/गूगल ने पंडित नैन सिंह पर डूडल बना बढ़ाया देश के साथ उत्तराखंड का मान

गूगल ने पंडित नैन सिंह पर डूडल बना बढ़ाया देश के साथ उत्तराखंड का मान

  • ‘विक्टोरिया पदक’ व ‘कम्पेनियन इंडियन एम्पायर अवार्ड-सीआईएम’ जैसे अनेक पुरस्कारों से सम्मानित प्रथम भारतीय थे नैन सिंह 
  • गूगल ने उन्हें बताया है, ‘उनके द्वारा नापे गए पर्वतों (हिमालय) की तरह अडिग विश्वास वाला व्यक्ति’
  • अनपढ़ होते हुए भी स्कूल खोलने व शिक्षक के रूप में कार्य करने पर मिली थी ‘पंडित’ की पदवी
  • अपने बराबर कदमों से चलकर और कंठी माला पर कदमों को गिनकर नापे थे हिमालय पर स्थित ‘एशिया की पीठ’ और बनाए थे मानचित्र

नवीन जोशी, नैनीताल। दुनिया का सबसे बड़ा खोज इंजन यूं हर खास मौके पर एक नया डूडल बनाने के लिए भी विख्यात है। किंतु आज 21 अक्टूबर को उसने जो डूडल बनाया है उसे देश के साथ खासकर उत्तराखंड वासियों का सिर गर्व से ऊंचा हो गया है, और वे दीपावली-भैया दूज पपर गूगल से मिले इस खास तोहफे को शायद कभी न भुला पाएं। यह तोहफा है गूगल द्वारा आज के दिन के लिये बनाया गया डूडल, जिसमें हाथ में कंठी माला पकड़े एक व्यक्ति को हिमालय के खूबसूरत पहाड़ों व नदी को सलाम करते हुए दिखाया गया है। गूगल पर अपना मनपसंद विषय खोजने वाली पूरी दुनिया आज इस शख्श के बारे में जानने को उत्सुक है। गूगल ने उन्हें ‘उनके द्वारा नापे गए पर्वतों (हिमालय) की तरह अडिग विश्वास वाला व्यक्ति’ बताया है। उत्तराखंड के लिये गर्व करने वाली बात यह है कि यह शख्श महान अन्वेषक, सर्वेक्षक और मानचित्रकार, हिमालय पुत्र पंडित नैन सिंह रावत हैं, और देश के गिने-चुने व्यक्तियों में शुमार और उत्तराखंड के ऐसे पहले व्यक्ति हो गए हैं, जिनके 187वें जन्मदिन पर गूगल ने आज उन पर खास डूडल बनाया है।

पंडित नैन सिंह (मूलतः मिलम गांव के निवासी मिलम्वाल) रावत (1830-1895) का जन्म पिथौरागढ़ जिले के मुनस्यारी तहसील स्थित मिलम गांव में 21 अक्तूबर 1830 को हुआ था। उन्हें हिन्दी और तिब्बती के अलावा फारसी और अंग्रेजी का भी अच्छा ज्ञान था। वे ऐसे गिने-चुने भारतीयों में शामिल थे जिनका नाम अंग्रेजी हुकूमत के लोग भी सम्मान के साथ लेते थे। 19वीं शताब्दी के ‘एशिया की पीठ’ कहे जाने वाले हिमालय के तिब्बती क्षेत्र के ऐसे ऐसे अन्वेषक थे, जिन्होंने बिना किन्ही खास उपकरणों के नेपाल से होते हुए तिब्बत तक के व्यापारिक मार्ग और तिब्बत से बहने वाली मुख्य नदी त्सांगपो के बहुत बड़े भाग का लगातार 16 वर्षों तक गुमनाम व घर से निर्वासित रहते हुए केवल अपने कदमों व कंठी माला, कंपास व थर्मामीटर जैसे परंपरागत उपकरणों से 1200 मील से अधिक पैदल चल कर मानचित्रण किया, और सबसे पहले शिंगात्से व ल्हासा सहित तिब्बत के 99 महत्वपूर्ण स्थानों वैज्ञानिक दृष्टिकोण से खरे अक्षांश, देशांतर, समुद्र सतह से ऊंचाई, तापमान, वायुमंडल के तापक्रम, उबाल बिंदु आदि के विवरण प्रस्तुत किए। उनकी यात्राओं के विस्तृत विवरण रॉयल जियोग्राफिक सोसायटी की पत्रिका ‘दि जनरल ऑफ दि रॉयल जियोग्राफिक सोसायटी’ के 1868 के खंड 38, 1869 के खंड 39 और 1877 के खंड 47 में पूरे विस्तार से प्रकाशित हुए। इस उपलब्धि पर ही ‘विक्टोरिया पदक’ से सम्मानित पहले भारतीय बने। साथ ही रॉयल जियोग्राफिक सोसायटी तथा कलकत्ता में ‘कम्पेनियन इंडियन एम्पायर अवार्ड-सीआईएम’ जैसे अनेक पुरस्कारों से सम्मानित हुए। कहते है कि पहली बार किसी भारतीय को सीआईएम मिलने पर कलकत्ता में जश्न मना था और लोगों ने घरों में घी के दीये जलाए थे। वहीं भारतीय डाक विभाग ने उनकी उपलब्धि के 139 साल पूरे होने पर 27 जून 2004 को उन पर डाक टिकट भी जारी किया था।
इस तरह बिना उपकरणों के नाप दिये हिमालय
नैनीताल। 19वीं शताब्दी के उस दौर में अंग्रेज भारत का नक्शा तैयार कर रहे थे और लगभग पूरे भारत का नक्शा बना चुके थे। वे आगे बढ़ते हुए तिब्बत का नक्शा चाहते थे लेकिन इस जगह पर किसी भी विदेशी के जाने पर मनाही थी। यदि कोई वहां छिपकर पहुंच भी जाएं तो बाद में पकड़े जाने पर मौत की सजा दी जाती थी। ऐसे में किसी भारतीय को ही वहां भेजने की योजना बनाई गई। इसके लिए लोगों की खोज शुरू हुई। आखिरकार 1863 में कैप्टन माउंटगुमरी को 33 साल के नैन सिंह और उनके चचेरे भाई मानी सिंह के रूप में दो ऐसे इच्छित लोग मिल गए। दोनों को देहरादून में सर्वे ऑफ इंडिया में प्रशिक्षण दिया गया। जिसके बाद दोनों भाई केवल अपने कदमों व कंठी माला, कंपास व थर्मामीटर जैसे परंपरागत उपकरणों से अपने बराबर चले हुए कदमों को अपनी अनूठी कला व प्रतिभा के बल पर कंठी माला के दानों में गिनते और डायरी में नोट करते हुए सटीक दूरियां इंगित करते हुए नक्शे बना पाए, और सबसे पहले दुनिया को ल्हासा की समुद्र तल से ऊंचाई और उसके अक्षांश और देशांतर से अवगत कराया। यही नहीं उन्होंने ब्रह्मपुत्र नदी के साथ लगभग 800 किलोमीटर पैदल यात्रा की थी। उन्होंने दुनिया को तिब्बत के कई अनदेखे और अनसुने रहस्यों के बारे में भी बताया। तिब्बती भिक्षु के रूप में प्रसिद्ध रावत अपने घर से काठमांडू, ल्हासा और तवांग से लेकर मानसरोवर तक गए थे।
जर्मनी के श्लाघइटवाइट बंधुओं ने अंग्रेजों को सुझाया था नैन सिंह का नाम
नैनीताल। पंडित नैन सिंह पर काफी कार्य करने वाले डा. शेखर पाठक ने बताया कि स्वयं अनपढ़ होने के बावजूद नैन सिंह ने अपने सर्वेक्षण कार्यों से अपने गृह क्षेत्र में शिक्षा के प्रसार हेतु कार्य किये। 1859 में मिलम और धारचूला में 1863 में उन्होंने स्कूल खोले। शिक्षक के रूप में कार्य करने पर ही उन्हें क्षत्रिय वर्ग से आने के बावजूद ‘पंडित’ की उपाधि मिली। इस दौरान ही जर्मनी के हरमन श्लाघइटवाइट व उनके दो अन्य सर्वेक्षक श्लाघइटवाइट बंधुओं के साथ उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए भारत के साथ तिब्बत, अफगानिस्तान व मध्य एशिया के विभिन्न क्षेत्रों का 1854 से 1858 के बीच चुंबकीय (मैग्नेटिक सर्वे) सर्वेक्षण किया। श्लाघइटवाइट बंधुओं द्वारा किये गये कुमाऊं के उन सर्वेक्षण कार्यों के दस्तावेज और नैन सिंह की स्मृतियां आज भी बर्लिन और म्यूनिख के संग्रहालयों में सुरक्षित हैं। इन कार्य से प्रभावित होकर स्लागंट वाइट बंधु उन्हें साथ लंदन ले जाना चाहते थे। परंतु भाइयों के विरोध के कारण वे तब उनके साथ नहीं गए, परंतु बाद में स्लागंट वाइट बंधुओं ने ही उनका नाम तिब्बत व ल्हासा के सर्वेक्षण के लिये अंग्रेजों को सुझाया था।