अजब : उच्च न्यायालय के जज के खिलाफ अवमानना का मामला अपनी ही कोर्ट में आया.. जानें फिर क्या हुआ

उत्तराखंड उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह के खिलाफ उच्च न्यायालय की अवमानना का मामला अपनी ही अदालत में आने का अजब संयोग या कि दुर्योग देखने को आया है। वरिष्ठ न्यायाधीश न्यायमूर्ति राजीव शर्मा व न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की अदालत में सोमवार 11 जून 2018 को यह मामला आया। हालांकि स्वयं उनके होने के कारण मामला अन्य न्यायाधीश को संदर्भित कर दिया गया है।

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उत्तराखंड उच्च न्यायालय में एक अधिवक्ता के रूप में वकालत करने के बाद न्यायाधीश बने न्यायमूर्ति लोक पाल सिंह के खिलाफ उत्तराखंड उच्च न्यायालय में अवमानना याचिका दायर की गयी है। वरिष्ठ अधिवक्ता क्षितिज कुमार शर्मा की ओर से मुख्य न्यायाधीश को संबोधित की गयी याचिका में प्रार्थना की गयी है कि न्यायमूर्ति सिंह के द्वारा कथित तौर पर की गई अवमानना पर उच्च न्यायालय द्वारा स्वप्रेरणा यानी ‘सू मोटो’ से संज्ञान लिया जाये। याचिका शर्मा के खिलाफ की गयी टिप्पणी के आलोक में दायर की गई है। इसमें शर्मा ने कहा है कि उनकी सहयोगी सोनिया चावला, उत्तराखंड उच्च न्यायालय के महाधिवक्ता एसएन बाबुलकर, शासकीय अधिवक्ता जीएस संधू और परेश त्रिपाठी तथा वरिष्ठ अधिवक्ता और इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश प्रदीप कांत के खिलाफ न्यायमूर्ति सिंह ने उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के कार्यों का पालन करते हुए अतिसंवेदनशील व भावनाओं में बहते हुए अभद्र टिप्पणियां व दुर्व्यवहार किया है।
कहा गया है कि 2017 की रिट याचिका संख्या 2368 के दौरान न्यायमूर्ति सिंह ने अधिवक्ताओं के खिलाफ असहनीय टिप्पणियां कीं। उन्होंने अधिवक्ता को कथित तौर पर जेल भेजने की धमकी भी दी। ऐसा केवल एक बार नहीं वरन बार-बार हुआ है जब अधिवक्ताओं को न्यायमूर्ति सिंह के गुस्सा का सामना करना पड़ा है। याचिका का दावा है कि एक वादी को भी उनके दरबार में अपमानित किया गया था। याचिका के अनुसार, एक वादी, जिसका सुनवाई के लिए उपस्थित होना आवश्यक नहीं था, लेकिन वह फिर भी अदालत में था, न्यायमूर्ति सिंह ने ने उससे पूछताछ की थी। वादी सही उत्तर नहीं दे पाया। इस पर न्यायाधीश ने कथित तौर पर कहा, ‘तू बेइमानी के पैसे खा खाकर इतना मोटा हो गया, और तेरे शरीर पर चर्बी चढ़ी है, सारी की सारी उतार कर रख दूंगा।’ यही नहीं न्यायमूर्ति ने कथित तौर पर पुलिस के सिपाहियों को वादी को हिरासत में लेने के आदेश दिए, और सुनवाई पूरी होने तक सिपाहियों से उसे करीब आधे घंटे के लिए खड़े रखने के लिए मजबूर किया गया।
एक और उदाहरण के लिए याचिका में वरिष्ठ अधिवक्ता व पूर्व न्यायाधीश प्रदीप कांत के बारे में न्यायाधीश की टिप्पणी को उद्धृत कर कहा गया है, ‘हम जानते हैं ये कैसे सीनियर एडवोकेट हैं और कैसे जज थे।’ याचिका में बीते माह 9 मई को याचिका संख्या 2368 की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के लिए न्यायमूर्ति सिंह द्वारा प्रयोग किये गये इन असंसदीय शब्दों का भी उल्लेख किया गया है, ‘बहुत कूदता है तू, तू क्या समझता है तू ड्रेस में है तो मैं तुझे जेल नहीं भेज सका। यहीं तेरी ड्रेस उतरवा कर तुझे कस्टडी में ले कर यहीं से तुझे जेल भेज दूंगा। बाद में अपील करते रहना। पूरी हाई कोर्ट में तुझे बचाने वाला कोई नहीं मिलेगा।’ कुल 27 बिंदुओं एवं कई उप विंदुओं की याचिका में प्रदेश के शिक्षा निदेशक आरके कुंवर और अतिरिक्त निदेशक मुकुल सती को खुली अदालत में जेल भेजने और किसी के द्वारा भी न बचा पाने की धमकी देने की बात भी कही गयी है।

याचिका :

न्यायमूर्ति जोसेफ के नाम पर कॉलेजियम एकमत, पर प्रोन्नति पर अभी भी किंतु-परंतु !

सुप्रीम कोर्ट की कलीजियम उत्तराखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश केएम जोसेफ का नाम सुप्रीम कोर्ट जज के लिए सरकार के पास दोबारा भेजे जाने पर एकमत हो गई है। इसके बाद उनका नाम सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पद के लिये भेजा जाना कमोबेश तय हो गया है। हालांकि इस पर औपचारिक प्रस्ताव 16 मई को होने वाली कॉलेजियम के बाद ही भेजा जाएगा। साथ ही ये भी फैसला लिया गया कि अन्य हाई कोर्ट के जजों के नाम के साथ जोसेफ का नाम दोबारा भेजा जाएगा।

कॉलेजियम की रिपोर्ट :

अलबत्ता बैठक के बाद जिस तरह जोसेफ का नाम का प्रस्ताव सीधे नहीं किया गया, और इसके साथ आगामी 16 मई की शाम को प्रस्तावित बैठक में अन्य नामों पर भी चर्चा करने की बात कही गई है, नए नामों पर चर्चा में 1 दिन से अधिक समय लग सकता है, इसके दो दिन बाद ही 18 मई से सर्वोच्च न्यायालय में ग्रीष्म कालीन लंबे अवकाश हैं, और आगे जोसेफ के नाम की खुले तौर पर आगे बढ़कर पैरवी कर चुके न्यायामूर्ति चेलमेश्वर इसी बीच सेवानिवृत्त हो रहे हैं, 16 की कॉलेजियम उनकी आखिरी और 18 को अंतिम न्यायालयी दिन होगा, ऐसे में ‘केंद्र के खिलाफ मुहिम के प्रतीक बने’ जोसेफ के लिये सही मायने में अच्छी-प्रोन्नति की खबर आने में अभी भी विलंब व किन्तु-परंतु बचे हैं।
गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने उनका नाम दोबारा विचार करने के लिए कॉलिजियम के पास भेज दिया था जिसके बाद इस मुद्दे पर काफी विवाद रहा है। कलीजियम की बैटक में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस जे. चेलमेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन बी लोकुर और कुरियन जोसेफ शामिल हुए।

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उत्तराखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति केएम जोसेफ की सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नति को लंबित रखने के पीछे की एक वजह केरल से पहले से ही पर्याप्त प्रतिनिधित्व को बताया गया है। केंद्र सरकार ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट में पहले से ही जस्टिस कुरियन जोसेफ हैं, जिन्हें केरल हाई कोर्ट से पदोन्नत किया गया है। सरकार का तर्क है कि ऐसे में केरल हाईकोर्ट से एक और पदोन्नति सुप्रीम कोर्ट में क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व की सरंचना के हिसाब से ठीक नहीं होगी।
लेकिन यह तर्क तथ्यों पर पूरी तरह से खरा नहीं उतर रहा है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के 25 जजों में से 3 दिल्ली हाईकोर्ट, 3 बॉम्बे हाईकोर्ट और दो-दो इलाहाबाद, एमपी, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट से हैं। हालांकि सरकार ने तर्क दिया कि केरल हाईकोर्ट छोटा है और इसके प्रतिनिधित्व को सुप्रीम कोर्ट के साथ हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों को ध्यान में रख कर देखना चाहिए। केरल, ओडिशा, गुवाहाटी, पंजाब और हरियाणा, मद्रास, पटना व हिमाचल हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट में एक-एक जज हैं। वहीं 4 जजों को बार से चुना गया था, जिनमें नव नियुक्त इंदू मल्होत्रा भी शामिल हैं। ये 4 जहां प्रैक्टिस करते थे अगर उन राज्यों को ध्यान में रखा जाए तो सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली और बॉम्बे हाई कोर्ट का प्रतिनिधित्व और बढ़ने ही वाला है। जबकि कोलकाता, छत्तीसगढ़, गुजरात, राजस्थान, झारखंड, जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड, सिक्किम, मणिपुर और मेघालय, इन 10 हाईकोर्ट का वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट में कोई प्रतिनिधित्व नहीं है।

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केंद्र ने मुख्य न्यायाधीश जोसफ को सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनाने का प्रस्ताव लौटाया,  जबकि इंदु मल्होत्रा को किया सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त 
नैनीताल। केंद्र सरकार ने बृहस्पतिवार को सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली कॉलेजियम यानी न्यायाधीशों की समिति की सिफारिशों को आधार स्वीकार करते हुए राष्ट्रपति के आदेशों पर इंदु मल्होत्रा को सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त कर दिया है, जबकि उत्तराखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश केएम जोसफ के नाम को वापस कॉलोजियम को लौटा दिया है। आगे यदि कॉलोजियम दुबारा उनके नाम की संस्तुति करती है, तब केंद्र सरकार उनकी संस्तुति को मानने के लिए बाध्य होगी। केंद्र सरकार ने हालांकि न्यायमूर्ति जोसफ के बाबत सिफारिश को लौटाने के विस्तार से 10 बिंदु गिनाये हैं, लेकिन इसे मार्च 2016 में जोसफ के द्वारा केंद्र द्वारा लगाये गए राष्ट्रपति शासन एवं अपदस्थ कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री हरीश रावत को वापस सत्तानशी करने तथा अपने नियुक्तिकर्ता पर की गयी ‘राष्ट्रपति राजा नहीं होता’ जैसी टिप्पणी के आलोक में भी देखा जा रहा है।
केंद्र सरकार की ओर से बृहस्पतिवार 26 अप्रैल को सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा को कॉलेजियम की 19 जनवरी 2018 की संस्तुतियों के बाबत भेजे गए पत्र में कहा गया है कि न्यायमूर्ति जोसफ देश भर के उच्च न्यायालयों की वरिष्ठता सूची में 42वें नंबर पर हैं, और 11 प्रदेशों के मुख्य न्यायाधीश भी उनसे वरिष्ठ हैं। न्यायमूर्ति जोसफ चूंकि मूलतः केरल से आते हैं, और सर्वोच्च न्यायालय में पहले से ही इस छोटे से राज्य के निवासी न्यायमूर्ति कुरियन जोसफ आठ मार्च 2013 से नियुक्त हैं, जबकि केरल के ही टीबी राधाकृष्णन छत्तीसगढ़ व एंथनी डॉर्निमिक केरल उच्च न्यायालय में नियुक्त हैं। वहीं कोलकाता, छत्तीसगढ़, गुजरात, राजस्थान, जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड सहित सिक्किम, मणीपुर व मेघालय का सर्वोच्च न्यायालय में कोई प्रतिनिधित्व नहीं है। जोसफ को सर्वाच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनाने से इस छोटे राज्य के दो न्यायाधीश हो जाएंगे। इधर उत्तराखंड उच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति जोसफ के प्रस्ताव को लौटाए जाने पर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं हैं।

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