/नैनीताल में मिले किंग कोबरा के नर-मादा, विश्व रिकार्ड, ग्लोबल वार्मिंग या समृद्ध जैव विविधता का प्रमाण !

नैनीताल में मिले किंग कोबरा के नर-मादा, विश्व रिकार्ड, ग्लोबल वार्मिंग या समृद्ध जैव विविधता का प्रमाण !

जॉयविला क्षेत्र में पकड़ में आई मादा किंग कोबरा (14 नवम्बर 2017)

-सर्पराज के प्राकृतिक आवास स्थल के रूप में स्थापित हो रहा नैनीताल का दावा
-पूर्व में विश्व रिकार्ड 22 फिट लंबे किंग कोबरा के कालाढुंगी में मिले थे अवशेष
नवीन जोशी, नैनीताल। कुछ वर्षों पूर्व तक नैनीताल व पहाड़ों पर सांप दिखना बहुत बड़ी बात होती थी, किंतु इधर इस वर्ष नगर में हाल के कुछ महीनों में ही चार सांप नजर आये हैं, और सर्वाधिक दिलचस्प बात यह है कि इनमें से दो सर्पराज कहे जाने वाले किंग कोबरा थे। पहले बीती पांच अक्टूबर 2017 की रात्रि में नगर की माल रोड पर स्थित क्लासिक होटल में करीब 15 फिट लंबा नर किंग कोबरा घुस गया था, जिसे छह अक्टूबर को पकड़ा गया। जबकि इधर 14 नवंबर को नगर के तल्लीताल जॉय विला क्षेत्र में एक करीब 12 फिट लंबी मादा किंग कोबरा पकड़ी गयी है। इस प्रकार ऐतिहासिक तौर पर पहली बार नगर में सर्पराज के पाये जाने के पहले पुख्ता तथ्यपूर्ण प्रमाण प्रमाण प्राप्त हुए हैं।

विश्व रिकार्ड हो सकती है किंग कोबरा की नैनीताल में उपस्थिति

नैनीताल। उल्लेखनीय है कि सर्पराज कहे जाने वाले अनुसूचि एक में शामिल किंग कोबरा को मैदानी क्षेत्रों में पाया जाने वाला जीव माना जाता है। उत्तराखण्ड वन्य जीव बोर्ड के सदस्य, अंतर्राष्ट्रीय छायाकार व प्रकृतिविद् अनूप साह के अनुसार करीब 60 वर्ष पहले नगर के हीरा लाल साह ठुलघरिया द्वारा नगर के बारापत्थर क्षेत्र में करीब 7000 फिट की ऊंचाई पर और इधर जून 2014 में नगर के मान परिवार ने किलबरी रोड में समुद्र तल से करीब 7500 फिट की ऊंचाई पर किंग कोबरा को देखने का दावा किया था, जो कि इतनी अधिक ऊंचाई के लिहाज से श्री साह के अनुसार विश्व कीर्तिमान है। श्री साह के अनुसार इससे अधिक लंबे किंग कोबरा के पाये जाने के कोई रिकार्ड नहीं हैं। जोकि लंदन के चिड़ियाघर में रखे गये सर्वाधिक 18.5 फिट के सांप से भी अधिक लंबा था। परंतु इसका कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं था। लेकिन इधर इसे 1938 मीटर (6358 फिट) की ऊँचाई पर बसे शहर के ऊपरी क्षेत्रों में देखने की पहली बार पुष्टि हुई है। गौरतलब है कि पूर्व में जनपद के कालाढुंगी क्षेत्र में वन विभाग को 22 फिट लंबे किंग कोबरा के सड़े-गले अवशेष मिले थे, जो कि विश्व रिकॉर्ड बताया जाता है।

लंबा है इस क्षेत्र में किंग कोबरा मिलने का इतिहास

2014 में ज्योलीकोट के निकट अपने घोंसले में अण्डों को सेती हुई रिकॉर्ड की गयी मादा किंग कोबरा

नैनीताल। वन्य जीव प्रेमी विनोद पांडे के अनुसार किंग कोबरा को वर्ष 1998 में निकटवर्ती बेलुवाखान में और वर्ष 2005 में भवाली सेनेटोरियम के पास भी देखा गया। वहीं सर्प विशेषज्ञ मनीश राय ने इस क्षेत्र में किंग कोबरा का पहला घोंसला वर्ष 2006 में तल्ला रामगढ़ में देखा व इस पर शोध किये। इसके अलावा नैनीताल नगर में सूखाताल में प्रसाद भवन, फ्लैट्स, टैक्सी स्टैंड आदि स्थानों पर तथा प्रदेश के चम्पावत, लोहाघाट, बागेश्वर, आदि बद्री, रूद्रप्रयाग व तराई-भाबर में करीब 10 से 17 फुट लंबे किंग कोबरा को देखे जाने के दावे किए जाते रहे हैं।

ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव या नैनीताल किंग कोबरा का प्राकृतिक आवास स्थल !
इधर नैनीताल में किंग कोबरा की उपस्थिति को कई लोग ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव भी मान रहे हैं, वहीं इस बारे में पूछे जाने पर वन संरक्षक दक्षिणी कुमाऊं वृत्त डा. पराग मधुकर धकाते का कहना है कि नैनीताल किंग कोबरा का प्राकृतिक आवास हो सकता है। संभव है कि यह हमेशा से यहां रहता हो, परंतु पहले इसके फोटो आदि लिये जाने के प्रमाण नहीं थे। अब सूचना-प्रौद्योगिकी के बढ़ते प्रभाव से इसकी पुष्टि होना सुखद है। इसकी यहां उपस्थिति इस क्षेत्र की अब भी समृद्ध जैव विविधता होने का प्रमाण भी है। इस आधार पर विशेषज्ञ भी स्वीकार कर रहे हैं कि क्षेत्र की समृद्ध जैव विविधता, मजबूत पारिस्थितिकी तंत्र व आहार श्रृंखला के परिचायक किंग कोबरा का यहां मिलना इस क्षेत्र के लिये बड़ी उपलब्धि हो सकता है, और इस क्षेत्र को सर्पराज के संरक्षित क्षेत्र के रूप में विकसित किया जा सकता है। परीक्षण किया जाये तो किंग कोबरा की यहां उपस्थिति देश के लिये बड़ी उपलब्धि हो सकती है।

सर्वाधिक विषैले के साथ ही सहनशील भी होता है किंग कोबरा

नैनीताल। अनूप साह के अनुसार किंग कोबरा सबसे अधिक  विषैला सांप होने के साथ ही अत्यन्त सहनशील सांप भी है, यह आमतौर पर बिना कारण किसी प्राणी को नहीं काटता है। इसमें इतना विष होता है कि यह एक बार में ही 20 लोगों को मार सकता है, बावजूद पूरे भारत मे सांपो के काटने से जहां प्रतिवर्ष 50000 मौतें  होती हैं, वहीं किंग कोबरा के काटने से पिछले 20 साल में मात्र चार व्यक्तियों की मृत्यु हुई है। इसलिए इस सर्प से भयभीत होने का कारण नहीं है। श्री साह इस आधार पर भी किंग कोबरा की विषेश सुरक्षा किये जाने की मांग उठा रहे हैं।

क्यों महत्वपूर्ण है किंग कोबरा

नैनीताल। नि:संदेह यह प्रश्न उठता है कि मनुष्य इतने विषैले सांप को बचाने का प्रयास क्यों करे। इसका उत्तर बाघों के संरक्षण के लिये चल रही देश व्यापी मुहिम में ही समाहित है। पारिस्थितिकी तंत्र की आहार श्रृंखला में बाघ की तरह सबसे ऊपर स्थित इस जीव की पहाड़ में उपस्थिति का अर्थ है, यहां इसकी आहार श्रृंखला के अन्य जीव भी भरपूर मात्रा में मौजूद हैं। इसका मुख्य भोजन छोटे सांप हैं। वह अन्य जीव जंतुओं को खाते हुऐ क्षेत्र में पारिस्थितिकीय संतुलन बनाते हैं।

नैनीताल देखने की चाह में पहाड़ चढ़ आया हाथियों का झुंड

-पूर्व में भी सूखाताल एवं नैनी झील के पास हाथियों के पहुंचने हैं प्रमाण
नवीन जोशी, नैनीताल। जी हां, आश्चर्य होगा। किंतु यह सच है। मुख्यालय से करीब 20 किमी दूर ज्योलीकोट के निकट चोपड़ा गांव में हाथियों का झुंड देखे जाने की अभूतपूर्व घटना हुई है। ज्ञात इतिहास में पहली बार, शुक्रवार दोपहर करीब 12 बजे ग्रामीणों ने जिम कार्बेट पार्क से अलग, समुद्र सतह से करीब 1500 मीटर की ऊंचाई वाले चोपड़ा गांव में चार वयस्क हाथियों का झुंड देखा गया। उत्साही ग्रामीण युवा इन हाथियों की फ़ोटो लेने में भी सफल रहे। क्षेत्रीय निवासी एवम वन क्षेत्राधिकारी कैलाश चंद्र सुयाल ने बताया कि इतिहास में यहां हाथियों के देखे जाने की कोई जानकारी नहीं है। ऐसे में ग्रामीणों के मन में यह सवाल भी कौंध रहा है कि हाथी पहाड़ की ओर क्यों चढ़ रहे हैं। अलबत्ता, पश्चिमी वृत्त के वन संरक्षक डा. पराग मधुकर धकाते ने बताया कि पूर्व में नैनीताल जनपद में ही, करीब इसी ऊंचाई वाले घटगढ़ और पटवाडांगर क्षेत्र में भी हाथियों को देखा गया था, जबकि इतिहास में, अंग्रेजी दौर में, करीब 1950 मीटर की ऊंचाई पर नैनीताल की नैनी झील में पानी पीने के लिए हाथियों के आने की बात एक पुस्तक में दर्ज होने की बात कही जाती है। गौरतलब है कि घटगढ़ और पटवाडांगर जिम कार्बेट पार्क से लगे क्षेत्र हैं, जबकि चोपड़ा पूरी तरह से पार्क से अलग क्षेत्र है। इसलिये यहां हाथियों का आना अपने आप में अनूठी घटना है।डा. धकाते के अनुसार हाथी अपने याददाश्त के लिए जाने जाते हैं। यदि बचपन में भी वे किसी मार्ग से गुजरे हों, तो वापस उन पारंपरिक मार्गों पर लौटते हैं। संभव है कि ये हाथी भी पहले कभी यहां आए हों।

उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व 15 जनवरी 2015 के आसपास भी नैनीताल के निकटवर्ती बल्दियाखान क्षेत्र में समुद्र सतह से करीब 1850 मीटर की ऊंचाई पर स्थित बसगांव के बुड़ भूमिया मंदिर के पास हाथियों का झुंड देखे जाने का दावा किया गया था। वन विभाग के आला अधिकारी इसे पूर्व के संदर्भों व प्रमाणों के आधार पर इसे हाथियों का यहां पहली बार आना नहीं वरन अपने पुराने रास्तों पर वापस लौटना मान रहे हैं। यानि, कह सकते हैं कि हाथियों का झुंड नैनीताल को देखने अथवा पुरानी यादें ताजा करने की चाह में पहाड़ों पर चढ़ आया होगा।

देश में बाघों की संख्या (ऑल इंडिया टाइगर एक्सपीडिशन 2014 के मुताबिक) बीते चार वर्ष में 30 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी के साथ (2010 में 1520-1909) औसत अनुमानित 1706 से बढ़कर अब 1,945 से 2,491 के बीच (औसत अनुमानित 2226) हो जाने और उत्तराखंड के इस मामले में राष्ट्रीय औसत से भी आगे करीब 50 प्रतिशत के साथ देश में में नंबर 2 रहने (यहां पिछले चार वर्षो में बाघों की संख्या में 113 यानी करीब 50 फीसद की बढ़ोतरी के साथ 340 हो गई है, और वह कर्नाटक (406) तथा मध्यप्रदेश (308) के बीच दूसरे स्थान पर है।) की खुशखबरी के बीच यह एक और अच्छी खबर है।

नगर के खोजी युवक दीपक बिष्ट ने क्षेत्र से लौटने के बाद बसगांव के बुड़ भूमिया मंदिर के पास अनेक स्थानों पर यहां से हाथियों का बड़ी मात्रा में मल देखे जाने की जानकारी दी। उल्लेखनीय है कि वन्य जीवों की गतिविधियां जानने के लिए वन्य जीव शोधकर्ता उनके पद चिन्हों व मल आदि से ही पुष्टि व पहचान करते हैं।

बल्दियाखान निवासी खीमराज सिंह बिष्ट ने इसकी पुष्टि करते हुए बताया कि बड़ी मान्यता वाले बुड़ भूमिया मंदिर के पास गत दिवस हाथियों का झुंड देखा गया था। इसने ग्रामीणों की फसलों को भी नुकसान पहुंचाया है। पहाड़ की इतनी ऊंचाई पर हाथियों के चढ़ आने से जहां ग्रामीणों में फसलों के नुकसान की चिंता के साथ ही आश्चर्य भी है, वहीं वन्य जीव विशेषज्ञ के तौर पर प्रभागीय वनाधिकारी डा. पराग मधुकर धकाते ने माना कि ऐसा संभव है। उनका कहना था कि हालांकि हाथी मैदानी क्षेत्रों में ही रहने वाला प्राणी है, और जिम कार्बेट पार्क और जनपद मे भाबर क्षेत्र के हाथी कॉरीडोर क्षेत्र में इसकी काफी उपस्थिति है, लेकिन उन्होंने स्वयं वर्ष 2006 में एक जीर्ण-शीर्ण पुरानी पुस्तक में १०-१५ हाथियों के झुंड के नैनीताल के संभवतया नैनी झील के पास का चित्र देखा है। उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष कालाढुंगी रोड पर मंगोली के निकट भी हाथियों का झुंड देखा गया था, जो कि खासा चर्चा में रहा था। वहीं दीपक बिष्ट ने बताया कि हैनरी रैमजे की 1892 में लंदन से प्रकाशित पुस्तक-अपर इंडिया फॉरेस्ट में हाथियों के नैनीताल की सूखाताल झील के पास तक पहुंचने का जिक्र मिलता है। इस आधार पर डा. धकाते कहते हैं कि हाथी भोजन की उपलब्धता होने पर एक स्थान से दूसरे स्थान को जाते रहते हैं, लेकिन इनके आने-जाने में एक खाशियत यह भी होती है कि यह पूर्व में प्रयोग किए गए मार्ग पर ही चलते हैं। लिहाजा यह संभव है कि बसगांव में दिखे झुंड का कोई हाथी संभवतया कभी पूर्व में अपने बाल्यकाल में इसी रास्ते से नैनीताल आया होगा। डा. धकाते ने स्वयं भी शीघ्र इसकी पुष्टि के लिए क्षेत्र का दौरा किये जाने की बात कही।

रॉयल बंगाल टाइगर भी देखे जा चुके हैं नैनीताल में

(10-11 फ़रवरी 2014 की रात्रि नैनीताल की कैमल्स बैक छोटी पर वन विभाग के कैमरे से लिया गया चित्र )

नैनीताल। उल्लेखनीय है कि 10-11 फरवरी 2014 की रात्रि बाघों के राजा रॉयल बंगाल टाइगर को 2591 मीटर ऊंची कैमल्स बैक चोटी पर वन विभाग द्वारा लगाए गए कैमरे में रिकार्ड किया गया था। इन वन्य जीवों की नैनीताल में उपस्थिति को इस क्षेत्र की समृद्ध जैव विविधता व मजबूत पारिस्थितिकी तंत्र का परिचायक माना जा सकता है।

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