आरएसएस के कार्यक्रम में संघ के सुर से सुर मिलाते हुए ही बोले प्रणब मुखर्जी-भारतीयता हमारी अटूट पहचान

संघ संस्थापक हेडगेवार को बताया भारत माता का महान सपूत, देश-राष्ट्रीयता व देश भक्ति  से शुरू की बात 

देश के पूर्व राष्ट्रपति डा. प्रणब मुखर्जी ने बृहस्पतिवार को पूरे देश की नजर लगे अपने आरएसएस कार्यालय में दिए गए बहुप्रतीक्षित संबोधन में कहा कि भारत की शक्ति उसकी ‘विभिन्नता में एकता’ की विशिष्टता में है। 5000 वर्ष के इतिहास वाले देश भारत पर पिछले ढाई हजार वर्षों में मुगलों-अंग्रेजों की ओर से अनेक हमले हुए, लेकिन उसकी ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की सांस्कृतिक पहचान नहीं बदली। उल्लेखनीय है कि डा. मुखर्जी के पढ़कर बोले गए संबोधन में यह कमोबेश वही बातें थीं, जो उनसे पूर्व संघ प्रमुख मोहन भागवत भी अपने संबोधन में कह चुके थे। इस तरह एक तरह से पूर्व राष्ट्रपति ने यहां संघ के सुर में सुर मिलाए। अलबत्ता, साथ ही यह ताकीद भी की राष्ट्रवाद को आक्रामक नहीं होना चाहिए। इससे देश कमजोर होता है।

इससे पूर्व पूर्व राष्ट्रपति डा. प्रणब मुखर्जी गुरुवार 7 जून को को अपनी पार्टी-कांग्रेस के अनेक नेताओं और यहाँ तक कि अपनी पुत्री शर्मिष्ठा के विरोध को नज़रअंदाज कर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) के कार्यक्रम में शामिल होने नागपुर पहुंचे। हेडगेवार भवन पहुंचने पर संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने उनका स्वागत किया। कार्यक्रम में संघ का झंडा फहराया गया। प्रणब ने संघ के संस्थापक डॉ. केशव हेडगेवार के जन्मस्थल पर पहुंच कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की, और हेडगेवार की तारीफ करते हुए विजिटर बुक में लिखा कि ‘वह भारत माता के महान सपूत थे’। इस दौरान उनके साथ संघ प्रमुख मोहन भागवत भी मौजूद थे।

इस अवसर पर संघ प्रमुख मोहन भागवत ने अपने संबोधन में कहा कि संघ केवल हिंदुओं का संगठन नहीं है, वरन देश के संपूर्ण समाज को संगठित करना चाहता है। कोई भी भारतवासी संघ के लिये पराया नहीं है। तमात मतांतरों-विवादों के बावजूद ‘विविधता में एकता’ भारत की विशिष्टता रही है। भारत की धरती पर जन्मा हर व्यक्ति भारत पुत्र है। हम सबका लक्ष्य अपनी विविधताओं के बावजूद एक साथ मिलकर देश को विश्वगुरु बनाने का है। उन्होंने बताया कि 1925 में डा. हेडगेवार ने केवल 17 लोगों के साथ अपने घर से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्थापना की थी। कहा कि ‘भारत माता-सबकी माता’ है। सबके पूर्वक 40 हजार वर्षों से एक हैं। डीएनए विश्लेषण भी यह कहते हैं। अपने संकुचित विचार त्याग कर हम अपनी विविधताओं के साथ आगे बढ़ें। संगठित समाज ही भाग्य परिवर्तन की पूंजी है। समाज में हर कोई सोच कर नहीं चलता है। समाज वातावरण के अनुसार महापुरुषों के बताये रास्ते पर चलता है। वातावरण बनाने वाले लोग चाहिए, ऐसे विचारवान महापुरुषों की कमी भी नहीं है। सोचने-विचारने वाले लोगों की मत-भिन्नता लक्ष्य की प्राप्ति में बाधा नहीं बनती है। कहा कि प्रणब जी जो भी पाथेय यहाँ प्रदान करेंगे, संघ उसे ग्रहण करेगा। सारा समाज संघ के कार्यों को परखे और यदि अच्छा लगे तो सब साथ चलें।

वहीं डा. मुखर्जी ने इस अवसर पर अपने बहुप्रतीक्षित, देश भर की निगाहें लगे भाषण में कहा, ‘मैं यहां आपके बीच अपनी आपके प्रति अपनी सोच को बताने, भारत की बात करने के लिए यहां आया हूं। यहां देश, राष्ट्रीयता व देश भक्ति यह तीन शब्द महत्वपूर्ण हैं। अपने देश के प्रति निष्ठा राष्ट्रभक्ति है। भारत का महान इतिहास है। फाह्यान, मेगास्थनीज व ह्वेनसांग आदि विदेशी नागरिक उस दौर में इसका अध्ययन करने यहां आये थे।’

भारत का राष्ट्रवाद ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की भावना में निहित रहा है। भारत के दरवाजे पहले से खुले हैं। उन्होंने संघ प्रमुख को ही दोहराते हुए कहा, ‘विविधता हमारी शक्ति है। भारत में एकता की जड़ें बहुत गहरी हैं।’ साथ ही कहा ‘असहिष्णुता से हमारी शक्ति, राष्ट्रीय पहचान धूमिल होती है। अगर हम भेदभाव और नफरत करेंगे तो इससे हमारी पहचान पर संकट उत्पन्न होगा।’ उन्होंने महान सम्राट अशोक से लेकर गुप्त साम्राज्य व आगे भारतीय राज्यों के विघटन, फिर मुगलों और आगे अंग्रेजों के आगमन का जिक्र करते हुए कहा कि 2500 वर्षों में राजनीतिक बदलावों के बावजूद 5000 साल पुरानी हमारी पहचान अटूट रही है। देश की संस्कृति मुगलों व अंग्रेजों के तमाम हमलों के बावजूद कायम रही।

आजादी के आंदोलन में महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू और आजादी के बाद का जिक्र करते हुए उन्होंने सर्वप्रथम सरदार पटेल के देश के एकीकरण के लिए दिये गये योगदान के लिए याद किया। कहा नेहरू ने ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ में जो लिखा वही राष्ट्रवाद है। अपने 50 वर्षों की राजनीतिक जीवन के अनुभवों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि हमारी शक्ति विविधता में एकता से ही है। वह रोमांचित होते हैं कि कैसे मिजोरम से द्वारिका, हिमालय से लेकर समुद्र तक कैसे 122 भाषाएं और 1600 बोलियां बोलने वाले 3 बिलियन लोग कैसे एक व्यवस्था एक झंडे व एक संविधान के अंदर रहते हैं।

उन्होंने गांधी जी को उद्धृत करते हुए यह भी ताकीद की कि राष्ट्रवाद आक्रामक व विध्वंसक नहीं होना चाहिए। सबको शांति, सद्भावना और खुशी के लिए कार्य करना चाहिए।

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