177 साल के नैनीताल में कुमाउनी रेस्टोरेंट की कमी हुई पूरी

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-पूरी तरह कुमाउनी थीम पर स्थापित किया गया है 1938 में स्थापित अनुपम रेस्टोरेंट

-अब यहां लीजिये कुमाउनी थाली के साथ ही पहाड़ी शिकार सहित अनेक पहाड़ी जड़ी-बूटी युक्त व्यंजनों का भी स्वाद

नवीन जोशी, नैनीताल। 1841 में अपनी बसासत से ही अंग्रेजी रंग में रंगी ‘छोटी बिलायत’ भी कहलाने वाली सरोवरनगरी नैनीताल में अंग्रेजी व्यंजनों के साथ ही चायनीज, तिब्बती, स्पेनिश, इलैलियन सहित अनेक विदेशी व्यंजनों के रेस्टारेंट मौजूद हैं और कई रेस्टारेंट दक्षिण भारतीय, बंगाली तथा गुजराती थालियां भी परोसते हैं, किंतु यदि सैलानी कुमाऊं मंडल के इस मुख्यालय में कुमाउनी व्यंजन खाना चाहें तो उन्हें कुमाऊं मंडल विकास निगम लिमिटेड के पर्यटक आवास गृह में रहना व वहां के रेस्टारेंट में खाना होता है, अथवा टी-स्टॉल तरह के छोटे रेस्टोरेंटों में आलू के गुटके, छोले व रायते जैसे कुछ कुमाउनी व्यंजनों से ही गुजारा करना पड़ता है। लेकिन अब सही मायनों में 177 साल की सरोवरनगरी को एक पूरी तरह कुमाउनी रंग में रंगा व कुमाउनी लजीज व्यंजन परोसने वाला रेस्टोरेंट मिल गया है। अखिल भारतीय विद्यार्थी संगठन से जुड़े नगर के युवा सामाजिक कार्यकर्ता व व्यवसायी रुचिर साह ने 1938 में अपने दादा द्वारा स्थापित अनुपम रेस्टोरेंट को कुमाउनी रंग में रंग डाला है। 

रुचिर ने बताया कि नगर में हर देशी-विदेशी व्यंजन की उपलब्धता के बीच कुमाउनी व्यंजनों का कोई रेस्टोरेंट न होना उन्हें हमेशा से अखरता था। इसलिए उन्होंने 1938 में अपने दादा किशोरी लाल साह द्वारा तल्लीताल व पिता प्रदीप साह द्वारा 2005 में मल्लीताल बड़ा बाजार में स्थापित रेस्टारेंट को कुमाउनी थीम में बदल डाला है।

रेस्टोरेंट के बाहर मुख्य द्वार पर परंपरागत कुमाउनी परिधान रंग्वाली घाघरा-पिछौड़ा पहने महिला की पेंटिंग आकर्षित करती है तो भीतर प्रख्यात चित्रकार पद्मश्री यशोधर मठपाल की कुमाउनी लोक संस्कृति से जुड़ी अन्य पेंटिंग व ऐपण लोककला भी ग्राहकों का ध्यान आकर्षित करती हैं।

साथ ही कुमाऊं के परंपरागत लोक वाद्य भी दीवारों की शोभा बढ़ाते हैं। रुचिर ने बताया कि वे रेस्टोरेंट में पहली बार कुमाउनी हर्ब्स युक्त कुमाऊं थाली, बेड़ू रोटी, मडुवे की रोटी, बडील, भांग की चटनी, डुबके-भात, कुमाउनी ककड़ी का राई युक्त रायता, जखिया डाले आलू के गुटके आदि शाकाहारी के साथ ही खड़े मसालों युक्त पहाड़ी शिकार, दूना चिकन, गंधरैंणी चिकन, भांगा चिकन आदि मांसाहारी व्यंजन परोस रहे हैं, साथ ही बुरांश का जूस भी ड्रिंक्स के रूप में दिया जा रहा है, और यह प्रयोग सैलानियों को भी खासा पसंद आ रहा है।

पूर्व में भी हुए हैं ऐसे प्रयास 

वरिष्ठ पत्रकार एवं नगर के अशोक होटल के स्वामी राजीव लोचन साह ने बताया कि उनकी  पत्नी और भाभी ने 1992-94 में माल रोड पर ‘पाहुन’ नाम से ऐसा ही रेस्टोरेंट चलाया था। उससे पूर्व तल्लीताल बाजार में ‘सिंगल’ बिकने की बात भी सुनी जाती है।

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