रीवर राफ्टिंग, पैराग्लाइडिंग व अन्य जल खेलों पर सरकार ने हाईकोर्ट में की ऐसी बचकाना हरकत कि…

कमजोर तर्कों के कारण सरकार को वापस लेनी पड़ी रीवर राफ्टिंग, पैराग्लाइडिंग व अन्य जल खेलों से सम्बंधित पुर्नविचार याचिका

नैनीताल, 18 जुलाई, 2018। उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय के राज्य में रीवर राफ्टिंग, पैराग्लाइडिंग व अन्य जल खेलों के लिए दो सप्ताह में उचित नियम बनाये जाने के एकलपीठ के आदेशों पर उत्तराखंड सरकार ने अब तक नियम तो नहीं बनाये, उलटे न्यायालय को कमजोर तर्कों से भरमाने का ऐसा बचकाना प्रयास किया कि उसे मुंह की खानी पड़ गयी। उच्च न्यायालय की एकलपीठ के आदेश  के विरुद्ध सरकार ने खंडपीठ में पुनर्विचार याचिका दायर की। बुधवार को पुनर्विचार याचिका पर वरिष्ठ न्यायमूर्ति राजीव शर्मा एवं न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की खंडपीठ में सुनवाई हुई। सुनवाई के बाद सरकार को अपनी पुनर्विचार याचिका को वापस लेना पड़ गया।
सरकार ने पुनर्विचार याचिका में कहा था कि सरकार ने राफ्टिंग के लिये 2014 में नियम बनाये हैं, जबकि पैराग्लाइडिंग के सम्बंध में नियम नही बने हैं। सुनवाई के दौरान याची के अधिवक्ता ने इसका विरोध करते हुए न्यायालय को अवगत कराया कि जो नियम 2014 में सरकार ने बनाये थे उनका सरकार ने नोटिफिकेशन ही नही किया था, लिहाजा राफ्टिंग व पैराग्लाइडिंग के सम्बन्ध में अभी कोई नियम नही बने हैं। उल्लेखनीय है कि पूर्व में देहरादून रोड ऋषिकेश निवासी हरिओम कश्यप ने उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर कहा था कि सरकार ने 2014 में भगवती काला व विरेंद्र सिंह गुसाई को राफ्टिंग कैंप लगाने के लिए कुछ शर्तों के साथ लाइसेंस दिया था। लेकिन उन्होंने शर्तों का उल्लंघन करते हुए राफ्टिंग के नाम पर गंगा नदी के किनारे कैंप लगाए और कैंपों में गंगा के किनारे मांश व मदिरा का सेवन, डीजे बजाना तथा शौचालय व बाथरूम का मुहाना नदी में खोलने जैसे असामाजिक कार्य भी किए जाने लगे।

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नैनीताल, 21 जून 2018। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को रीवरराफ्टिंग, पैराग्लाइडिंग व अन्य जल खेलों के लिए उचित नियमावली बनाने के निर्देश दिए हैं, और तब तक रीवरराफ्टिंग की स्वीकृति न देने तथा जो चल रहें हैं, उन पर रोक लगाने को कहा है। वरिष्ठ न्यायमूर्ति राजीव शर्मा एवं न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। मामले के अनुसार देहरादून रोड ऋषिकेश निवासी हरिओम कश्यप ने हाईकार्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा था कि सरकार ने 2014 में भगवती काला व विरेंद्र सिंह गुसाई को राफ्टिंग कैंप लगाने के लिए कुछ शर्तों के साथ लाइसेंस दिया था। याचिका में विपक्षीगणों की ओर से शर्तों का उल्लंघन करते हुए राफ्टिंग के नाम पर गंगा नदी के किनारे कैंप लगाने शुरू कर दिये और कैंपों में गंगा के किनारे कैंप की आड में मीट, मदिरा का सेवन, डीजे बजाना, बाथरूम का मुहाना नदी में खोलना व कूडा इत्यादि नदी में बहाने जैसे असामाजिक कार्य किए जाने लगे। याचिकाकर्ता ने इस संबंध में कुछ फोटोग्राफ भी याचिका में लगाए थे। सभी पक्षों की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने सरकार को आदेश दिए हैं कि वे नदी के किनारे उपयुक्त शुल्क लिये बिना लाइसेंस जारी नहीं कर सकती तथा खेल गतिविधियों के नाम पर अय्याशी करने की स्वीकृति नहीं दे सकती। कोर्ट ने कहा कि सरकार द्वारा राफ्टिंग कैंप को नदी किनारे स्वीकृति दी गई है, जिससे नदियों का पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है और राफ्टिंग के नाम पर लांचिंग पाइंट पर ट्रेफिक जाम की स्थिति बन रही है। बडे बडे राफ्टों से छोटी गाड़ियों से भी ढोया जा रही हैं। इस प्रकार की गतिविधियों की स्वीकृति नहीं देनी चाहिए तथा राफ्टों को मानव शक्ति द्वारा ले जाया जाए न कि गाडियों द्वारा।

सात साल के बाद आचार्य बालकृष्ण को मिली राहत, हाई कोर्ट ने दिये सीबीआई द्वारा दर्ज मुकदमे में 2011 में जब्त पासपोर्ट छोड़ने के आदेश

नैनीताल, 17 जुलाई 2018। उत्तराखंड हाई कोर्ट ने आचार्य बालकृष्ण का जब्त पासपोर्ट छोड़ने के आदेश दिए हैं। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की एकलपीठ में हुई। मामले के अनुसार पतंजलि योगपीठ के महामंत्री आचार्य बालकृष्ण का पासपोर्ट जुलाई 2011 से हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल के कार्यालय मे जमा है। 2011 में सीबीआई द्वारा उनके खिलाफ धोखाधड़ी व फर्जी तरीके से शैक्षणिक दस्तावेज व पासपोर्ट हासिल करने के आरोप में धारा 120 बी के तहत षडयंत्र का आरोप लगाया था। पूर्व में एकलपीठ ने उनके पासपोर्ट को हाईकोर्ट में जमा करने के आदेश दिए थे। तब से उनका पासपोर्ट यहीं जमा है। इधर मंगलवार को मामले को सुनने के बाद एकलपीठ ने उनके पासपोर्ट को रिलीज करने के निर्देश दे दिए हैं, साथ ही पासपोर्ट ऑथोरिटी को निर्देश दिए हैं कि वे चाहें तो बालकृष्ण के विदेश से लौटने के बाद उन्हें पासपोर्ट ऑथोरिटी के समक्ष पेश करवा लें या विदेश से आने का शपथपत्र लें।

तराई बीज निगम घोटाले में तीन आरोपितों की गिरफ्तारी पर लगी रोक हटी

नैनीताल, 10 जुलाई 2018। उत्तराखंड तराई बीज निगम में हुए 16 करोड़ के बीज घोटाले के आरोपितों की मुश्किलें बढ़ गई है। नैनीताल उच्च न्यायालय की एकलपीठ ने तीन आरोतितों पीके चौहान, अजीत सिंह व गिरीश तिवाड़ी की गिरफ्तारी से रोक हटा दी है, जिसके बाद तीनों आरोपितों पर गिरफ्तारी की तलवार लटक गई है।
उल्लेखनीय है कि तराई बीज निगम में गेहूं बीज घोटाला सामने आने के बाद राज्य सरकार ने पूरे मामले पर एसआईटी जांच शुरू कर दी थी। इस पूरे मामले में एसआईटी ने 10 प्रशासनिक अधिकारियों को आरोपी बनाते हुए 7 जुलाई 2017 को मुकदमा दर्ज किया था। अपनी गिरफ्तारी से बचने के लिये इन अधिकारियों ने उच्च न्यायालय की शरण ली। पूर्व में न्यायालय ने सभी की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी। इधर एसआईटी की ओर से उच्च न्यायालय में बताया गया कि तीनों अधिकारियों द्वारा जांच में सहयोग नहीं किया जा रहा है, जिसके बाद न्यायालय ने पूरे मामले की सुनवाई कर तीनों आरोपितों की गिरफ्तारी से रोक को हटा दिया है। अब न्यायालय पूरे मामले पर 23 जुलाई को सुनवाई करेगी।

काशीपुर के महेशपुरा में कब्रिस्तान की जमीन से एक महिने के भीतर हटाना होगा कब्जा-अतिक्रमण 

नैनीताल, 10 जुलाई 2018। उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति राजीव शर्मा व न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की खंडपीठ ने ऊधमसिंह नगर जिला प्रशासन काशीपुर के महेशपुरा में कब्रिस्तान की जमीन से एक महिने के भीतर कब्जा निरस्त कर अतिक्रमण हटाने के आदेश दिये है।
मामले के अनुसार मौलाना आजाद जन कल्याण समिति ने उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर कहा था कि काशीपुर के महेशपुर की जमीन कब्रिस्तान की जमीन के रूप में दर्ज है। याचिका में यह भी कहा गया है कि पूरे इलाके के कागजों में हेराफेरी कर अन्य लोगों का कब्जा दिखाया गया है। याची ने उच्च न्यायालय से प्रार्थना की है कि कब्रिस्तान की जमीन से कब्जे निरस्त कर उसे खाली कराया जाय।

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नैनीताल, 22 जून 2018। उत्तराखंड में अब दोपहिया वाहन केवल आईएसआई मार्क के हेलमेट पहनकर ही चलाए जा सकेंगे। साथ ही यदि दोपहिया वाहन चलाते हुए यदि मोबाइल फोन पर बात की तो लाइसेंस निरस्त किया जाएगा।
उत्तराखंड उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति राजीव शर्मा व न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की खण्डपीठ ने इस संबंध में राज्य सरकार को सख्त निर्देश जारी करते हुए कहा है कि किसी भी मोटर साइकिल व स्कूटी चालक को बिना आईएसआई मार्क के हेलमेट पहने दोपहिया वाहन चलाने की अनुमति न दी जाये। साथ ही सरकार मोटर वाहन अधिनियम की धारा 129 का भी कठोरता से पालन सुनिश्चित कराये। आदेश का पालन कराने के लिए एसएसपी, सीओ व कोतवाल मुख्य तौर पर जिम्मेदार होंगे। साथ ही खंडपीठ ने यह भी निर्देश दिए है की जो लोग वाहन चलाते वक्त मोबाइल फोन का प्रयोग करते हैं उनके लाइसेंस निरस्त करें और मोटरयान नियमो का उलँघन करने वालो के खिलाफ कार्यवाही करें। इसके अलावा नाबलिकांे को लाइसेंस जारी ना करने और उन्हें वाहन चलाने की अनुमति न देने को भी कहा है। इसके अलावा सरकार को यह भी निर्देश दिए है किसी भी वाहन में उसकी लंबाई से ज्यादा ज्यादा लम्बाई के सरिया, स्टील के रॉड, खम्भे व पाइप आदि ले जाने पर प्रतिबन्ध करें। मामले के अनुसार अविदित नौनियाल ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा है कि सरकार मोटरयान अधिनियम 1988 की धारा 128 व 129 का कठोरता से पालन नही करा रही है, जिससे लगातार दुर्घटनाएं हो रही हैं।

यह भी पढ़ें : एलटी की काउंसलिंग जारी रखने लेकिन उसके परिणाम घोषित करने पर रोक

नैनीताल, 21 जून 2018। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने एलटी परीक्षा में हुई अनियमितताओं के मामले में दायर याचिका पर सुनवाई करने के बाद काउंसलिंग जारी रखने को कहा है, परंतु उसके परिणाम घोषित करने पर रोक लगा दी है। बृहस्पतिवार को न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की एकलपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। मामले के अनुसार उत्तरकाशी निवासी राममोहन सिंह ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि मई 2018 को एलटी परीक्षा का परिणाम घोषित किया गया था, और इधर चल रही इसकी काउंसलिंग की प्रक्रिया में कई अनियमितताएं की गई हैं। याचिका में कहा गया है कि जिन अभ्यर्थिंयों के ज्यादा अंक है उसको मात्र ओबीसी के लिए टीईटी में नियत नंबर होने के कारण पीछे रखा गया है, जो कि गलत है। जबकि अभ्यर्थी मेरिट में ऊपरी स्थानों पर आना चाहिए था। ऐसे अनेक अभ्यर्थी है जिनका गढवाल व कुुमाऊं दोनों मंडलों में चयन किया गया है, जिससे कि अनेकों अभ्यर्थी चयन हाने से वंचित रह गए हैं। सभी पक्षों की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की एकलपीठ ने परिणाम घोषित करने पर रोक लगा दी है।

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राष्ट्रीय सहारा, 18 मई 2018

-इसी कारण आदेशों पर राज्य के पुलिस कर्मियों में नहीं दिख रहा है खास उत्साह, उन्हें उम्मीद नहीं है कि राज्य सरकार इसे लागू कर पाएगी
नवीन जोशी, नैनीताल, 17 मई 2018। नैनीताल उच्च न्यायालय के राज्य पुलिस सुधार आयोग की 2012 में आई सिफारिशें लागू करने के सरकार को दिये गये आदेशों को लागू करने के लिए तीन माह का समय दिया है, लेकिन आसान नहीं लगता है। खासकर उत्तराखंड पुलिस के काम के घंटे आठ घंटे तक सीमित करने का आदेश लागू करना तो बहुत दूर की ही कौड़ी होगा। कारण, उत्तराखंड पुलिस में मौजूदा जरूरतों, यानी जब पुलिस कर्मी दिन के 24 घंटे कार्य करने के लिए पाबंद हैं, तब 1500 से अधिक स्वीकृत पद ही रिक्त पड़े हैं, जबकि मौजूदा जरूरतों के लिहाज से भी इसके कम से कम दोगुने पुलिस यानी 3000 कर्मियों की आवश्यकता है। और यदि राज्य सरकार नैनीताल उच्च न्यायालय के आदेशों पर राज्य पुलिस सुधार आयोग की सिफारिशें लागू करती है तो आठ-आठ घंटे की तीन शिफ्टों के लिए 3 गुना अधिक पुलिस कर्मियों की आवश्यकता पड़ेगी, जो कार्मिकों को वेतन देने के लिए सरकार के समक्ष आ रही कर्ज लेने की मजबूरी की स्थितियों में आसान नहीं लगता।

एक रिपोर्ट के अनुसार पूरे देश में पुलिस महकमे में पांच लाख पद रिक्त हैं। इसका असर पुलिसिंग पर पड़ रहा है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों से रिक्त पदों का ब्यौरा तलब किया है। उत्तराखंड पुलिस में भारतीय पुलिस सेवा, प्रांतीय पुलिस सेवा समेत सभी पदों को मिलाकर 27,442 पद हैं। इन पदों के सापेक्ष 26 हजार पदों पर कर्मचारी तैनात हैं। ऐसे में मौजूदा समय में रिक्त पदों की संख्या तकरीबन डेढ़ हजार है।
यही कारण है कि उत्तराखंड उच्च न्यायालय के ताजा आदेश ऊपरी तौर पर खासे आकर्षक नजर आने के बावजूद राज्य के पुलिस कर्मियों में खास उत्साह पैदा नहीं कर पाये हैं। पुलिस कर्मियों को उम्मीद नहीं है कि पुलिस इन आदेशों को लागू कर पायेगी। अलबत्ता उन्हें केवल इतना लगता है कि सरकार उन्हें उच्च न्यायालय के आदेशों पर वर्ष भर में 30 दिनों की जगह 45 दिनों का अतिरिक्त वेतन दे सकती है। इससे आरक्षियों को प्रतिवर्ष लगभग 14000, उपनिरीक्षकों को 18 हजार और निरीक्षकों को 22000 रुपयों का लाभ होगा, और सरकार पर करीब 28 करोड़ का प्रतिवर्ष अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ेगा। कुमाऊं परिक्षेत्र के पुलिस महानिरीक्षक पूरन सिंह रावत ने भी माना कि आदेशों को लागू करना सरकार के लिए आसान नहीं होगा। अलबत्ता, उम्मीद जताई कि सरकार कोई बीच का रास्ता निकाल सकती है।

कुमाऊं परिक्षेत्र में 544 पद हैं रिक्त
नैनीताल। कुमाऊं परिक्षेत्र में निरीक्षक के स्वीकृत 56 में से 23, उप निरीक्षक नागरिक पुलिस के 297 में से 54, उप निरीक्षक सशस्त्र पुलिस के 14 में से 7, मुख्य आरक्षी नागरिक पुलिस के 393 में से 120, सशस्त्र पुलिस के 343 में से 64, आरक्षी सशस्त्र पुलिस के 1330 में से 250 व लिपिक संवर्ग के 79 में से 26 यानी कुल 544 पद रिक्त हैं। वहीं आरक्षी नागरिक पुलिस के 3182 स्वीकृत पदों पर अभी हाल में राज्य को मिली 700 में से 370 महिला आरक्षियों की नियुक्ति पदों को बढ़ाए बिना भविष्य में होने वाली रिक्तियों के सापेक्ष तैनात किये गये हैं। यही स्थित उपनिरीक्षक के पदों पर भी है, जहां 140 महिला उपनिरीक्षकों की तैनाती की गयी है।

उपलब्ध पदों के एक तिहाई पुलिस कर्मी ही हैं थानों में तैनात
नैनीताल। पुलिस महकमे की मौजूदा स्थितियों को देखें तो जितने पुलिस कर्मी जिलों में तैनात हैं, उनके एक तिहाई ही थानों पर रहकर अपना मूल कार्य कर पा रहे हैं। पुलिस से ही जुड़े सूत्रों ने उदाहरण के तौर पर बताया कि नैनीताल जिले में करीब 2100 पुलिस कर्मी तैनात हैं, इनमें से करीब 1250 नागरिक पुलिस व 850 सशस्त्र एवं एलआईयू, अग्निशमन, रेडियो व लिपिक संवर्ग आदि में कार्यरत हैं। नागरिक पुलिस के 1250 पदों में से करीब आधे कर्मी थानों-कोतवालियों व चौकियों से इतर नित नये खुल रहे विभिन्न प्रकोष्ठों (सेलों), एसआईटी, हाईकोर्ट, जीआरपी, सीपीयू, पुलिस मुख्यालय एवं कुमाऊं परिक्षेत्र कार्यालय आदि में संबद्ध हैं। ऐसे में केवल 700 के करीब पुलिस कर्मियों पर ही जनपद की 2011 की जनगणना के अनुसार करीब 9.55 लाख व वर्तमान में करीब 11 लाख की जनसंख्या की सुरक्षा व कानून व्यवस्था बनाये रखने का बोझ है।

आंध्र, तमिलनाडु, कर्नाटक में पहले से हैं प्राविधान
नैनीताल। पुलिस कर्मियों को आठ घंटे ही नौकरी कराने के प्राविधान देश के आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु व कर्नाटक आदि राज्यों की पुलिस नियमावली में पहले से हैं, बावजूद वहां भी इसका पालन नहीं हो पा रहा है। देश में केवल राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली की पुलिस में ही आंशिक तौर पर यह व्यवस्था लागू हो पा रही है। अलबत्ता संबंधित याचिका के अनुसार केरल और मध्य प्रदेश के पांच पुलिस थानों में इस प्रयोग के बेहतर परिणाम देखने को मिले हैं, तथा मेघालय व पंजाब में इसके लिए पहल हुई हैं, लेकिन उत्तराखंड सहित अन्य राज्यों में इस संबंध में कोई प्राविधान नहीं हैं।

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने राज्य पुलिस सुधार आयोग की सिफारिशों के तहत दिए 12 बड़े निर्देश

उत्तराखंड हाईकोर्ट की वरिष्ठ न्यायाधीश न्यायमूर्ति राजीव शर्मा व न्यायमूर्ति शरत शर्मा की खंडपीठ ने अधिवक्ता अरूण भदौरिया की जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद प्रदेश में राज्य पुलिस सुधार आयोग की सिफारिशों के तहत पुलिस कर्मियों के कल्याण के लिये राज्य सरकार को पुलिस एक्ट व पुलिस कर्मियों के बाबत 10 बड़े आदेश-निर्देश दिए हैं। यह निर्देश हैं : 

  1. सरकार को दिए पुलिस एक्ट में बदलाव करने के निर्देश
  2. पुलिस कर्मियों से रोजाना आठ घंटे से अधिक काम न लेने के निर्देश
  3. कठिन ड्यूटी करने पर 45 दिन का अतिरिक्त वेतन देने के निर्देश
  4. पुलिसकर्मी को करियर के दौरान तीन प्रमोशन जरूरी
  5. तीन माह में पुलिस अतिरिक्त (कॉर्पस) फंड का गठन करने के निर्देश
  6. पुलिसकर्मियों की हर तीन महीने के भीतर स्वास्थ्य जांच हो
  7. पुलिस विभाग में योग्य चिकित्सकों खासकर पुलिस कर्मियों के तनाव को दूर करने के लिये मनोचिकित्सकों की भी नियुक्ति करे सरकार
  8. ट्रैफिक पुलिस कर्मियों को मिले मास्क व अन्य आवश्यक सुविधायें और गर्मी में आवश्यक अंतराल में ब्रेक देने के निर्देश
  9. पुलिस कर्मियों की आवासीय सुविधा में सुधार करें
  10. पुलिस वालों के रहने के लिए बनाई जाए हाउसिंग स्कीम
  11. खाली पदों को भरने के लिये विशेष चयन बोर्ड गठित करने के निर्देश
  12. पुलिस थानों में हो जिम और स्वीमिंग पूल की व्यवस्था

उल्लेखनीय है कि इस मामले में याचिकाकर्ता की ओर से मार्च 2013 में प्रदेश के मुख्यमंत्री को पत्र दिया था। साथ ही प्रदेश मानवाधिकार आयोग में भी मामला दायर किया था। उसके बाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को पत्र भेजा था।

यह भी पढ़ें : उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने दिया नजीर पेश करने वाला बड़ा फैसला : फांसी की सजा पाये दोषियों को अकेले में रखे जाने को असंवैधानिक करार दिया

उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने शुक्रवार 27 अप्रैल 2018 को एक बड़ा, देश भर के लिए नजीर बन सकने वाला फैसला देते हुए फांसी की सजा पाये व्यक्ति को अकेले में रखे जाने को असंवैधानिक करार दिया है। अपने निर्णय में उत्तराखंड उच्च न्यायालय के वरिष्ठ न्यायधीश राजीव शर्मा व न्यायाधीश आलोक सिंह की खंडपीठ ने साफ तौर पर कहा है कि सजा के दो-तीन दिन तक ही फांसी की सजा पाये व्यक्ति को अकेले में रखा जा सकता है, उसके बाद उनको अन्य कैदियों के साथ ही रखा जाय। खंडपीठ ने इस संबंध में जेल मैन्युअल में दिए गए प्राविधानों को भी असवैधानिक माना और कहा कि जेल मेनुअल में फांसी की सजा पाये अभियुक्तों को 24 घण्टे में से 23 घंटे अलग रखे जाने का प्राविधान गलत है और यह भी एक प्रकार की दूसरी सजा से कम नही है।
खंडपील ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी निचली अदालत द्वारा एक महिला की क्रूरतापूर्वक की गयी हत्या व दुर्व्यवहार किये जाने के आरोपी सुुशील व महताब को निचली अदालत द्वारा दी गयी फांसी की सजा के मामले में की। खंडपीठ ने फांसी की सजा को बरकरार रखा, परन्तु दोषियों पर लगाये गए एससी-एसटी एक्ट को गलत माना और फाँसी की सजा पाये अभियुक्तों को अकेले रखने को असवैधानिक माना।
मामले के अनुसार विकास नगर निवासी अनिल चौहान ने 29 दिसम्बर 2012 को विकास नगर थाने में एक प्रथम सूचना रिपोर्ट लिखाई थी कि उसकी 55 वर्षीय माँ गायों को चराने के लिए जंगल गयी हुई थी, जहां से वह वापस नही आयी। काफी खोजबीन करने पर उनका शव जंगल में मिला और उनके साथ दुर्व्यवहार भी हुआ था। जाँच करने पर उक्त दोनों अभियुक्तों के द्वारा हत्या करने की पुष्टि हुई। मामले में विशेष न्यायाधीश देहरादून द्वारा उन्हें 27 जनवरी 2014 को आईपीसी की धारा 302,376 जी में निर्मम हत्या करने व दुष्कर्म करने के मामले में फाँसी की सजा सुनाई गयी। साथ ही उन पर एससी-एसटी एक्ट भी लगाया। इस आदेश को सरकार व अभियुक्तों द्वारा हाई कोर्ट में चुनौती दी जिस पर अभियुक्तों के अधिवक्ता ने कहा है कि अभियुक्तों के खिलाफ कोई प्रत्यक्षदर्शी शाक्ष्य नही है उनको संदेह के आधार पर इस मामले में फसाया जा रहा है।

यह भी पढ़ें : हरिद्वार की निलंबित जिला पंचायत अध्यक्ष सविता चौधरी के सीज वित्तीय अधिकार भी बहाल

नैनीताल, 12 अप्रैल 2018। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति सुधांशु धुलिया की एकलपीठ ने ने हरिद्वार की निलंबित जिला पंचायत अध्यक्ष सविता चौधरी के वित्तीय अधिकार बहाल कर दिये हैं। उल्लेखनीय है कि पूर्व में 12 मार्च 2018 न्यायमूर्ति सुधांशु धुलिया की एकलपीठ ने उनके कार्यकाल को बहाल कर दिये थे, परन्तु उनके वित्तीय अधिकार को सीज रखे थे। उस आदेश को याची द्वारा विशेष अपील के जरिये न्यायमूर्ति राजीव शर्मा व न्यायमूर्ति शरद कुमार शर्मा की खण्डपीठ में चुनोती दी गई थी, जिसमें सुनवाई के बाद खंडपीठ ने उनके वित्तीय अधिकार को बहाल कर दिया है ।

जिला पंचायत अध्यक्ष सविता चौधरी

मामले के अनुसार हरिद्वार की जिला पंचायत अध्यक्ष सविता चौधरी पर आरोप था कि उन्होंने दुकानों की नीलामी में वित्तीय अनियमितताएं करते हुए अपने चेहतो की दुकांने आवंटित की हैं। इन आरोपों पर हरिद्वार के जिला अधिकारी ने दिसम्बर 2017 में उनके वित्तीय अधिकारों पर रोक लगा दी थी। श्रीमती चौधरी ने इसे उच्च न्यायालय में चुनौती देते हुए कहा था कि उनके वित्तीय अधिकार सीज करने का अधिकार जिला अधिकारी को नहीं है। सरकार ने बिना उन्हें सुने नियम विरुद्ध वित्तीय अधिकार सीज कर दिए हैं। हालांकि सरकारी महाधिवक्ता ने कहा कि चौधरी को अपना पक्ष रखने के लिए पूरा अवसर दिया गया, लेकिन उन्होंने जानबूझकर अपना पक्ष नहीं रखा। यह भी कहा कि चौधरी पर वित्तीय अनियमितताओं के गंभीर आरोप हैं इसलिए उनके अधिकार बहाल नहीं हो सकते। मामले को सुनने के न्यायालय ने जिला पंचायत अध्यक्ष के कार्य को बहाल कर दिया और सरकार को निर्देश दिए कि उनको सुनवाई का उचित अवसर दें।

यह भी पढ़ें : उत्तराखंड के मुख्य सचिव व हरिद्वार के डीएम को हाईकोर्ट से अवमानना नोटिस

नैनीताल, 15 मार्च 2018। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति वीके बिष्ट की एकलपीठ ने ने प्रदेश के मुख्य सचिव उत्पल कुमार एवं हरिद्वार के डीएम दीपक रावत को अलग-अलग मामलों में अवमानना के नोटिस जारी किये हैं। पहला मामला किसान राईस मिल, डीएन एग्रो, अमन एग्रो, सोना एग्रो, गुरु कृपा राईस मिल, अनजानी राईस मिल और सोहता राईस मिल जसपुर ऊधम सिंह नगर से जुड़ा है। जिन्होंने उच्च न्यायालय ने में अवमानना याचिका दायर कर कहा है कि उत्तराखंड एग्रीकल्चरल प्रोड्यूज मार्केटिंग डेवलपमेंट रेगुलेशन एक्ट की धारा 27(ब) को सर्वोच्च न्यायालय ने हटा दिया था जिसके आधार पर समस्त राईस मिलों से मंडी शुल्क एवं विकास शुल्क लिया जाता था परन्तु इस धारा के हट जाने के बाद उनकी जमा मंडी फीस अभी तक सरकार ने वापस नही की है। पूर्व में उच्च न्यायलय ने सरकार को मंडी शुल्क एवं विकास का पैसा वापस करने और याचियों के प्रत्यावेदनों को तीन माह के भीतर निस्तारित करने को कहा था और इस हेतु सरकार से मुख्य सचिव, वित्त सचिव व विधि सचिव की तीन सदस्यीय कमेटी का गठन करने को कहा था। परन्तु सरकार ने कोई कमेटी गठित नहीं की। मामले को सुनने के बाद एकलपीठ ने मुख्य सचिव को अवमानना नोटिस जारी कर 23 अप्रैल तक जवाब पेश करने को कहा।

वहीं दूसरे मामले में उच्च न्यायालय ने अपने पूर्व के आदेश का पालन न करने पर हरिद्वार के डीएम दीपक रावत, मुख्य नगर आयुक्त व ठेकेदार अनुज कुमार को अवमानना नोटिस जारी किया है। इस मामले में लघु व्यापार कल्याण समिति ने उच्च न्यायालय में अवमानना याचिका दायर कर कहा है सरकार ने 25 मई 2016 को नियमावली जारी की थी। जिसके तहत नगर निकायों में साप्ताहिक हाट बाजारों की व्यवस्था की गयी। उच्च न्यायालय ने पूर्व में इसके लिए टाउन वेंडिंग कमेटी गठित करने के आदेश दिए थे। उक्त नियमावली के सेक्शन 16(2) के अनुसार साप्ताहिक पीठ बाजारों से ठेकेदारी के आधार पर अति लघु व्यापारियों से तहबाजारी वसूली नहीं करनी थी। परन्तु हरिद्वार नगर निगम द्वारा तहबाजारी वसूल की जा रही है। साथ ही टाउन वेंडिंग कमेटी का गठन भी नही किया गया।

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