अब फिर इस नाम के निरोध पर विरोध, भड़की आशा कार्यकत्रियां, बांटने से किया इंकार

समाज में कई बार ऐसे मसले खड़े हो जाते हैं  कि नाम के चक्कर में बदनामी हो जाती है। दबंग फिल्म का आइटम सोंग ‘मुन्नी बदनाम हुई डार्लिंग तेरे लिये’ जब आया तब मुन्नी नाम की लड़कियों को घर से बाहर निकलते ही छींटाकशियों का सामना करना पड़ा। वहीं  ‘शीला की जवानी’ गीत के दौरान शीला नाम वाली महिलायें शोहदों के निशाने पर रहीं। इसी तरह नोटबंदी के दौरान ‘सोनम गुप्ता बेवफा है’ लिखा नोट आने के बाद इस नाम की लड़कियों-महिलाओं के लिए परेशानियां आयीं। लेकिन अब ऐसा ही नाम पर ऐतराज वाला एक पुराना मामला फिर से उठ खडा हुआ है।

इधर उत्तराखंड सरकार ने 11 से 24 जुलाई तक चलने वाले जनसंख्या स्थिरीकरण पखवाड़े के दौरान बांटने के लिए ‘आशा’ नाम के निरोध भिजवाए हैं। और इन निरोध को आशा कार्यकत्रियों से बांटने को कहा गया है। यह जानकारी देतु हुए आशा हेल्थ वर्कर्स यूनियन की प्रदेश अध्यक्ष कमला कुंजवाल ने कहा कि आशा नाम के निरोध बांटने से आशा कार्यकत्रियों को भारी आघात पहुंचा है। यह आशाओं का अपमान है। पिछले वर्ष भी इसी नाम के निरोध आये थे, तब भी विरोध किया गया था। बावजूद इस वर्ष भी इसी नाम के निरोध आये हैं। कहा कि ऐसे में आशाओं ने आशा निरोध का विरोध करने और इन्हें न बांटने तथा जनसंख्या स्थिरीकरण पखवाड़े का भी विरोध करने का निर्णय लिया गया है। कहा कि यदि आशा निरोध को तुरंत वापस नहीं लिया जाता है तो इसका उग्र विरोध भी किया जाएगा। इस निर्णय से सीएमओ को भी अवगत करा दिया गया है। साथ ही कहा कि यदि शीघ्र उनकी प्रोत्साहन राशि नहीं दी जाती है तो आयुष्मान भारत योजना का भी विरोध करेंगी। ज्ञापन में सुमन बिष्ट, कुसुमलता सनवाल, राधा राणा, माधवी दर्मवाल, हेमा आर्या, सरिता कुरिया, पंकज शर्मा, दीपा टम्टा व दीपा अधिकारी आदि के भी हस्ताक्षर हैं।

आशा निरोध में आशा नाम बना आशा वर्कर्स की परेशानी

सरकारी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में परिवार नियोजन के लिये वितरित किये जाने वाले कंडोम पहले ‘डीलक्स निरोध’ के नाम से दिए जाते थे, अब उनका नाम बदलकर ‘आशा निरोध’ रख दिया गया है। उस पर बुरी बात ये कि इनका वितरण भी आशा वर्करों द्वारा किया जाता है जो कि महिलाएं ही हैं। इस पर आशा वर्करों का कहना है कि कंडोम का नाम आशा निरोध होने से उनके साथ छीटाकशी की जाती है। ‘एक आशा देना’ कहकर उनका मजाक उड़ाते हैं। यह सब बहुत ही असभ्य और भद्दे तरीके से होता है जिससे उन्हें शर्मसार होना पड़ता है। इतना ही नहीं सरकारी हिदायतें हैं कि निरोध जिसे भी दी जाये उससे एक रूपया भी कीमत के रूप में लिया जाये लेकिन शर्म के मारे वह यह भी नहीं ले पाती और इसका भुगतान अपनी जेब से करना पड़ता है।

उत्तराखंड में लग चुका है आशा निरोध पर प्रतिबंध

बताया गया है कि उत्तराखंड में पिछले वर्ष आशा कार्यकर्ताओं के विरोध व इनके वितरण से साफ मना करने के बाद इसे प्रतिबंधित कर दिया गया था। यहां तक कि आशा वर्कर्स की नेताओं ने कह दिया था कि स्वास्थ्य मंत्री यदि निरोध को स्वास्थ्य मंत्री निरोध नाम से जारी करें तो उनके परिजनों को कैसा लगेगा। आशा वर्कर्स के विरोध को देखते हुए राज्य सरकार को सारा स्टॉक केंद्र को वापस भेज दिया गया था। पंजाब व हरियाणा में भी निरोध के इस नाम पर विरोध हुआ है।

महिला विरोधी नज़रिया

निरोध का नाम आशा निरोध रखने से एक ओर जहां आशा वर्कस विरोध कर रही हैं वहीं इन्हें महिला विरोधी नज़रिये के तौर पर भी देखा जा रहा है। निशाना सीधा केंद्र सरकार की ओर है। कुछ महिला संगठनों का कहना है कि इससे केंद्र की बीजेपी सरकार का महिला विरोधी नज़रिया साफ झलकता है।

आशा वर्कर्स नहीं कुंठित सोच वाले हों शर्मसार

इस मामले में एक चीज़ तो साफ है कि लोगों के दिमाग में गंदगी अभी भी भरी पड़ी है। सामाजिक सोच का स्तर अभी तक निम्न है। निरोध के पैकेट से आशा नाम हो सकता है हटा भी लिया जाये लेकिन भद्दा मज़ाक करने वालों पर क्या इससे रोक लग जायेगी ? क्या उनके दिमागों की गंदगी दूर हो जायेगी ? क्या उनकी कुंठाएं शांत हो जायेंगी ? या फिर कुछ और रास्ते निकाल लिये जायेंगें। बेहतर हो कि इस मसले पर लोगों को सामाजिक रूप से जागरूक किया जाये। आशा वर्कर्स भी इसी समाज का हिस्सा हैं। निरोध का इस्तेमाल यौन शिक्षा का ही भाग है। लेकिन जहां महिलाओं की माहवारी पर अभी खुलकर बात नहीं होती वहां पर यौन संबंधों पर बात करना तो अश्लील ही माना जायेगा। और अगर कोई इस पर बात करना चाहेगा तो उसे या तो चरित्रहीन समझा जायेगा या फिर उसके साथ भद्दे मज़ाक किये जायेंगें।

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Loading...