेती कम्जोर छैनन् ! नेपालीकै छोराहरु भारतीय गोर्खा रैफलमा छन् जसले भारतको सुरक्ष्या गरिरहेका छन्! भारतीय सेनाबाट गोर्खाली सेना नेपाल फिर्ता बोलाउने होभने भारतको अस्तित्तो धरापमा पर्छ ! नेपालीमा एकता छिट्टै पैदा होस् !
फेसबुक पर ‘ग्रेटर नेपाल’ पेज से

-1815 की सुगौली की संधि को नकारते हुए पूरे उत्तराखंड सहित हिमांचल प्रदेश को बिलासपुर तक बताया जा रहा ‘ग्रेटर’ नेपाल का हिस्सा
-भारत के हिमाचल, बिहार व पश्चिम बंगाल तथा बांग्ला देश के कुछ हिस्सों को भी ग्रेटर नेपाल का हिस्सा बताते हुए किया जा रहा है दुष्प्रचार
-फेसबुक सरीखी सोशल साइटों पर चलाई जा रही है मुहिम
नवीन जोशी, नैनीताल। हजारों करोड़ रुपए की भारतीय मदद और हमेशा से पड़ोसी मित्र राष्ट्र कहे जाने वाले के उलट नेपाल में ‘ग्रेटर नेपाल राष्ट्रवादी मोर्चा’ सरीखे कुछ संगठन भारत विरोधी छद्म युद्ध की जमीन तैयार करने से बाज नहीं आ रहे हैं। नेपाल सरकार के आर्थिक मोर्चे पर चीन की और रहे झुकाव से भी उनकी मुहिम को बल मिल रहा है। यह संगठन 2 दिसंबर 1815 को हस्ताक्षरित और 4 मार्च 1816 को पुष्टि होने वाली अंग्रेजों व गोर्खाओं के बीच हुई सुगौली की संधि से इतर भारत के हिमांचल, उत्तराखंड, बिहार व पश्चिम बंगाल तक गंगा नदी के उत्तर के क्षेत्रों और बांग्ला देश के भी एक हिस्से को जोड़कर ‘बृहत्तर नेपाल’ बनाने का दिवा स्वप्न पाल रहे हैं। नेपाल का संविधान बनाने में जुटी नेपाली संविधान सभा पर भी इस हेतु दबाव बनाया जा रहा है।

फेसबुक पर ग्रेटर नेपाल राष्ट्रवादी मोर्चा केंद्रीय समिति द्वारा तैयार पोस्टर को पोस्ट करते हुए टीका नाथ ढुंगाना का कहना है कि चार मार्च 1816 को हुई सुगौली की संधि में नेपाल के अनेक हिस्से भारत और बांग्लादेश में चले गए थे। इनमें से 14 अगस्त 1947 से दिनाजपुर व रंगपुर के हिस्से पूर्वी पाकिस्तान (1971 से बांग्लादेश) ने और 15 अगस्त 1947 से सिक्किम, दार्जिलिंग, सिलीगुड़ी, जलपाइगुड़ी, सुपोल, जोगबनी, बेतिया, मोतिहारी, सारनलगायत व गंगा के उत्तर के क्षेत्रों में भारत का अवैध कब्जा है। वर्ष 1950 में भारत और नेपाल के बीच जो संधि हुई थी, उसकी धारा-आठ में सुगौली की संधि को समाप्त घोषित कर दिया गया था। इसलिए मोर्चा द्वारा भारत द्वारा कथित तौर पर ‘हड़पी’  गई जमीन के लिए वह अपनी जनता से ‘आवाज से आवाज’ मिलाने का आह्वान कर रहे हैं। अपनी अपने मतलब की अधूरी जानकारी के आधार पर उनका कहना है कि 1801 में नेपाल का क्षेत्रफल 368000  वर्ग किमी. था। वे यह नहीं बताते 1801 से पूर्व उत्तराखण्ड में चंद शासन के दौरान नेपाल का क्षेत्रफल कितना था। बहरहाल, उनका आरोप है कि भारत-बांग्लादेश ने उनकी 57,736 वर्ग किमी भूमि हड़पी है, जो उन्हें मिल जाए तो वर्तमान में 1,47,,181 वर्ग किमी क्षेत्रफल वाला नेपाल, 2,04,917वर्ग किमी वाला ग्रेटर नेपाल हो जाएगा। खास बात यह भी है कि अपनी बात को वह भारत के फेसबुक ग्रुपों में पेस्ट करने से भी गुरेज नहीं कर रहे।

चीन के शडयंत्र का हिस्सा है यह मुहिम: ले.जनरल भंडारी

MC Bhandari Lt.Gen. Dr.
मोहन चंद्र भंडारी

नैनीताल। सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल मोहन चंद्र भंडारी का कहना है कि नेपाल की यह मुहिम चीन के शडयंत्र का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि विस्तारवादी सोच वाला चीन तिब्बत को अपनी हथेली और लद्दाख, नेपाल, भूटान, सिक्किम व अरुणांचल प्रदेश को अपनी पांच अंगुलियां कहता है, और उसका मानना है कि जब वह हथेली यानी तिब्बत पर कब्जा कर चुका है, तो पांचों अंगुलियों को भी कब्जे में कर लेगा। इसी मुहिम के तहत वह लद्दाख और अरुणांचल प्रदेश में जब-तब कब्जे के प्रयास करता रहता है। इधर चीन के इन मंसूबों से बेखबर बिना संविधान के चलने की वैंटीलेटर जैसी बदतर राजनीतिक स्थितियों से घिरा नेपाल, और खासकर उसके माओ आंदोलन से जुड़े दल देश की मूल समस्याओं से अपने देशवासियों का ध्यान भटकाने के लिए ऐसी कोशिश कर रहे हैं। पूर्व में नेपाल के माओवादी नेता प्रचंड ने उत्तराखंड के कालापानी को काली नदी का उद्गम स्थल बताकर कालापानी तक के 52 वर्ग किमी क्षेत्र पर भी नेपाल की ओर से दावेदारी की थी, जिन्में बाद में बता दिया गया था कि कालापानी नहीं लिपूगाड़ काली का उद्गम स्थल है।

यह है सुगौली की संधि और गोरखा राज का सच

भंडारी ने बताया कि सुगौली की संधि के तहत अंग्रेजों ने गोरखों को हराने के बाद उन्हें ब्रिटिश इंडिया से सकुशल लौटने के लिए उत्तराखंड के काली कुमाऊं यानी महाकाली नदी के इस ओर के हिस्से को छोड़ने और नेपाल में भी अपना प्रतिनिधि (रेजीडेंट) रखने की शर्तें रखी थी। इस पर गोरखों में मतभेद थे, इसलिए उन्होंने करीब एक वर्ष बाद 1816 में सुगौली की संधि पर हस्ताक्षर किए थे। क्योंकि अंग्रेज काली कुमाऊं के लिपुलेख दर्रे से उस दौर में तिब्बत के साथ बड़े पैमाने पर होने वाले मार्ग को किसी और के कब्जे में नहीं चाहते थे। भंडारी ने बताया कि इससे पूर्व भारत के 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (गदर) में गोरखों ने अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी सरकार की मदद के लिए एक ब्रिगेड (करीब तीन बटालियन) सेना भेजकर मदद की थी, इसके ऐवज में अंग्रेजों ने उन्हें मैदानी इलाका (मजेठी) दिया था।

इतिहास में कोई देश नहीं वरन अफगानिस्तान से बर्मा तक फैले भारत (आर्यावर्त) का ही हिस्सा था नेपाल
Sekhar Pathak
डा. शेखर पाठक

नैनीताल। इसी से जोड़ते हुए इतिहासकार डा. शेखर पाठक ने बताया कि इतिहास में नेपाल कोई देश नहीं था, वरन वह अफगानिस्तान से बर्मा तक फैसे भारत (आर्यावर्त) का ही हिस्सा था। 1785 में राणा रणबहादुर ने सशक्त होकर वहां की 46 छोटी रियासतों को मिलाया। कुछ समय के लिए (गढ़वाल अंचल में करीब 9-10 वर्ष) और कुमाऊं में 1790 से 1815 तक 25 वर्ष उनका राज रहा, जिसे प्रदेश वासी अंग्रेजी राज से भी बुरा मानते हैं। गोरखाओं द्वारा यहां की जनता पर किए गए जुल्म उस दौर के सुप्रसिद्ध कवि गुमानी पंत ‘गौर्दा’ की कविता-दिन दिन खजाना का भार बोकना ले, शिब-शिब चूली में न बाल एकै कैका में दिखते हैं, जिन्हें झेलने के बाद उत्तराखंड के लोगों को अंग्रेजों के जुल्म भी कमतर ही लगे थे। आज भी देश में कोई अन्याय करता है, तो लोग कहते हैं-गोरखा राज चल रहा है क्या ।

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नेपाल के हालातों से भारत में नेपाली श्रमिकों का टोटा

-मुख्यालय में नेपालियों की संख्या में 75 फीसद तक कमी के हालात, दशहरा-दीपावली पर नेपाल गए कर्मी चाहते हुए भी नहीं लौट पा रहे
नवीन जोशी, नैनीताल। नेपाल में नया संविधान बनने के बाद से चल रहे मधेसी आंदोलन को न सुलझा पा रही नेपाल सरकार का नौसिखियापन नेपाल की भारत में रोजगार की तलाश में आने वाली जनता पर भारी पड़ रहा है। इससे भारत में भी नेपाली श्रमिकों की उपलब्धता पर असर पड़ने लगा है। यहां मुख्यालय में नेपाली श्रमिकों की संख्या में 50 से 75 फीसद तक कमी देखी जा रही है। अपने सबसे बड़े त्योहार दशहरे और दीपावली के दौरान भैया दूज के लिए नेपाल गए बड़ी संख्या में नेपाली मजदूर एक माह बाद भी चाह कर भी भारत वापस नहीं लौट पा रहे हैं। इससे नगर में भी श्रम से जुड़ी गतिविधियों पर प्रभाव पड़ने लगा है, और यहां मौजूद नेपाली भी मायूस नजर आ रहे हैं। हालात न सुधरे तो आगे परेशानी और बढ़ सकती है।

Nepali

प्रांतीय उद्योग व्यापार मंडल के जिला महामंत्री जगदीश बवाड़ी ने बताया कि उनके प्रतिष्ठान में हमेशा आठ नेपाली श्रमिक रहा करते हैं। इनका कार्य नगर में ऊंचाई पर रहने वाले लोगों के घरों में सामान पहुंचाना तथा वाहनों से सामान उतारना व यहां-वहां ले जाना होता है। इधर दशहरा-दीपावली पर उनकी दुकान के मजदूर अपने घर नेपाल गए, लेकिन अब तक नहीं लौट पाए हैं। पूछने पर बताया जा रहा है कि नेपाल में खराब हालातों की वजह से नहीं आ पा रहे हैं। लेकिन इधर करीब एक माह से उन्हें केवल दो मजदूरों से ही काम चलाना पड़ रहा है, और इस कारण सामान की होम डिलीवरी पर बड़ा प्रभाव पड़ रहा है। यही समस्या नगर में घरेलू गैस इंडेन की होम डिलीवरी के कार्य के ठेकेदार पवन बोरा को भी आ रही है। उन्होंने बताया कि नेपाली दशहरे और भैया दूज को बड़ा त्योहार मानते हैं, इसलिए अपने देश गए थे, लेकिन पूरी संख्या में वापस नहीं लौटे हैं। इस कारण समस्या आ रही है। वहीं इस बाबत बात करने पर कुमाऊं रेंज के डीआईजी पुष्कर सिंह सैलाल ने कहा कि नेपाल में वहां के लोगों के द्वारा संविधान के खिलाफ जाम आदि लगाए जा रहे हैं। वहां जाम में फंसे वाहनों को भारत की तरह वापस लौटने और पैदल, दो पहिया, साइकिल वाले यात्रियों को भी आने-जाने नहीं दिया जाता है। संभवतया इस कारण संभवतया दिक्कत आ रही हो। उन्होंने कहा कि भारत की ओर से सीमा पर नाकेबंदी जैसी कोई स्थिति नहीं है। स्वयं चालक ही बीते दिनों नेपाल में फंसने पर कई दिन भूखे रहने जैसी स्थितियों में फंसने और वाहनों में आग लगा दिए जाने जैसी संभावनाओं की वजह से स्वयं नेपाल नहीं जा रहे हैं। हालांकि उन्होंने नेपाल में बिगड़े हालातों की वजह से भारत और नेपाल के सीमावर्ती क्षेत्रवासियों के आपसी संबंधों में किसी तरह की खटास, शादी-ब्याह के संबंधों में कमी आने जैसी खबरों से भी इंकार किया।

उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व, करीब एक दशक पहले नैनीताल में बसों से सामान उतारने के लिए नेपाली कुलियों में आपस में गजब का संघर्ष दिखना आम बात थी। वे करीब एक किमी पहले धर्मशाला के पास से ही बसों में लटक कर खिडकियों के रास्ते अपने टोकन यात्रियों को थमा देते थे, ताकि उन्हें सामान घर छोड़ने को मिल जाये, और नगर की बाजारों में उनकी भीड़ के बीच से बचकर निकलना कठिन कार्य होता था। सर्दियों की धूप में उनके झुण्ड के झुण्ड नगर में लेटे हुए नजर आते थे।

भारत-नेपाल में उत्तराखंड के रास्ते बढ़ेगी पर्यटन साझेदारी

-उत्तराखंड के रास्ते आवागमन बढ़ाने को शुरू हुई पहल
-दून व नई दिल्ली में नेपाल व भारत की सचिव स्तरीय वार्ता में होगी बात
नवीन जोशी,  नैनीताल।पड़ोसी देश नेपाल में पुष्प कमल दहल प्रचंड के प्रधानमंत्री बनने और पहली विदेश यात्रा भारत से शुरू करने के बाद दोनों देशों के बेहतर होते रिश्तों से नेपाल के व्यापारी उत्साहित हैं। नेपाल के पश्चिमी अंचल के पर्यटन व्यवसायियों के प्रतिनिधिमंडल ने भारत का रुख किया है। नेपाल एसोसिएशन ऑफ ट्रेवल एंड टूर एजेंट्स फार वेस्टर्न रीजनल एसोसिएशन का प्रतिनिधिमंडल उत्तराखंड से निकटता के मद्देनजर उत्तराखंड के रास्ते भारत-नेपाल के संबंधों को मजबूत करने का पक्षधर है। इसके लिए उत्तराखंड-नेपाल सीमा पर धारचूला व बनबसा बार्डर पर वाहनों के चलने योग्य पुलों के निर्माण को जल्द शुरू करने के लिए अनुरोध करने उत्तराखंड होते हुए दिल्ली जा रहा है। शुक्रवार को यह दोनों देशों की सचिव स्तरीय वार्ता में भागीदार होगा।

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नैनीताल पहुंचे एसोसिएशन के चेयरमैन माया प्रकाश भट्ट ने ‘राष्ट्रीय सहारा’ से कहा कि नेपाल का पश्चिमी अंचल को नेपाल का सातवां नया राज्य बनाने की प्रक्रिया चल रही है। इसके साथ नेपाल में अगले एक वर्ष के भीतर ग्राम से लेकर संसद तक के तीन चुनाव होने जा रहे हैं, जिसके बाद उम्मीद की जा रही है कि नेपाल विकास के एक नये युग में प्रवेश करेगा। इसकी तैयारी करते हुए उनकी एसोसिएशन ‘‘सुदुर पश्चिम को आवाज पर्यटन को विकास’ की थीम के साथ भारत की राह पर है। भारत और खासकर उत्तराखंड से नेपाल के इस अंचल के न केवल सदियों से सांस्कृतिक, धार्मिक व रोटी-बेटी के संबंध रहे हैं। दोनों एक जैसी भौगोलिक व प्राकृतिक स्थितियों वाले राज्य हैं। भारत में टनकपुर के पास पूर्णागिरि शक्तिपीठ जाने वाले लाखों श्रद्धालु नेपाल के ब्रrापुर मंदिर में आते हैं और इसी तरह धारचूला की ओर से उग्रतारा सहित सात बहन देवियों के मंदिरों में 80-90 फीसद तक श्रद्धालु भारत से आते हैं। वहीं उत्तराखंड वासियों को कैलास मानसरोवर जाने के लिये या तो पिथौरागढ़ की ओर के दुर्गम मार्ग से अथवा प्रधानमंत्री मोदी द्वारा खोले गये नाथुला र्दे या काठमांडू उड़कर जाना पड़ता है। इसके बजाय बनबसा से महेंद्रनगर, धनगड़ी होते हुए कैलास जाने का विकल्प है। पश्चिमी अंचल से नया, करीब तिहाई कीमत में ही यह यात्रा हेलीकॉप्टरों व एसी बसों से कराने के लिए नया मार्ग बनाने के प्रयास चल रहे हैं। इस हेतु नेपाल सरकार से भी उनकी बात हो रही है और इन मागरे को तरजीह दिये जाने, बनबसा व धारचूला में सड़क पुल बनाने की मांग के साथ वे 22 को देहरादून और 24 को दिल्ली में वार्ता करने जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री मोदी पहले ही इन पुलों को स्वीकृति दे चुके हैं, उनकी कोशिश इनका निर्माण शीघ्र कराने की है। इनके न होने से उन्हें उत्तराखंड में चार धाम यात्रा करने के लिये अपने वाहन नेपाल में उस ओर खड़े करके आना पड़ता है। इन पुलों के बनने से भारत के सैलानी नेपाल सीमा के निकट की वर्दिया व सुक्लाफाटा राष्ट्रीय प्राणी उद्यानों व नेपाल की प्राकृतिक सुंदरता को और नजदीक से देख पायेंगे, तथा दोनों देशों के रिश्ते और अधिक प्रगाढ़ होंगे।
पश्चिमांचल पर्यटन सर्किट बनाने पर हुई बात
नैनीताल। यहां हुई एक संगोष्ठी में नैनीताल व नेपाल के पर्यटन व्यवसायियों के बीच उत्तराखंड-नेपाल पश्चिमांचल पर्यटन सर्किट बनाने पर बात हुई। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि केएमवीएन के जीएम त्रिलोक सिंह मतरेलिया ने भी कहा कि भौगोलिक, सामाजिक, धार्मिक समानताओं वाले ये दोनों राज्य एक-दूसरे के सहयोग से पर्यटन के जरिये अपनी समृद्धि को बढ़ा सकते हैं। उन्होंने नेपाली शिष्टमंडल से दोनों देशों की खुली सीमा का लाभ उठाते हुये उत्तराखंड के पर्यटन का भी प्रसार करने का अनुरोध किया, और अपनी ओर से भी उन्हें हरसंभव सहयोग का विास दिलाया। इस मौके पर नेपाली प्रतिनिधिमंडल के कृष्ण बहादुर, दिनेश भंडारी, चित्रांग थापा, परमानंद भंडारी व भारत की ओर से नगर के टूर एवं ट्रेवल एजेंट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष विजय मोहन सिंह खाती, अनुराग भौंसले, नरेश गुप्ता, पवन कुमार, कमलेश सिंह, डीके शर्मा, राजू बिष्ट, जावेद, सगीर खान, दर्शन भंडारी सहित बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे।

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