लगातार छठे दिन भी घटे पेट्रोल के दाम, देखें अपने शहर के आज के पेट्रोलियम पदार्थों के दाम

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एनडीए के चार वर्ष में पेट्रोल के दामों में मात्र 6.74 रुपए यानी 9.4 फीसद की ही वृद्धि

पेट्रोल व डीजल की कीमतों में पिछले पांच दिनों से मामूली सी ही सही किंतु कटौती जारी है। कभी 1 पैसा तो कभी 6 पैसे की कटौती के साथ देश भर में पिछले छह दिनों में पेट्रोल की कीमत में 43 पैसे की कटौती हुई है। वहीं, डीजल की कीमत में 32 पैसे की कमी आई है। राजधानी दिल्ली में शनिवार को पेट्रोल की कीमत में 9 पैसे और रविवार को 8 पैसे की कटौती हुई, जिसके बाद दिल्ली में पेट्रोल की कीमत 78.24 रुपये और डीजल की कीमत 69.11 रुपये प्रति लीटर थी, जबकि रविवार को पेट्रोल 78.15 और डीजल 69.15 की कीमत पर स्थिर रहा। यह अलग बात है कि अभी भी पेट्रोल व डीजल की कीमतों में बढ़ोत्तरी का ही हल्ला है।

इधर नैनीताल की बात करें तो यहाँ पेट्रोल की कीमतें विभिन्न तिथियों को इस प्रकार रहीं :

4 जून 2018 : 79.11 (-0.11) रुपये/लीटर

3 जून 2018 : 79.23 (-0.08) रुपये/लीटर

2 जून 2018 : 79.31 रुपये/लीटर

14 मई 2018 : 76.63 रुपये/लीटर

5 मार्च 2018 : 74.67 रुपये/लीटर

5 दिसंबर 2017 : 72.28 रुपये/लीटर

16 जून 2017 : 69.28 रुपये/लीटर

मालूम हो कि एनडीए सरकार के सत्ता में आने के दौरान मई 2014 में अंतरराष्ट्रीय बाजार से कच्चे तेल का भारतीय खरीद मूल्य 106.85 डॉलर प्रति बैरल तथा पेट्रोल का दाम 71.41 रुपये प्रति लीटर था। इस प्रकार एनडीए के चार वर्ष के कार्यकाल में पेट्रोल के दामों में 2 जून 2018 को 78.15 रुपये के मूल्य होने तक मात्र 6.79 रुपए की ही वृद्धि हुई है, जो कि महज 9.4 फीसद ही अधिक है।
उल्लेखनीय है कि राजधानी दिल्ली में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में 30 मई से कटौती शुरू हुई है। 30 मई को 1 पैसा की कटौती हुई, जिससे सरकार की काफी आलोचना भी हुई। इसके बाद 31 मई को 7 पैसे तथा 1 जुलाई को 6 और 2 जुलाई को 9 पैसे की कटौती की गई। ऐसा ही डीजल की कीमत में भी हुआ है। डीजल की कीमत में 30 मई को 1 पैसा, 31 मई और 1 जून को 5-5 पैसे और 2 जुलाई को 9 पैसे की कटौती हुई।

उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व 2016 में एनडीए के 20 महीने के शासनकाल में पेट्रोल के दाम 16 प्रतिशत घटकर 60 रुपये प्रति लीटर पर आ गये थे। अलबत्ता इस दौरान अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम 106.85 डॉलर प्रति बैरल से दो-तिहाई तक गिर कर 29.80 डॉलर प्रति बैरल पर आ गये थे।

इन तिथियों को नियंत्रण मुक्त हुए पेट्रोलियम पदार्थों के दाम

सरकार ने हवाई जहाजों में इस्तेमाल होने वाले ईंधन (एटीएफ) की कीमतें अप्रैल 2001 को व पेट्रोल के दाम 26 जून 2010 को नियंत्रणमुक्त कर दिये थे जबकि डीजल के दाम 19 अक्टूबर 2014 को बाजार पर छोड़ दिये गये थे। उसके बाद से तेल विपण कंपनियां पेट्रोल और डीजल के दाम अंतरराष्ट्रीय मूल्य और अन्य बाजार परिस्थितियों के अनुरूप तय करते रहे हैं।

इसलिये केवल कच्चे तेल की वैश्विक कीमतों से सीधे नहीं जुड़तीं पेट्रोल-डीजल की कीमतें

पेट्रोल-डीजल की कीमतें वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों से कदम ताल नहीं मिला सकतीं, इसके पीछे दो बड़ी वजहें हैं-
1. रुपये की कीमत: भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का 80 प्रतिशत आयात से पूरा करता है। इसलिए देश में पहुंचने तक ईंधन की लागत क्या होगी, यह बहुत हद तक एक्सचेंज रेट पर निर्भर करती है। जून 2014 में डॉलर की कीमत करीब 60 रुपये के बराबर थी, लेकिन धीरे-धीरे रुपया कमजोर होता गया और इधर लंबे समय से इसका भाव डॉलर के मुकाबले करीब-करीब 68 रुपये पर स्थिर सा है। रुपए की कमजोरी की वजह से भारत पहुंचने तक कच्चे तेल की कीमत बढ़ जाती है।
2. टैक्स: केंद्र की मोदी सरकार ने पेट्रोल-डीजल पर लग रहे करों में धीरे-धीरे बढ़ोतरी कर दी है, ताकि राजस्व बढ़ाया जा सके। मई 2014 में एनडीए सरकार बनने के बाद पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी दोगुने से भी ज्यादा हो गई है। अप्रैल 2014 में पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी 9.48 रूपए प्रति लीटर थी जो छह बार में ही बढ़ते-बढ़ते अभी 19.36 रूपए प्रति लीटर पर पहुंच गई थी। इसी तरह, डीजल पर अप्रैल 2014 में 3.65 रूपए प्रति लीटर की दर से एक्साइज ड्यूटी तय थी। इसमें भी छह बार बढ़ोतरी हुई और अब यह आंकड़ा 11.83 रूपए प्रति लीटर तक पहुंच गया है।

पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर राजनितिक लगाम के लिए जीएसटी लगाने की तैयारी में है सरकार

पेट्रोल और डीजल की कीमतों को लेकर बढ़ रही राजनीति पर लगाम लगाने के लिए अब केंद्र सरकार के पास जीएसटी ही एकमात्र रास्ता बचा है। वैसे जीएसटी के तहत इन उत्पादों को लाने के बावजूद ग्राहकों को इनकी कीमतों में कोई भारी राहत नहीं मिलेगी क्योंकि इन उत्पादों के लिए जीएसटी की ऐसी दर (रेवेन्यू न्यूट्रल रेट) तलाशनी होगी जिससे केंद्र व राज्यों के खजाने को कोई भारी चपत न लगे। इस मुश्किल से निकलने के लिए सरकार पेट्रोलियम उत्पादों के लिए अब तक लागू चार तरह की दरों (5,12, 18, 28 फीसद) से इतर कोई नई दर लाने पर विचार कर रही है, ताकि इनसे भविष्य में जो राजस्व संग्रह हो, वह मौजूदा संग्रह से कम नहीं हो। हालांकि जानकार मानते हैं कि जीएसटी के तहत आने के बावजूद ग्राहकों को खुदरा कीमत में कोई बड़ी राहत नहीं मिलेगी। वित्त मंत्रालय के आला अधिकारियों के मुताबिक भी यह कोई अच्छी अर्थनीति नहीं होगी कि एक झटके में पेट्रोल व डीजल की कीमतों में भारी कटौती कर दी जाये। हालांकि ग्राहकों को इससे तात्कालिक राहत जरूर मिलेगी।

अभी पेट्रोल-डीजल से इतना मुनाफा कमा रहे हैं राज्य

आंकड़े गवाह है कि केंद्र व राज्य पेट्रो उत्पादों से खूब कमाई कर रहे हैं। 28 राज्यों में पेट्रोल पर 25 से 35 फीसद के बीच जीएसटी की दर है। डीजल की भी यही स्थिति है। 13 राज्यों में वैट की दर 20 फीसद से ज्यादा है। चालू वित्त वर्ष के पहले नौ महीनों में केंद्र ने तमाम पेट्रोलियम उत्पादों पर टैक्स लगा कर 1,97,715 करोड़ रुपये का राजस्व हासिल किया जबकि राज्यों के लिए यह राशि 1,50,916 करोड़ रुपये थी। इसका मतलब यह हुआ कि जीएसटी में शामिल करने के बाद इन पर लगाई जाने वाली दर इतनी होनी चाहिए कि कुल संग्रह केंद्र व राज्य की तरफ से इनसे वसूले जाने वाले संग्रह से कम न हो।

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