/‘यूपी वासियों’ ने ‘नैना देवी’ से लगायी उत्तराखंड में शामिल करने की गुहार

‘यूपी वासियों’ ने ‘नैना देवी’ से लगायी उत्तराखंड में शामिल करने की गुहार

जी हाँ, यूपी के रामपुर जनपद के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रवासियों ने उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के साथ ही उत्तराखंड की राज्य देवी कही जाने वाली ‘नैना (नयना) देवी’ से स्वयं को उत्तराखंड में शामिल करने की गुहार लगाईं है। इन लोगों ने उत्तराखंड के ऊधमसिंह नगर जिला मुख्यालय में जुलूस निकाला। जुलूस के दौरान वे हाथों में जो बैनर लिए हुए थे, उसमें लिखा था, “नैना देवी दर वापस दो, हमें हमारा घर वापस दो।”

उत्तराखंड के ऊधमसिंह नगर जिला मुख्यालय-रुद्रपुर के निकट यूपी के रामपुर जनपद के अंतर्गत आने वाली 7 कॉलोनियों-शारदा, पद्मा, आरके पुरम, अलखनंदा, सेठी, परती एवं गोपाल विहार कॉलोनी के इन निवासियों का कहना है कि इन कोलोनियों का करीब 70 एकड़ क्षेत्र और करीब 70 फीसद इलाका तीन दिशाओं से उत्तराखंड एवं शेष एनएच-74 से घिरा है, बावजूद उत्तराखंड राज्य गठन के दौरान मामूली लिपिकीय गलती से उन्हें यूपी में डाल दिया गया, लिहाजा उन्होंने डीएम व सीएम के साथ नैना देवी से भी घर वापसी की गुहार लगते हुए उनके यूपी के भूखंड को उत्तराखण्ड में शामिल करने की मांग की है। इस बारे में सैकड़ो क्षेत्रवासियों ने ऊधमसिंह नगर के सीडीओ के मार्फत सीएम से गुहार लगाई है। ‘प्रसंग’ संघर्ष समिति के बैनर तले एक सूत्रीय मांग को पूरा कराने के लिए घनध्याम कांडपाल, जेपी चंद्रा, ओमप्रकाश चौधरी, दीपचंद पाठक, विपिन पंत, चेतन भट्ट, देंवेंद्र सिंह, पीयूष माधव, धर्मेंद्र, पंकज चंदोला कुसुम, सुंदेश्वरी, राजवती, मंजू देवी, भगवान दास,  गिरीश बधानी, हेमा, कविता जोशी, रेनू चौबे, रवि भट्ट, हरीश चंदोला, हरीश भाकुनी, तारावती कांडपाल, प्रिया कांडपाल, रमेश मेलकानी, ललिता पाठक, मालती देवी पांडे, हेमा पांडे, सविता भाकुनी आदि स्थानीय निवासी आज (6 अक्टूबर 2017 को ) रुद्रपुर कलेक्ट्रेट पहुंचे।
उनका कहना है, “भौगोलिक, सामाजिक एवं आर्थिक दृष्टि से पूरी तरह उत्तराखंड पर आश्रित होने के बावजूद रामपुर में शामिल इस सीमान्त क्षेत्र के निवासी उत्तराखंड राज्य गठन के दौरान त्रुटिपूर्ण विभाजन के कारण मौलिक सुविधाओं से पूर्णतः विरत हैं। स्थानीय निवासियों ने एक संघर्ष समिति के माध्यम से आज उत्तराखंड के मुख्यमंत्री को ज्ञापित पत्र ऊधमसिंह नगर जिले के मुख्य विकास अधिकारी यानी सीडीओ को सौंपा। इस दौरान सीडीओ ने भी माना कि तकनीकी एवं प्राकृतिक तथ्यों की अनदेखी के कारण राज्य गठन के दौरान सीमांकन में कई चूकें हुई हैं। उन्होंने आश्वासन दिया कि जनावश्यकताओं के अनुरूप इन त्रुटियों में अवश्य सुधार किया जाएगा।
ज्ञातव्य है कि एक दशक से अपनी नितांत आवश्यक मांगों की पूर्ति के लिए स्थानीय निवासियों ने क्षेत्र प्रतिनिधियों से बार-बार गुहार लगाई किन्तु आश्वासन के अतिरिक्त कुछ भी प्राप्त नहीं हो सका। दिनों-दिन बदहाल होती स्थिति से लाचार स्थानीय निवासियों ने अपनी एक सूत्रीय मांग की पूर्ति के लिए समयसीमा और प्रारूप सुनिश्चित कराने के उद्देश्य से “प्रसंग” संघर्ष समिति का गठन किया है। “प्रसंग” के माध्यम से हमारा अनुरोध है कि उक्त छह कॉलोनियों को शीघ्र-अतिशीघ्र उत्तराखंड में शामिल कराना सुनिश्चित कराएं अन्यथा हम लोग संघर्ष एवं आंदोलन करने को मजबूर होंगे।
अफजलगढ़-कालागढ़ क्षेत्र के लोगों की भी है उत्तराखंड में आने की चाहत
 
नैनीताल। आजादी के संघर्ष के बाद तत्कालीन यूपी सरकार ने उत्तराखंड के कुमाऊं एवं गढ़वाल के अनेक स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के परिवारों को यूपी के बिजनौर जिले के कालागढ़-अफजलगढ़ क्षेत्र के में बसाया था। ऐसे ही तुरतपुर सहित कई गांवों के लोग भी उत्तराखंड की पृष्ठभूमि के होने के कारण यूपी में रहते हुए असुविधाजनक स्थिति में रहते हैं। लिहाजा क्षेत्र के कालागढ़ बांध की तरह यूपी की जगह उत्तराखंड के स्वामित्व में आना चाहते हैं। यूपी के सीमावर्ती क्षेत्रों में ऐसे कई अन्य गांव भी इसी तरह उत्तराखं डमें आने को लालायित हैं।
ज्ञातव्य है कि तीन तरफ से उत्तराखंड एवं शेष एनएच-74 से घिरे इस क्षेत्र के लोग राज्य गठन के बाद से ही इस 70 एकड़ इलाके को उत्तरांखड में शामिल किए जाने की गुहार लगाते रहे हैं, जबकि तमाम जनप्रतिनिधियों ने सिर्फ आश्वासन देकर मामले को टाले रखा। विडंबना देखिए कि एक दौर में परिसीमन के दौरान हुई मामूली सी कार्यालयी चूक आज सुधार के लिए व्यवस्थापिका के दृष्टिगत होने का, उसकी तत्परता का और इच्छाशक्ति का इंतजार कर रही है। वहीं विगत करीब दो दशकों से हजारों लोग शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रोत्साहन, स्थापना, सुरक्षा और सहायता जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। भौगोलिक दृष्टि से एक राज्य, जिससे इस क्षेत्र की सीमाएं छूती भी नहीं, वह कागजों पर इसे अपना भूभाग बताता है। जबकि जिस राज्य से यह क्षेत्र तीन दिशाओं और करीब 70 फीसद इलाके से घिरा है, वह यहाँ के नागरिकों को मात्र एक ग्राहक की दृष्टि से देखता है। परिणामस्वरूप इस इलाके के सैकड़ों गरीब बच्चे राज्य द्वारा संचालित योजनाओं से विरत हैं। व्यवहारिक सत्य यह है कि किसी अप्रिय घटना के होने पर निवासियों को 20 किमी दूर स्थित थाने की कृपा पर आश्रित होना पड़ता है और स्थानीय निकटतम चौकी के कर्मी चोरी के के 99 फीसद मामलों में मुकदमा कायम होने ही नहीं देते। नतीजतन यह क्षेत्र आसपास के चोर-उचक्कों का स्वर्ग बनता जा रहा है।
धरातल पर यही सच्छाई लगभग सभी विभागों और सेवाओं की है, जिसे इंगित किए जाने पर कई पन्ने भर जाएंगे। हालांकि हमें आशा है कि नए भारत को आकार देने की केंद्र और राज्य सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति के समक्ष यह मामला एक सजीव उदाहरण की भांति देखा जाएगा। मामूली सी गड़बड़ी से यदि व्यापक स्तर पर लोग प्रभावित हो रहे हैं, तो सरकार, उसके मंत्री और जनप्रतिनिधि वोट बैंक की राजनीति से ऊपर उठकर जनकल्याण में इस सुधार को अमलीजामा पहनाएंगे। हम् पूर्णतः आश्वस्त हैं कि वर्तमान सरकार लोकतांत्रिक मर्यादाओं के प्रति दृढ़संकल्प है। यह मर्यादा परस्पर है और निष्ठावान, कृतज्ञ व साकारात्मक नागरिकों का संकल्प यथावत रखने हेतु राज्य भी अपने दायित्वों के निर्वाहन में किसी प्रकार के पूर्वाग्रह एवं व्यवधान की अनदेखी कर देश और समाज के समक्ष नए मूल्यों की स्थापना करेगा।
हमें मालूम है कि इस प्रकार के मामले पर सुनवाई शुरू होते ही बहुत से अन्य लोग और इलाके भी ऐसी ही मांग करेंगे। उनके अपने तर्क और तथ्य होंगे किन्तु यह सर्वविदित है कि हमारे 70 एकड़ इलाके का मामला विशेषतम में भी विशेष है क्योंकि इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष का लाभ न होकर व्यापक जनसमुदाय का कल्याण हैं। यह मुद्दा अतिरिक्त लाभ, सुविधा या सहायता पाने से संबंधित न होकर मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति एवं भौगोलोक न्याय से संबंधित है।”
प्रस्तुति : अनिल मिश्र