ब्लू, सुपर व ब्लड मून चंद्रग्रहण के बहाने धरती की सेहत जांचने में जुटे भारत व जापान के वैज्ञानिक

31 जनवरी 2018 के चंद्रग्रहण की ताज़ा तस्वीर
  • इस अध्ययन से यदि कोई नये वैज्ञानिक तथ्य स्थापित होते हैं, तो वैज्ञानिक दूसरे ग्रहों पर जीवन की संभावनाओं जैसे बड़े लक्ष्य के लिए भी कर सकते हैं इस तकनीक का उपयोग
  • एरीज में 104 सेमी की दूरबीन पर एरीज द्वारा ही निर्मित यंत्र पोलेरोमीटर से रख रहे हैं चांद पर नजर
  • आसमान में हल्के बादल, रात्रि तक रहे तो लग सकता है उम्मीदों को झटका

नवीन जोशी, नैनीताल। मानव हर स्थिति में अपने लिए कुछ लाभ के अवसर खोज ही लेता है। करीब 3.63 लाख किमी दूर चांद पर पड़ने जा रही पूर्ण चंद्रग्रहण की आभाषीय स्थिति में भी मानव ने अपना लाभ खोजने का अवसर निकाल लिया है। भारत और जापान के वैज्ञानिक मुख्यालय स्थित आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान यानी एरीज में चंद्रग्रहण का एरीज में ही निर्मित पोलेरोमीटर नामक यंत्र से प्रेक्षण कर पृथ्वी के वायुमंडल का अध्ययन करने में जुट गये हैं। यह पहली बार है जब जापान के बाद भारत में इस तरह के चंद्रग्रहण के दौरान प्रेक्षण किये जा रहे हैं। इस अध्ययन से यदि पृथ्वी के वायुमंडल के बारे में यदि कोई नये वैज्ञानिक तथ्य स्थापित होते हैं, तो वैज्ञानिक इस तकनीक का इस्तेमाल दूसरे ग्रहों पर जीवन की संभावनाओं जैसे बड़े लक्ष्य के लिए भी कर सकते हैं। अलबत्ता, नैनीताल में बुधवार को उभर आए हल्के बादलों की उपस्थिति ने वैज्ञानिकों की उम्मीदों व संभावनाओं को कुछ झटका देने का इशारा भी किया है।

चंद्रग्रहण पर अध्ययनों के बारे में जानकारी देते एरीज व जापान के वैज्ञानिक।

बुधवार को एरीज में एरीज के निदेशक डा. अनिल कुमार पांडे जापान की निशी हारिमा ऑब्जरवेटरी के निदेशक प्रो. वाई ईटो व जापान के साथ इस संयुक्त परियोजना के प्रभारी दिल्ली विश्वविद्यालय के डा. वाईपी सिंह व वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. शशिभूषण पांडे तथा अन्य के साथ प्रेस से मुखातिब हुए। इस दौरान उन्होंने बताया कि प्रो. ईटो ने चार अप्रैल 2015 को जापान की हवाई स्थित 8 मीटर व्यास की सुबारू नाम की ऑप्टिकल टेलीस्कोप से इस तरह का अध्ययन किया था, जिसके प्रेक्षणों का यहां एरीज से पुष्टि करने की कोशिश है। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि जापान में 29 डिग्री अक्षांस से प्रेक्षण किये गये, जबकि इस बार जापान व भारत में 35 अंश अक्षांस पर स्थित एरीज से साथ-साथ इस तरह के प्रेक्षण किये जा रहे हैं, इससे अक्षांसों के अंतर पर अध्ययनों में अंतर का भी अध्ययन किया जा सकेगा। यह अध्ययन इसलिए भी खास हैं कि यह एरीज द्वारा ही वर्ष 2005 में बने पोलरमेट्री (ध्रुवीयमिति) नाम के उपकरण और यहां 1972 में स्थापित 104 सेमी व्यास की संपूर्णानंद दूरबीन पर किए जाएंगे। इस मौके पर दिल्ली विवि की शोध छात्रा सुषमा दास तथा जापान की छात्राएं मायू कारिटाव माई त्सुकाडा भी मौजूद रहीं। वैज्ञानिकों ने बताया कि भूकंप का भूकंप से कोई संबंध नहीं होता। आज अफगानिस्तान के हिंदुकुश क्षेत्र में आये भूकंप से भी आज होने जा रहे चंद्रग्रहण से कोई संबंध नहीं है।

इस तरह होगा अध्ययन
नैनीताल। बुधवार रात्रि चंद्रग्रहण के दौरान जो अध्ययन होना है, उसमें दूरबीन व पोलरमेट्री नाम के उपकरण की मदद से सूर्य व चंद्रमा के बीच आई पृथ्वी के ध्रुवों व बाहरी वायुमंडल से गुजरकर चांद पर पड़ने वाले प्रकाश का अध्ययन किया जाएगा। चूंकि चंद्रग्रहण के दौरान पृथ्वी सूर्य व चांद के बीच आ जाएगी, और पृथ्वी चांद पर पड़ने वाले सूर्य के प्रकाश को रोक देगी, बावजूद कुछ प्रकाश पृथ्वी के बाहरी छोरों, ध्रुवों से होकर चांद पर चला जाएगा। यही प्रकाश चांद पर लाल रंग की अनुभूति कराकर चांद को ‘ब्लड मून’ या रक्तवर्ण के चांद में बदल देगा। इस प्रकार इस अध्ययन से पृथ्वी के बाहरी वायुमंडल में मौजूद धूल के कणों व अन्य तत्वों का अध्ययन भी किया जा सकेगा। यदि इस तरह कोई वैज्ञानिक तथ्य स्थापित हो जाते हैं तो इस तकनीक का प्रयोग सौरमंडल के अन्य ग्रहों के वातावरण व वहां जीवन की संभावनाओं के अध्ययन में भी किया जा सकेगा।

ब्लू, सुपर व ब्लड मून की ऐसी अगली अनोखी घटना 2034 में होगी

नैनीताल। इसे समझने से पहले यह समझ लें कि किसी अंग्रेजी महीने में दो पूर्णिमा पड़ने पर दूसरी पूर्णिमा के चांद को ‘ब्लू मून’, पूर्णिमा के दिन चांद के अपने परवलयाकार पथ पर धरती से सबसे करीब (करीब 3.63 लाख किमी दूर) होने की स्थिति में पूर्णिमा के चांद को ‘सुपर मून’ एवं ग्रहण की दशा में पृथ्वी के परावर्तित प्रकाश के प्रभाव में लाल दिखाई देने को ‘ब्लड मून’ कहा जाता है। वैज्ञानिकों ने बताया कि यह तीनों स्थितियां दशकों बाद होती हैं। हालांकि हर वर्ष दुनिया में करीब दो चंद्र और दो या तीन सूर्यग्रहण पड़ते हैं, और आगे 27-28 जुलाई 2018, 20-21 जनवरी 2019, 26 मई 2021, 15-16 मई 2022 को भी चंद्रग्रहण पड़ेंगे, किंतु ब्लू, सुपर व ब्लड मून की घटना अगली बार 25 नवंबर 2034 में होगी। इससे पहले भी ऐसा संयोग करीब डेढ़ दशक पूर्व ही बना था। बताया कि इस दौरान पृथ्वी से सर्वाधिक करीब होने के कारण चांद करीब 12 से 14 फीसद बड़ा एवं 30 फीसद अधिक चमकदार होगा। चंद्रग्रहण शाम 5.18 पर शुरू होगा, 6.21 से 7.37 तक पूर्णता की स्थिति में होगा, और 8.41 बजे समाप्त हो जाएगा।
चंद्रग्रहण पर अध्ययनों के बारे में जानकारी देते एरीज व जापान के वैज्ञानिक।

इसके साथ ही वैज्ञानिकों ने यह साफ किया कि ब्लू, ब्लड व सुपर मून का चांद के रंगों से कोई संबंध नहीं है। आज तीन रंगों में चांद के दिखने की मीडिया में चल रही बातें झूठी हैं। ब्लू मून का अर्थ चांद का नीला दिखना नहीं है, बल्कि जैसा ऊपर लिखा है वह है। अलबत्ता चांद इस दौरान लाल रंग में नजर आएगा।

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